बिहार में सबसे ज्यादा क्यों बढ़ रहे हैं किशोरों के अपराध
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

बिहार में जघन्य अपराध एक साल में दोगुने से अधिक तो हो ही गए, जुवेनाइल क्राइम के मामले में भी राज्य पूरे भारत में शीर्ष पर पहुंच गया है.नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की क्राइम इंडिया-2024 की रिपोर्ट के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि देश भर में जुवेनाइल क्राइम के मामले सबसे ज्यादा बिहार में क्यों बढ़ रहे हैं. 'जुवेनाइल क्राइम' का अर्थ है 18 साल से कम उम्र के बच्चे द्वारा किया गया अपराध. इसके साथ ही, राज्य में नाबालिगों के विरुद्ध होने वाले अपराधों में भी वृद्धि हुई है. जहां देशभर में जुवेनाइल क्राइम के मामलों में 2024 में 11.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. वहीं एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार देश भर में सबसे अधिक किशोर अपराधी बिहार में हैं.

चिंता की बात यह है कि राज्य में विभिन्न श्रेणियों के अपराध में भी सौ प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई है. बिहार में 2023 में हत्या, बलात्कार और डकैती जैसे जघन्य अपराध के 52,165 मामले दर्ज हुए, वहीं 2024 में यह संख्या 1,07,303 पर पहुंच गई. हालांकि, बिहार में अपराध की दर राष्ट्रीय औसत से कम है. रिपोर्ट के अनुसार, देश में प्रति एक लाख की आबादी पर औसत अपराध दर 406.8 है, वहीं बिहार में यह 272.6 है. खासकर अगर बच्चों के प्रति अपराध की बात करें तो देश में 2024 में 1,87,702 केस दर्ज किए गए, जो पिछले साल के 1,77,335 की तुलना में 5.8 प्रतिशत अधिक रहे.

किशोर कर रहे हत्या के प्रयास और शादी की नीयत से अपहरण

एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार 2024 में बिहार में 5.037 आपराधिक वारदातों को किशोरों ने अंजाम दिया. जो पिछले साल के दर्ज 1,818 मामलों से 177 प्रतिशत अधिक है. 2024 में 42,633 नाबालिगों को गिरफ्तार किया गया. इनमें 33,129 यानी 77.7 प्रतिशत 16 से 18 आयु वर्ग के थे. राज्य में किशोरों पर सबसे अधिक हत्या के प्रयास और शादी की नीयत से अपहरण के मामले हैं. 2024 में देशभर में किशोरों पर हत्या के प्रयास के 2004 मामले सामने आए, इनमें सर्वाधिक 673 मामले बिहार में दर्ज हुए. इसी तरह शादी की नीयत से किशोरों द्वारा अगवा किए जाने के सर्वाधिक 257 मामले प्रदेश में सामने आए.

सामाजिक कार्यकर्ता चिन्मय प्रकाश जुवेनाइल क्राइम में वृद्धि को सीधे बेरोजगारी की वजह से हुए पलायन से जोड़ते हैं. वे कहते हैं, "इसका मूल समझिए. घर का मुखिया रोजी-रोटी के जुगाड़ में परदेस चला जाता है. गांव-घर में महिलाएं रह जाती हैं. उन्हें भी भरण-पोषण के लिए मजदूरी करनी पड़ती है. अब बच्चों को कौन देखेगा कि वे कहां हैं और क्या कर रहे हैं?"

चिन्मय कहते हैं, "उनका मार्गदर्शन करने वाला तो गरीबी का शिकार होने के कारण घर से बाहर है या फिर पारिवारिक कलह या अन्य वजहों से साथ नहीं रह रहा. परिवार आर्थिक दबाव भी झेल रहा. ऐसी परिस्थिति में बच्चे राह भटकते हैं और अंतत: अपराध की ओर उनका झुकाव हो जाता है या इसकी प्रवृत्ति बढ़ जाती है." इससे साफ होता है कि यह केवल कानून व व्यवस्था की समस्या नहीं रही, बल्कि यह भविष्य में और गहराने वाले गंभीर पारिवारिक और सामाजिक संकट का भी संकेत है.

