Mahatma Jyotiba Phule Death Anniversary: जानें गरीब और दबे-कुचले परिवार का बालक कैसे बना महात्मा ज्योतिबा फुले?
महात्मा ज्योतिबा फुले महज समाज सुधारक ही नहीं बल्कि महान विचारक, कार्यकर्ता, समाज सुधारक, लेखक, दार्शनिक, संपादक और क्रांतिकारी भी थे. उन्होंने जीवन भर नीची जाति, कमजोर महिलाओं और दलितोद्धार के लिए बेशुमार कार्य किया. इस कार्य में उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले ने भी उन्हें पूरजोर योगदान दिया. आज देश महात्मा ज्योतिबा फुले की 130 वीं पुण्य-तिथि मना रहा है.
Mahatma Jyotiba Phule Death Anniversary: महात्मा ज्योतिबा फुले (ज्योतिराव गोविंदराव फुले) को 19 वीं सदी का प्रमुख समाज सेवक (Social Worker) माना जाता है. उन्होंने भारतीय समाज में फैली तमाम कुरीतियों को जड़ से समाप्त करने के लिए अथक संघर्ष किया. ज्योतिबा फुले (Mahatma Jyotiba Phule) ने अछूतोद्धार, नारी-शिक्षा, विधवा–विवाह और किसानों के हित के लिए अनगिनत कार्य किया. वे महज समाज सुधारक ही नहीं बल्कि महान विचारक, कार्यकर्ता, समाज सुधारक, लेखक, दार्शनिक, संपादक और क्रांतिकारी भी थे. उन्होंने जीवन भर नीची जाति, कमजोर महिलाओं और दलितोद्धार के लिए बेशुमार कार्य किया. इस कार्य में उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले ने भी उन्हें पूरजोर योगदान दिया. आज देश महात्मा ज्योतिबा फुले की 130 वीं पुण्य-तिथि मना रहा है. आइये जानें एक गरीब परिवार और निम्न जाति में पैदा हुए बालक की 'महात्मा' बनने की कहानी.
ज्योतिबा फुले (Jyotiba Phule) का जन्म 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र (Maharshtra) के सातारा (Satara) जिले में माली जाति के परिवार में हुआ था. ज्योतिबा फुले का बचपन तमाम संघर्षों एवं कष्टों को सहते हुए बीता. वे जब मात्र 9 माह के थे, उनकी मां का निधन हो गया. आर्थिक संकट के कारण उन्हें पिता के साथ खेतों में हाथ बंटाना पड़ता था, इसके लिए प्रारंभिक शिक्षा से भी विलग होना पड़ा. लेकिन उनके कुछ पड़ोसियों जो ज्योतिबा के कुशाग्र बुद्धि के कायल थे के सुझाव पर पिता ने उन्हें स्कॉटिश मिशन हाई स्कूल में प्रवेश दिलवाया. 12 वर्ष की आयु में उनका विवाह सावित्रीबाई से हो गया.
जीवन में आया वह टर्निंग प्वाइंट!
वर्ष 1848 में ज्योतिबा फुले एक ब्राह्मण मित्र की शादी में भाग लेने गये हुए थे. मित्र के रिश्तेदारों को जब उनके निम्न जाति का होने का पता चला तो उन्होंने ज्योतिबा फुले को खूब जलील किया. ज्योतिबा को बहुत बुरा लगा, मित्र की प्रतिष्ठा के कारण वे खून का घूंट पीकर रह गये. लेकिन उसी समय उन्होंने सामाजिक असमानता को जड़ से उखाड़ फेंकने की कसम खाई की. वे जानते थे कि जब तक समाज में महिलाओं को सम्मान नहीं प्राप्त होगा, निम्न जाति के लोगों को हेय दृष्टि से देखा जायेगा, समाज का समुचित विकास होना असंभव है. और जब समाज कमजोर होगा तो देश कैसे सशक्त बन सकता है.
