चाणक्य, जिन्हें ‘विष्णुगुप्त’ एवं ‘कौटिल्य’ के नाम से भी जाना जाता है, वे महान दार्शनिक, अर्थशास्त्री औऱ उच्च कोटि के राजनेता के साथ-साथ मौर्य वंश के स्थापक एवं चंद्रगुप्त मौर्य के खास सलाहकार भी थे. उन्होंने अर्थशास्त्र नामक राजनीतिक और आर्थिक ग्रंथ की रचना की, जो शासन और कूटनीति पर आधारित है. उनकी नीतियों को चाणक्य नीति के रूप में संकलित किया गया है, जिसमें जीवन जीने के तरीके, शिक्षा और रिश्तों पर विचार शामिल हैं. यहां चाणक्य नीति के सत्रहवें अध्याय के 18वें श्लोक में चाणक्य ने बताना चाहा है कि वे कौन-कौन शख्स हैं, जिन्हें किसी के दुख से कोई लेना-देना नहीं होता.
राजा वेश्या यमश्चाग्निः चौरा: बालक याचकाः।
परद्ःख न जानन्ति अष्टमो ग्रामकण्टकः ॥18॥
अर्थात राजा, वेश्या, यमराज, अग्नि, चोर, बालक, याचक और ग्रामकंटक (गांव के उपद्रवी) ये आठ लोग व्यक्ति के दुःख को नहीं समझते.
चाणक्य का आशय यह है कि राजा, वेश्या, यमराज, आग, चोर, बच्चे, भिखारी तथा लोगों को आपस में लड़ाकर तमाशा देखनेवाला व्यक्ति, ये आठों लोग दूसरों के दुःख को नहीं समझते. उदाहरण के लिए राजा, जिसके लिए दुख क्या होता है, वह जानता ही नहीं, क्योंकि 'जाके पैर न पड़ी बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई' यह कहावत सोलहो आने सही है, जिसने दुःख देखे ही न हों, वह दूसरे के दुःखों को क्या समझ सकता है? राज-काज चलाने में भी राजा को कठोर बनना ही पड़ता है. भला एक वेश्या को दूसरे के दुःख-दर्द से क्या मतलब! उसकी तरफ से कोई मरे या जीये, किसी का घर फुंके या बरबाद हो, उसे तो हर कीमत पर बस पैसा (टैक्स) ही चाहिए.
इसी तरह यमराज भी दूसरे के दुःख को नहीं देखते. किसी का परिवार रोये या बिलखे, उन्हें तो अपना काम करना ही होता है. चोर का भी पेशा चोरी करना है, चोर कोई महापुरुष तो होता नहीं, जो दूसरे की पीड़ा को समझे. बच्चा भले अपने माता-पिता या किसी की भी परेशानी या दुःख को क्या समझ सकता है. उसका तो काम ही है जिद्द करना या शरारतें करना. भिखारी भी सबके सामने हाथ फैला देता है. उसे क्या पता कि सामनेवाले के पास कुछ है भी या नहीं है, और कुछ लोगों को दूसरों को आपस में लड़ाने में ही आनंद आता है. ऐसे लोगों को तो आत्मा या इंसानियत ही मर जाती है. दूसरों को दुःखी करने में ही ये खुश होते हैं.













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