सट्टा, जो कभी गली-कूचों के कोनों में छुपकर खेला जाता था, अब मोबाइल ऐप्स, वेबसाइट्स और व्हाट्सएप ग्रुप्स के जरिए हर हाथ में पहुंच चुका है. इंटरनेट की पहुंच और स्मार्टफोन के सस्ते होने के कारण अब सट्टा का खेल ऑनलाइन तेजी से फैल रहा है. घर बैठे ही लोग नंबर लगाते हैं, रिजल्ट देखते हैं और पैसे कमाने (या गंवाने) के चक्कर में फंसते जाते हैं.
आज के दौर में सट्टा मटका, क्रिकेट बेटिंग, ऑनलाइन कैसीनो और जुए के ऐप्स जैसे कई डिजिटल प्लेटफॉर्म बिना किसी सरकारी अनुमति के चल रहे हैं. इन पर न तो कोई नियंत्रण है, न ही पारदर्शिता. फर्जी ID और UPI खातों से पैसे ट्रांसफर कराना अब आम बात हो गई है.
कोविड-19 लॉकडाउन के समय जब लोग घरों में बंद थे, तब ऑनलाइन सट्टेबाजी में जबरदस्त उछाल देखा गया. खाली समय और मानसिक तनाव ने लोगों को मोबाइल गेम्स और सट्टा जैसे खतरनाक रास्तों की ओर धकेला. इसी समय कई फर्जी वेबसाइट्स और ऐप्स ने लाखों लोगों को चूना भी लगाया.
व्हाट्सएप-टेलीग्राम से फैल रहा नेटवर्क
आजकल सट्टा माफिया अपना नेटवर्क व्हाट्सएप और टेलीग्राम जैसे ऐप्स के जरिए फैला रहे हैं. ये ग्रुप्स निजी होते हैं, जिनमें कोडवर्ड, नकली नाम और डिजिटल पेमेंट के ज़रिए कारोबार होता है. पुलिस के लिए इन्हें पकड़ना अब पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल हो गया है.
युवाओं पर बुरा असर
ऑनलाइन सट्टा की चपेट में सबसे ज्यादा युवा वर्ग आ रहा है. जल्दी अमीर बनने की चाह और "आज पैसा डबल, कल जिंदगी सेट" जैसे झूठे वादे उन्हें इस जाल में खींच लाते हैं. कई बार जब वे सारा पैसा हार जाते हैं, तो उधारी, मानसिक तनाव और अपराध की राह पर भी चल पड़ते हैं.
कानून की पकड़ क्यों कमजोर?
भारत में सट्टेबाज़ी अवैध है, लेकिन ऑनलाइन सट्टा के लिए अभी भी स्पष्ट और मजबूत कानूनों की कमी है. IT एक्ट और पब्लिक गैंबलिंग एक्ट के तहत कार्रवाई होती है, लेकिन यह फिजिकल अड्डों तक ही सीमित रह जाती है. डिजिटल दुनिया में कानून अभी पीछे है.
डिस्क्लेमर: सट्टा मटका या इस तरह का कोई भी जुआ भारत में गैरकानूनी है. हम किसी भी तरह से सट्टा / जुआ या इस तरह की गैर-कानूनी गतिविधियों को प्रोत्साहित नहीं करते हैं.













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