सनातन धर्म में भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी का विशेष महत्व है, क्योंकि मान्यताओं के अनुसार इसी दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था. इस वर्ष गणेश उत्सव भाद्रपद चतुर्थी 27 अगस्त 2025, बुधवार से शुरू होकर अनंत चतुर्दशी यानी 6 सितंबर 2025 शनिवार को विसर्जन के साथ पूरा होगा. यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विविधता और एकता को भी दर्शाता है. गणेश चतुर्थी का पर्व महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के राज्यों में ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत में भी बड़े धूमधाम से मनाया जाता है, अब तो भारत से बाहर विदेशों में भी 11 दिवसीय गणेश उत्सव मनाये जाने लगा है. हालांकि महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में गणेशोत्सव की विभिन्न परंपराएं एवं रीति-रिवाज का अपना ही आकर्षण है, जिसे देखने दूरदराज से लोग यहां आते हैं. आइये जानते हैं महाराष्ट्र और दक्षिण भारतीय राज्यों में गणेशोत्सव की विविध परंपराओं एवं रीति रिवाज आदि के बारे में
महाराष्ट्र:
महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी की भव्यता देखते बनती है. यहां इस पर्व की शुरुआत स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने की थी, ताकि देश को आजादी दिलाने के लिए समाज को एकजुट किया जा सके. इस अवसर भाद्रपद चतुर्थी के दिन सार्वजनिक पंडालों में विशाल गणेश मूर्तियां स्थापित की जाती हैं. यहां के सबसे लोकप्रिय पंडालों में प्रमुख है, अलीबाग स्थित लालबागचा राजा. इसके साथ ही कई घरों में भी गणपति बप्पा की मूर्तियां स्थापित की जाती हैं. हर घरों में मोदक, पूरन पोली और श्रीखंड जैसे स्वादिष्ट पकवान बनाए जाते हैं. गणपति विसर्जन पर सड़कों पर विशाल जुलूस निकलता है, जिसमें ढोल-ताशे, नृत्य और मंत्रोच्चार होता है. यह भी पढ़ें : Masik Shivratri 2025: मासिक शिवरात्रि पर गुरु-पुष्य समेत बन रहे ये अति शुभ योग, ऐसे करें महादेव की पूजा
गोवा और कोंकण
दक्षिण भारत के गोवा और कोंकण बेल्ट (जैसे सिंधुदुर्ग, रत्नागिरी) में भी गणेशोत्सव पारिवारिक माहौल में मनाया जाता है. घर के सदस्य नये-नये वस्त्र पहनते हैं. घरों में मिट्टी की मूर्तियां स्थापित की जाती हैं. घर के आंगन में बड़े ही आकर्षक शैली में 'माटोली' सजाई जाती है, जिसमें ताजा फल, फूल और पत्ते टांगे जाते हैं. यहां पारंपरिक संगीत और लोकगीतों के साथ गणपति बप्पा की विधि-विधान के साथ पूजा की जाती है.
कर्नाटक:
धार्मिकता और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का संगम कर्नाटक में गणेश चतुर्थी पूजा को ‘गणेश हब्बा’ कहा जाता है. इस अवसर पर लोग घरों में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करते हैं, और पारंपरिक तरीके से सजावट करते हैं, हल्दी, कुमकुम, फूल, दूर्वा से उनका पूजन करते हैं.
प्रसाद में कडुबा (मोदक जैसा पकवान) और अन्य मीठे व्यंजन बनाए जाते हैं. गांवों और शहरों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों और भजन संध्याओं का आयोजन होता है. भारी संख्या में गणेश भक्त इस वार्षिक उत्सव में भाग लेते हैं.
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना:
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में गणेश चतुर्थी को पारंपरिक और भावनात्मक रूप से मनाया जाता है. हर घर में मिट्टी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है. इस दिन लोग ‘पालथलि’ (पत्तों की सजावट) और रंगोली बनाते हैं. भगवान गणेश को प्रसाद में उंड्रेल, कोझूकत्ताई, और लड्डू चढ़ाते हैं.
तमिलनाडु:
तमिलनाडु में गणेशोत्सव पूजा को विनायक चतुर्थी कहा जाता है, और इस दिन भगवान गणेश की पूजा अत्यंत श्रद्धा एवं आस्था के साथ की जाती है. खासकर कांचीपुरम और चेन्नई में बड़े सार्वजनिक पंडाल लगाए जाते हैं. प्रसाद में कोझूकत्ताई (मीठे चावल के लड्डू) तैयार किए जाते हैं. गणेश जी की पूजा में संगीत, नादस्वरम, और वेद पाठ शामिल होता है. इस उत्सव में भारी संख्या में गणेश भक्त उपस्थित होते हैं.













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