Baisakhi 2025: कब मनाई जाएगी बैसाखी 13 या 14 अप्रैल को ? जानें, मूल तिथि, शुभ मुहूर्त, सांस्कृतिक महत्व एवं सेलिब्रेशन इत्यादि!
बैसाखी 2025 (Photo Credits: File Image)

  भारत में हर प्रांत के कुछ विशिष्ठ पर्व होते हैं, जिसे वहां के लोग पूरे परंपरागत तरीके एवं धूमधाम के साथ मनाते हैं. वैशाख कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जाने वाला बैसाखी ऐसा ही एक पर्व है, जिसे पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है, विभिन्न क्षेत्रों बोइशाख (प बंगाल), पुथंडु (तमिलनाडु) बीहू (उत्तराखंड), महाविष्णु संक्रांति (उड़ीसा) एवं उगादि (आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक) आदि के नाम से भी मनाया जाता है. अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार इस वर्ष 14 अप्रैल को बैसाखी का पर्व मनाया जाएगा. आइये जानते हैं, बैसाखी का पर्व क्यों मनाया जाता है, इसकी मूल-तिथि एवं मुहूर्त तथा सेलिब्रेशन का क्या तरीका है. यह भी पढ़ें : Baisakhi 2025 Wishes: बैसाखी की लख-लख बधाइयां! प्रिजयनों संग शेयर करें ये हिंदी WhatsApp Messages, Quotes, Facebook Greetings और Photo SMS

बैसाखी 2025 शुभ मुहूर्त

विभिन्न पंचांगों के अनुसार इस वर्ष बैसाखी का पर्व 14 अप्रैल 2025, सोमवार को मनाया जाएगा

शुभ मुहूर्तः 03.30 AM (14 अप्रैल 2025)

उपरोक्त समय से बैसाखी का शुभ मुहूर्त प्रारंभ होकर पूरे दिन रहेगा

बैसाखी का सांस्कृतिक महत्व

  बैसाखी का पर्व मुख्य रूप से नई फसल के आगमन एवं उसकी कटाई की खुशी में मनाया जाता है. पंजाब, हरियाणा एवं हिमाचल प्रदेश के अलावा जम्मू, उत्तराखंड एवं उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में भी इसे सेलिब्रेट किया जाता है. भारत के अन्य कई हिस्सों में बैसाखी को भारतीय सौर नव वर्ष के रूप में भी माना जाता है. इसके अलावाउत्तरी राज्यों जैसे उत्तराखंडपंजाबजम्मूहिमाचलहरियाणाऔर उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में लोग इसे बड़े उत्साह एवं परंपरागत तरीके से मनाते हैं. गौरतलब है कि साल 1699 में इसी दिन गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी. पंथ-स्थापना का लक्ष्य धर्म और नेकी के रास्ते पर चलना था.

कैसे मनाते हैं बैसाखी का पर्व?

बैसाखी का पर्व निकटतम गुरुद्वारे या किसी खुले स्थान पर मनाया जाता है.

इस दिन लोग प्रातःकाल स्नान के पश्चात गुरुद्वारे जाकर प्रार्थना और पाठ में सम्मिलित होते हैं. गुरुवाणी का श्रवण करते हैं, बहुत-सी जगहों पर प्रभात फेरियां भी निकाली जाती है. दोपहर के समय गुरुद्वारे में शुभ मुहूर्त में अरदास की प्रक्रिया होती है, इसके बाद भोग लगाया जाता है, अंत में लंगर खाया जाता है. इस अवसर पर लोग समूह में भांगड़ा और गिद्दा आदि नृत्य भी करते हैं.