'सत्यशोधक समाज' की स्थापना
24 सितंबर 1873 को ज्योतिबा ने 'सत्यशोधक समाज' नामक सामाजिक संस्था की नींव रखी. उन्हें इस संस्थान का अध्यक्ष और पत्नी सावित्रीबाई को महिला विभाग का प्रमुख चुना गया. संस्थान का मुख्य उद्देश्य छोटी जाति के लोगों को उच्च जाति के लोगों के दैहिक, नैतिक एवं मानसिक शोषण से मुक्त कराना था. इस संगठन के माध्यम से उन्होंने वेदों को ईश्वर की रचना मानने का खुलकर विरोध किया. उनका कहना था कि अगर ईश्वर एक है और उसी ने सभी मानव की रचना की है तो उसने संस्कृत भाषा में ही वेदों की रचना क्यों की? उन्होंने इन धर्मग्रंथों को ब्राह्मणों के स्वार्थ सिद्धी का अस्त्र-शस्त्र तक बताया. ब्राह्मणों के खिलाफ बात करने का साहस करनेवाले वे पहले संत थे. यद्यपि उन्होंने खुद को कभी नास्तिक नहीं कहा, लेकिन मूर्ति पूजा का जमकर विरोध किया साथ ही समाज में व्याप्त चतुवर्णीय जाति व्यवस्था (ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य और शूद्र) को सिरे से नकार दिया. उन्हें इस कार्य के संपादन के लिए कोल्हापुर के शाहू महाराज ने वित्तीय एवं नैतिक सहयोग प्रदान किया.
महिला शिक्षा के लिए सावित्री बाई का मिला साथ
ज्योतिबा की पत्नी सावित्री बाई भी अनपढ़ थीं. आम महिलाओं को शिक्षित बनाने से पूर्व उन्होंने सावित्री को शिक्षा के लिए प्रेरित किया, ताकि महिलाओं के सर्वांगीण विकास में पत्नी का भी सहयोग ले सकें. उन दिनों समाज में स्त्री शिक्षा का प्रयास शून्य था, उन्हें पढ़ने-लिखने की अनुमति नहीं थी. शिक्षा हासिल करने के पश्चात ज्योतिबा और सावित्री बाई ने वर्ष 1848 में देश का पहला महिला विद्यालय शुरू किया. सावित्री बाई देश की इस पहली महिला विद्यालय की पहली महिला अध्यापिका थीं. यद्यपि उस दौर में लड़कियों को शिक्षा देने का प्रयास इतना आसान नहीं था. उनके इस भागीरथी प्रयास में उन्हें कदम-कदम पर विरोध और अपमान झेलने पड़े. लेकिन इससे ना ज्योतिबा का साहस डगमगाया ना ही सावित्रीबाई का. बल्कि उन्होंने कुछ समय के अंतराल पर ही दो और स्कूल खोले. एक स्कूल नीची जाति के बच्चों के लिए भी शुरू किया. शिक्षा के साथ-साथ फुले दंपति ने विधवा के लिए आश्रम, विधवा पुनर्विवाह, नवजात शिशुओं के लिए आश्रम, कन्या शिशु हत्या के खिलाफ भी आवाज बुलंद किया. कम शब्दों में कहा जाये तो उन्होंने ब्राह्मणों द्वारा रचे समाज विभेद का खुलकर विरोध किया. यह भी पढ़ें:सावित्री बाई फुले 122वीं पुण्यतिथि: भारत की पहली शिक्षिका, कुरीतियां मिटाकर महिलाओं को शिक्षित करने के द्वार खोले
समाजोत्थान में लेखिनी का भी लिया सहारा
भारतीय समाज को एकसूत्र में पिरोने के लिए ज्योतिबा फुले ने उपदेश, प्रवचन और भाषणों का तो सहारा लिया ही, साथ ही उन्होंने कुछ पुस्तकें भी लिखीं, जिसने पढ़े-लिखे समाज को आम लोगों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उनकी लिखी पुस्तकों में 'अस्पृश्यांची कैफि़यत','ब्राह्मणंचे कसाब', 'इशारा','तृतीय रत्न','गुलामगिरी', 'पोवाडा−छत्रपति शिवाजी भोंसले यांचा', प्रमुख हैं. यह सभी पुस्तकें उनती वाणी बनकर लोगों तक पहुंची. एक पुस्तक 'गुलामगिरी' की एक प्रति अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा को जब भारत प्रवास के दौरान भेंट दिया गया, और ओबामा को पुस्तक का सार बताया गया तो उन्होंने इसे भारत का अनमोल तोहफा माना था.
ज्योतिबा फुले के सामाजिक कार्यों से प्रभावित होकर उस समय के एक अन्य समाज सुधारक संत राव बहादुर विट्ठल ने ज्योतिबा फुले को 1888 में महात्मा की उपाधि दी. इसी वर्ष ज्योतिबा फुले पक्षाघात के शिकार हो गये 28 नवंबर 1890 को महात्मा ज्योतिबा फुले ने इस नश्वर संसार से विदा ले ली.
(The above story first appeared on LatestLY on Nov 28, 2020 12:38 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

