देव दीपावली (Photo Credits: Instagram)
Dev Dipawali 2020: कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन मनाये जाने वाले देव दीवाली का सनातन धर्म में बहुत महत्व है. यह पर्व भगवान शिव की प्रिय नगरी काशी के गंगा तट पर बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है. देव दीवाली वस्तुतः दीपों का पर्व है. मान्यता है कि देव उठनी एकादशी के दिन देवता जागृत होते हैं और कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन वे काशी के गंगा तट पर स्नान कर दीवाली मनाते हैं, इसीलिए इसे देव दीवाली कहते हैं. इस दिन देवी-देवताओं के स्वागतार्थ पुजारियों द्वारा शंख-घड़ियाल की ध्वनि के साथ वैदिक मंत्रों का जाप कर देवताओं की पूजा अर्चना की जाती है. इसके बाद काशी के गंगा तट स्थित सभी घाटों पर दीप प्रज्जवलित किये जाते हैं. अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक इस वर्ष 29 नवंबर यानी आज रात्रि को देव दीवाली का पर्व मनाया जायेगा.
ज्योतिषियों का मानना है कि देव दीवाली के दिन कुछआवश्यक कार्य करने आवश्यक होते हैं. आइये जानें क्या हैं वे कार्य, जो देव दीवाली के पर्व को पूर्णता प्रदान करते हैं.
कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल गंगा स्नान और उपवास करने तथा भगवान का कीर्तन-ध्यान आदि करने से अग्निष्टोम यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है. बहुत से श्रद्धालु इस दिन भगवान श्री सत्यनारायण का व्रत कर उनकी सुनते हैं. ऐसा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है.
मान्यता है कि कार्तिक मास में भगवान विष्णु जल में ही निवास करते हैं, इसलिए इस माह की पूर्णिमा पर गंगा-स्नान करना सर्वोत्तम माना जाता है. इस दिन अधिकांश लोग प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व प्रयागराज स्थित त्रिवेणी, गढ़गंगा, हरिद्वार, कुरुक्षेत्र तथा पुष्कर आदि तीर्थ स्थलों पर स्नान-दान करते हैं. अगर कोई पवित्र नदी सुलभ नहीं हो तो घर के पानी में गंगाजल मिलाकर भी गंगा स्नान का पुण्य प्राप्त किया जा सकता है.
विष्णु पुराण में कार्तिक मास में तुलसी-पूजा, इसका सेवन एवं सेवा का विशेष महत्व बताया गया है. तुलसी के अलावा गंगा पूजा, विष्णु पूजा, लक्ष्मी पूजा एवं हवन का भी बहुत ज्यादा महत्व है. इनकी पूजा के बाद गरीबों को वस्त्र, धन एवं अन्न का दान देना चाहिए. ऐसा करने से दस यज्ञों के समान पुण्य की प्राप्ति होती है, और मृत्योपरांत बैकुण्ठ की प्राप्ति होती है.
देव दीवाली वस्तुतः देवों का पर्व है, जो मान्यतानुसार कार्तिक पूर्णिमा के दिन पृथ्वी पर उतरकर दीवाली मनाते हैं. ज्योतिषियों का मानना है कि इस दिन श्रीहरि के मत्स्य स्वरूप, शिव के त्रिपुरारी स्वरूप, श्रीकृष्ण, माता लक्ष्मी और तुलसी की विशेष पूजा अर्चना करनी चाहिए. इस दिन शिवलिंग पर कच्चे दूध, में शहद व गंगाजल मिलाकर चढ़ाने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं. मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का संहार किया था, जिससे वे त्रिपुरारी कहलाए. इस रूप में उनकी पूजा करने से व्यक्ति को पुनर्जन्म का कष्ट नहीं होता.
ज्योतिषियों के अनुसार गंगा में दीप प्रज्जवलित करने के पश्चात घर के मुख्यद्वार को तोरण एवं रंगोली से सजाना चाहिए. इसके पश्चात घर को दीपों से सजाना चाहिए. ऐसा करने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं, घर में पूरे साल सुख, शांति एवं समृद्धि रहती है.
मान्यता है कि इस दिन गंगा के किसी भी घाट पर दीप प्रज्जवलित करने से जीवन में खुशहाली आती है, बरक्कत होती है. तमाम संकटों एवं कर्ज से मुक्ति मिलती है.
कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन व्रत रखने और गंगा-स्नान करने वाले को ब्रह्मचर्य का भी पालन करना चाहिए है. ऐसा नहीं करने से व्रत खंडित होता है, और पुण्य के बजाय अशुभ फलों की प्राप्ति होती है.
(The above story first appeared on LatestLY on Nov 28, 2020 06:53 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).