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Sugar Export Ban: चीनी निर्यात प्रतिबंध से संकट में मिलें, चीनी कारखाना महासंघ अध्यक्ष हर्षवर्धन पाटील ने मोदी सरकार से पाबंदी हटाने की मांग की

केंद्र सरकार द्वारा चीनी निर्यात पर लगाई गई पाबंदियों के बाद देश का चीनी उद्योग गंभीर संकट में आ गया है. राष्ट्रीय सहकारी चीनी कारखाना महासंघ (NFCSF) ने सरकार से निर्यात प्रतिबंध हटाने की मांग की है

Sugar Export Ban: चीनी निर्यात प्रतिबंध से संकट में मिलें, चीनी कारखाना महासंघ अध्यक्ष हर्षवर्धन पाटील ने मोदी  सरकार से पाबंदी हटाने की मांग की
(Photo Credits Pixabay)

 Sugar Export Ban:  केंद्र की मोदी सरकार द्वारा चीनी निर्यात पर अचानक लगाई गई पाबंदियों के कारण देश का चीनी उद्योग गंभीर वित्तीय और कानूनी संकट में घिर गया है. राष्ट्रीय सहकारी चीनी कारखाना महासंघ (NFCSF) के अध्यक्ष हर्षवर्धन पाटील ने शनिवार को पुणे में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक के बाद यह दावा किया. उन्होंने कहा कि निर्यात के लिए पहले से किए गए सौदों, बंदरगाहों की तरफ रवाना हो चुकी चीनी और विदेशी खरीदारों से ली गई अग्रिम राशि (एडवांस पेमेंट) के कारण चीनी मिलों के सामने एक बड़ी वैधानिक और आर्थिक जटिलता पैदा हो गई है.

गन्ना नियंत्रण कानून के मसुदे पर बुलाई गई बैठक

यह बयान केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित नए गन्ना नियंत्रण कानून के मसौदे (ड्राफ्ट) पर चर्चा के लिए बुलाई गई बैठक के बाद आया है. इस नए कानून पर देश के कुल 541 चीनी कारखानों से सुझाव और आपत्तियां मांगी गई हैं. इसी पृष्ठभूमि में पुणे में राष्ट्रीय महासंघ की बैठक हुई, जिसमें महासंघ के प्रबंध निदेशक प्रकाश नाईकनवरे भी उपस्थित थे. हर्षवर्धन पाटील ने बताया कि महासंघ इस कानून के मसुदे में आवश्यक संशोधनों और सिफारिशों के साथ अपनी विस्तृत रिपोर्ट 20 मई 2026 तक केंद्र सरकार को सौंप देगा.  यह भी पढ़े: India Revises Fuel Export Duties: मोदी सरकार ने पेट्रोल निर्यात पर 3 रुपये प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी लगाई, डीजल और ATF पर शुल्क घटाया

निर्यात समझौतों के कारण फंसा पैसा

हर्षवर्धन पाटील के अनुसार, केंद्र सरकार ने इससे पहले दो चरणों में (पहले 15 लाख टन और बाद में 5 लाख टन) चीनी निर्यात की अनुमति दी थी. इसमें से लगभग 9.5 लाख टन चीनी की निर्यात प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी है.

कई चीनी मिलों ने शेष कोटे के लिए निर्यातकों के साथ पक्के व्यापारिक समझौते कर लिए थे और एडवांस भी स्वीकार कर लिया था. अब अचानक लगी रोक के कारण वैश्विक बाजार में भारतीय मिलों की साख प्रभावित हो रही है और ली गई अग्रिम राशि की वापसी को लेकर कानूनी विवाद बढ़ने की आशंका है.

कानून में स्पष्टता और 12% ब्याज की सिफारिश

महासंघ ने मांग की है कि निष्पक्ष और लाभकारी मूल्य (FRP) तय करने के लिए किस पेराई सत्र की चीनी रिकवरी को आधार माना जाए, इसे लेकर कानून में पूरी स्पष्टता होनी चाहिए. महासंघ का सुझाव है कि इसके लिए चालू सीजन की रिकवरी को ही मान्य किया जाना चाहिए.

इसके अतिरिक्त, किसानों के हितों का ध्यान रखते हुए महासंघ ने सिफारिश की है कि यदि कोई चीनी मिल किसानों को समय पर एफआरपी का भुगतान करने में विफल रहती है, तो देरी की अवधि के लिए मिल पर 12 प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज लगाया जाना चाहिए.

चीनी उद्योग के लिए 10 वर्षीय स्थायी नीति की मांग

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान चीनी उद्योग के भविष्य पर चिंता व्यक्त करते हुए हर्षवर्धन पाटील ने कहा कि सरकार को चीनी क्षेत्र के लिए कम से कम 10 वर्षों की एक दीर्घकालिक और स्थायी नीति बनानी चाहिए, जिसमें बार-बार नीतिगत बदलाव न किए जाएं.

वर्तमान में एथेनॉल की कीमतों और सह-बिजली उत्पादन (को-जेनरेशन) दरों को लेकर एक निश्चित और स्पष्ट नीति की आवश्यकता है. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि घरेलू और व्यावसायिक स्तर पर चीनी की घटती मांग और मिलों की कम होती आय पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आगामी पेराई सीजन में कई कारखाने बंद होने की कगार पर पहुंच जाएंगे. कारखानों की आर्थिक स्थिरता के लिए चीनी और एथेनॉल की कीमतों को सीधे एफआरपी से जोड़ा जाना बेहद जरूरी है.

(The above story first appeared on LatestLY on May 17, 2026 12:07 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).