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बिना सुनवाई के लोगों को जेल में नहीं रख सकता ED, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार, गिरफ्तारी नीति पर उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक अदालतें ED को ऐसे प्रावधानों का उपयोग करने की अनुमति नहीं दे सकतीं, जैसे कि धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा 45, जिससे आरोपी व्यक्तियों को बिना सुनवाई के लंबे समय तक जेल में रखा जा सके.

बिना सुनवाई के लोगों को जेल में नहीं रख सकता ED, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार, गिरफ्तारी नीति पर उठाए सवाल
(Photo : X)

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है, जिसमें उसने कहा कि संवैधानिक अदालतें प्रवर्तन निदेशालय (ED) को ऐसे प्रावधानों का उपयोग करने की अनुमति नहीं दे सकतीं, जैसे कि धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा 45, जिससे आरोपी व्यक्तियों को बिना सुनवाई के लंबे समय तक जेल में रखा जा सके.

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी उस समय की जब उसने पूर्व तमिलनाडु मंत्री V. Senthil Balaji को जमानत दी, जो जून 2023 में एक धन शोधन मामले में गिरफ्तार हुए थे. अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक PMLA के अंतर्गत मामलों का निपटारा नहीं हो जाता, तब तक आरोपी के अधिकारों की सुरक्षा करना आवश्यक है.

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि अगर संवैधानिक अदालतें इन मामलों में अपनी अधिकारिता का उपयोग नहीं करेंगी, तो आरोपी व्यक्तियों के अधिकारों का उल्लंघन होगा. न्यायालय ने Balaji की 15 महीने की लंबी हिरासत पर चिंता व्यक्त की और कहा कि चूंकि PMLA मामले का परीक्षण तीन या चार साल या उससे अधिक समय तक समाप्त होने की संभावना नहीं है, इसलिए उनकी निरंतर हिरासत उनके अधिकारों का उल्लंघन करेगी.

अदालत ने यह भी कहा कि यदि परीक्षण में देरी का कारण आरोपी है, तो संवैधानिक अदालतें अपनी अधिकारिता का प्रयोग करने से इनकार कर सकती हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिकांश मामलों में अधिकतम सजा सात साल की होती है, इसलिए यह जरूरी है कि अदालतें इन मामलों में त्वरित निर्णय लें. अदालत ने यह भी बताया कि कई बार आरोपी को लंबी अवधि के बाद बरी किया जाता है, जिसके कारण उनके जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष बर्बाद हो जाते हैं.

इस प्रकार का फैसला न केवल न्यायिक प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि आरोपी को उचित समय पर न्याय मिले.

यह निर्णय भारत में न्याय वितरण प्रणाली में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है और यह निश्चित रूप से प्रवर्तन निदेशालय के लिए एक चेतावनी है कि उन्हें अपने अधिकारों का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए.

इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय न केवल आरोपी के अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि भारतीय न्याय प्रणाली में निष्पक्षता और पारदर्शिता बनी रहे.

(The above story first appeared on LatestLY on Sep 27, 2024 11:11 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).