शराब माफिया और नशे के सौदागर भी जिम्मेदार

दबी जुबान से ही सही, लेकिन इसे स्वीकार करने में किसी को कोई गुरेज नहीं है कि शराबबंदी लागू होने के बाद बिहार में एक समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी हो गई है. इसके कर्ता-धर्ता शराब माफिया और उसके सिंडिकेट के लोग हैं. पत्रकार अक्षय बाजपेयी कहते हैं, "शराब के धंधेबाज बच्चों-किशोरों से कैरियर का काम लेते हैं. कई ऐसे मामले सामने भी आ चुके हैं. कुछ तो गरीबी के कारण जल्द से जल्द पैसा कमाने की ललक में इनके साथ हो जाते हैं, तो कई ऐश-मौज के लिए पैसे की चाह में उनका साथ देते हैं. अनाप-शनाप धन की चाह में वे अपराध करने से भी परहेज नहीं करते."

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अपने फायदे के लिए माफिया आपसी प्रतिद्वंदिता में उन्हें शह देते हैं और यहीं से उनका आपराधिक सफर शुरू हो जाता है. वे कहते हैं, "आजकल किशोरवय के लड़के शराब या सूखे नशे के लती हो जा रहे और फिर इसके लिए जब कहीं से पैसा नहीं मिलता है तो वे अपराध का सहारा लेते हैं." किशोर अपराधियों के खिलाफ गंभीर अपराध के कम, जबकि अधिकतर मामले चोरी, छीन झपटी, वाहन चोरी और बलात्कार के होते हैं. पेशेवर संगठित गिरोह भी नाबालिगों का इस्तेमाल करते हैं. सूखे नशे या ड्रग्स के सौदागर भी इसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए महिलाओं-नाबालिगों का सहारा लेते हैं.

ऐसे ही एक मामले में पकड़े गए एक किशोर का कहना था, "मेरे एक दोस्त ने बताया था कि पैकेट पहुंचाने का एक काम है. जो जगह बताई जाएगी, उसे वहां किसी को दे देना है. इसके बदले में उसे उतने पैसे मिलेंगे, जो घरवाले नहीं दे सकते. इसी लोभ में यह करने लगा, लेकिन दूसरी बार में ही पकड़ लिया गया. अगर मुझे कोई और काम यहां मिल जाता तो गलत काम क्यों करता." अब यह किशोर अपने परिजन के साथ बिहार के बाहर काम कर रहा है.

डिजिटल पहुंच का नकारात्मक प्रभाव

इंटरनेट की सुलभ पहुंच भी किशोरों-युवाओं पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही. साइबर विशेषज्ञ प्रतीक शुक्ला कहते हैं, "आज सोशल मीडिया या फिर अन्य प्लेटफॉर्म पर तरह-तरह के कंटेंट उपलब्ध हैं. आप सर्च कीजिए, सब कुछ मिल जाएगा. कई मामले ऐसे सामने आए हैं, जिनमें यहां से सीखकर उसी तरीके से अपराध को अंजाम दिया गया. इन्हीं वजहों से साइबर अपराध में भी किशोरों की संलिप्तता बढ़ी है."

फेक प्रोफाइल और ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग जैसे अपराध भी वे कर रहे, जबकि डिजिटली वे इतने जानकार नहीं हैं और अंतत: वे किसी न किसी आपराधिक गिरोह का हिस्सा बन जाते हैं. वे छोटे-मोटे अपराध करते हुए बलात्कार और मर्डर जैसे अपराध को अंजाम दे रहे हैं कम उम्र के अपराधी तो सोशल मीडिया पर अपना महिमामंडन करते भी देखे गए हैं. रिटायर्ड पुलिस अधिकारी एस. के. तिवारी कहते हैं, ‘‘स्मार्ट फोन बच्चों को समय से पहले बालिग बना दे रहा. उपयोग की जगह स्मार्टफोन का दुरुपयोग बढ़ गया है. सोशल मीडिया कितनी अच्छी चीजें परोस रहा, यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन प्रेम प्रसंग जैसे मामले बढ़ाने में इसकी भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है. ''

