दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला: 'एग्रेसिव सेक्स' के दौरान मौत के आरोपी को मिली जमानत; सबूतों के अभाव को बताया मुख्य आधार
दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक सेक्स वर्कर की मौत के आरोपी व्यक्ति को जमानत दे दी है. अदालत ने माना कि केवल शारीरिक निशान के आधार पर यह साबित करना पर्याप्त नहीं है कि आरोपी ही मौत के लिए जिम्मेदार था.
नई दिल्ली, 6 मई: दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए उस व्यक्ति को जमानत दे दी है, जिस पर शारीरिक संबंधों (Aggressive Physical Intimacy) (एग्रेसिव सेक्स) (Aggressive S*x) के दौरान एक सेक्स वर्कर (Sex Worker) की हत्या करने का आरोप था. जस्टिस गिरीश कठपालिया (Justice Girish Kathpalia) की पीठ ने अपने हालिया आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए साक्ष्य यह साबित करने के लिए अपर्याप्त हैं कि मौत के लिए विशेष रूप से यह व्यक्ति ही जिम्मेदार था.
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपी और उसके तीन साथियों ने महिला की सेवाएं ली थीं, जिसके बाद आरोपी ने कथित तौर पर गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी और शव को फेंक दिया. हालांकि, अदालत ने फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए इस कहानी पर सवाल उठाए.
FSL रिपोर्ट के अनुसार, मृतका के शरीर पर यौन गतिविधि के कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिले थे. इसके अलावा, कोई भी ऐसा चश्मदीद गवाह सामने नहीं आया जिसने पीड़िता को मौत से पहले इन चार आरोपियों के साथ देखा हो. यह भी पढ़ें: Deepfake Misuse Case: पीएम मोदी की डीपफेक फोटो पोस्ट करने वाले आरोपी को दिल्ली कोर्ट से मिली जमानत; गिरफ्तारी के दस्तावेजों की जांच के आदेश
अंगूठे पर 'बाइट मार्क' की दलील खारिज
जांचकर्ताओं ने आरोपी के अंगूठे पर दांत के निशान (Bite Mark) को एक प्रमुख सबूत के तौर पर पेश किया था. इस पर टिप्पणी करते हुए न्यायाधीश ने कहा, 'महज इसलिए कि उसके अंगूठे पर मृतका के दांत का निशान था, यह नहीं कहा जा सकता कि वह आरोपी ही था, न कि उसके अन्य दो साथी, जिन्होंने इस घातक कृत्य को अंजाम दिया.' अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल एक निशान के आधार पर व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती.
व्यक्तिगत जिम्मेदारी का सवाल
अदालत के फैसले का एक मुख्य बिंदु यह था कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि घटनास्थल पर मौजूद चार व्यक्तियों में से वास्तव में किसने इस कृत्य को अंजाम दिया. जस्टिस कठपालिया ने जोर देकर कहा कि यदि अभियोजन की थ्योरी को मान भी लिया जाए, तो भी बिना स्पष्ट सबूत के किसी एक व्यक्ति पर दायित्व नहीं थोपा जा सकता. उन्होंने नोट किया कि यह स्पष्ट नहीं है कि चारों में से कौन मौत के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार था.
सह-आरोपियों के साथ समानता का सिद्धांत
जमानत देने के पीछे अदालत ने 'समानता के सिद्धांत' (Principle of Parity) को भी आधार बनाया. कोर्ट ने पाया कि इस मामले के अन्य तीन सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है. प्रत्यक्ष साक्ष्यों की कमी और अन्य साथियों की रिहाई को देखते हुए, अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि मुकदमे के दौरान वर्तमान आरोपी को हिरासत में रखने का कोई उचित कारण नहीं है. कानूनी कार्यवाही की संवेदनशीलता को देखते हुए आरोपी और पीड़िता की पहचान गुप्त रखी गई है.
(The above story first appeared on LatestLY on May 06, 2026 04:42 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

