चार दिवसीय छठ महापर्व भारतीय संस्कृति का एक ऐसा उत्सव है, जो आस्था, अनुशासन और आत्मबल का दिव्य संगम है. यह मुख्य रूप से सूर्य देव और छठी मैया की आराधना का पावन पर्व है, जिसमें नारी की श्रद्धा और शक्ति दोनों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है. छठ महज एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण की गाथा भी है, जहां स्त्री अपनी सीमाओं से परे जाकर पूरे समाज को ऊर्जा, आशा और संतुलन का संदेश देती है.
शक्ति बाहर से नहीं भीतर से आती है
चार दिनों तक चलने वाला छठ का पर्व महिलाओं की अटूट श्रद्धा और दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचायक है. निर्जला व्रत, दिन-रात की तपस्या, स्वच्छता, अनुशासन और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए की जाने वाली प्रार्थना आदि दर्शाते हैं कि भारतीय नारी सिर्फ भावनात्मक रूप से नहीं, बल्कि मानसिक और शारीरिक रूप से भी कितनी सशक्त है. छठ व्रत रखने वाली महिला अपने आत्मबल से यह सिद्ध करती है कि सच्ची शक्ति बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से आती है. यह भी पढ़ें : ‘अबकी बार, मोदी सरकार’, ‘ठंडा मतलब कोका कोला’… लिखने वाले एड गुरु Piyush Pandey का निधन, भारतीय विज्ञापन जगत में शोक की लहर
सृजन, संरक्षण और संकल्प का प्रतीक है ‘शक्ति’
छठ पर्व में व्रती महिलाएं अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे परिवार, समाज और प्रकृति के संतुलन के लिए व्रत रखती हैं. वे समुद्र, नदी, तालाब या घाट पर घुटनों तक पानी में खड़े होकर पहले अस्त होते सूर्य को, और अगले दिन उदय होते सूर्य को अर्घ्य देती हैं, उनकी उपासना करती हैं. सूर्यदेव की यह पूजा-अर्चना वस्तुतः ऊर्जा, जीवन और समानता की पूजा है. इस कठोर प्रक्रिया में स्त्री स्वयं 'शक्ति' का रूप धारण कर लेती है, जो सृजन, संरक्षण और संकल्प की प्रतीक है.
सदियों पुरानी है महिला सशक्तिकरण की जड़ें
आज के दौर में जब महिला सशक्तिकरण की बातें अधिकांश मंच पर होती हैं, तब छठ का पावन पर्व, हमें याद दिलाता है कि भारतीय परंपराओं में महिला सशक्तिकरण की जड़ें सदियों से मौजूद हैं. यह पर्व बताता है कि सशक्तिकरण केवल अधिकार प्राप्त करने का नाम नहीं, बल्कि अपनी जिम्मेदारियों और क्षमताओं को पहचानने की प्रक्रिया भी है.
छठ पर्व की हर व्रत रखने वाली महिला इसका एक जीवंत उदाहरण है. श्रद्धा से शक्ति तक की यात्रा का. यह दर्शाती है कि आस्था में भी अपार ऊर्जा छिपी होती है, जो न केवल उसे बल्कि पूरे समाज को आगे बढ़ाने की प्रेरणा देती है. इस तरह छठ केवल सूर्य उपासना का पर्व नहीं, बल्कि स्त्री के आत्मबल, धैर्य और सशक्तिकरण की अनंत कथा है.













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