बिहार में शराबबंदी के बीच बढ़ता सूखे नशे का जाल

बिहार सरकार के गृह विभाग के आंकड़े भी इस बात की ताकीद कर ही रहे हैं. इसके मुताबिक 2024 में अपहरण के 19,768 मामले दर्ज हुए, जिनमें प्रेम प्रसंग में घर से भागने के 6,035 और शादी की नीयत से अपहरण के 8,027 मामले थे. तात्पर्य यह है कि 70 प्रतिशत यानी 14,062 मामले प्रेम प्रसंग और शादी से जुड़े थे. पत्रकार अनुपमा तिवारी कहती हैं, "आज बच्चे और उनका बचपन, दोनों ही खतरे में हैं. बच्चे और उनकी समस्याओं को सरकार को प्राथमिकता में तो रखना ही होगा, वहीं समाज को इनके मामलों के प्रति संवेदनशील होना होगा."

बाल सुधार गृहों का अप्रभावी कार्यशैली

राज्य में कानून के उल्लंघन के आरोपी 18 साल से कम उम्र के बच्चों और किशोरों को देखभाल व संरक्षण के लिए बाल सुधार गृहों में रखा जाता है. जब तक जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (जेजेबी) द्वारा उनके मामले का निपटारा नहीं हो जाता है, तब तक ये बच्चे वहीं रहते हैं. इसके अलावा इन आश्रय गृहों में अनाथ, भटके हुए, हिंसा या दुव्यर्वहार के शिकार नाबालिग लड़के-लड़कियों को भी रखा जाता है. दरअसल, इसकी स्थापना का उद्देश्य ऐसे बच्चों को सुधारना, शिक्षित करना, काउंसलिंग करना तथा उनके पुनर्वास की व्यवस्था कर उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाना है. लेकिन, इन गृहों या आश्रय स्थलों की अप्रभावी कार्यशैली की वजह से यहां से बच्चों के भागने के मामले अक्सर सामने आते रहते हैं. ये पर्यवेक्षण गृह कुप्रबंधन, भीड़भाड़ और सुरक्षा अव्यवस्था के शिकार हैं.

कभी- कभी अमानवीय व्यवहार की शिकायत भी आती है. रविवार की देर रात मुजफ्फरपुर के नरौली बाल गृह से 10 बच्चे भाग गए. यहां 46 बच्चे रह रहे थे. इससे पहले दरभंगा, भागलपुर, मोतिहारी, खगड़िया, सासाराम, जहानाबाद, कटिहार बाल गृह से ऐसे मामले सामने आ चुके हैं. जानकार बताते हैं कि सुविधाओं की कमी, सुरक्षा में लापरवाही, कर्मचारियों द्वारा की जा रही अनदेखी, वहां का आंतरिक माहौल और बंदी जैसा वातावरण बच्चों के भागने की वजहें हैं.

वैसे, राज्य में 2024 में ही बाल और किशोर अपराधियों के मामलों की निगरानी के लिए जिला स्तर पर विशेष किशोर पुलिस इकाई (एसजेपीयू) का गठन किया गया है, साथ ही थाना स्तर पर बाल कल्याण पुलिस पदाधिकारी नियुक्त किए गए हैं. जिन्हें इन बच्चों की देखरेख व संरक्षण का दायित्व दिया गया है. अक्षय कहते हैं, "पुलिस-प्रशासन की कार्यशैली और त्वरित कार्रवाई ना होने से भी डर कम हो रहा है. इसी वजह से जानबूझकर अपराध करने वाले किशोरों की संख्या बढ़ती जा रही है. लोगों को पारिवारिक व सामाजिक स्तर पर जागरूक होना होगा."