Cloudburst News Hindi: जब भी हम 'बादल फटने' की खबर सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में उत्तराखंड या हिमाचल जैसे पहाड़ी इलाकों की तस्वीरें आती हैं. लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि दिल्ली या मुंबई जैसे बड़े और मैदानी शहरों में भी बादल फट सकता है? आजकल जिस तरह मौसम का मिजाज बदल रहा है, यह सवाल बहुत ज़रूरी हो गया है.
सबसे पहले, ये समझिए कि बादल फटना होता क्या है?
बादल फटना मतलब किसी एक छोटी सी जगह पर बहुत ही कम समय में बहुत ज़्यादा बारिश हो जाना. इसे ऐसे समझिए जैसे पानी से भरा कोई बड़ा गुब्बारा अचानक आसमान में फट गया हो और सारा पानी एक साथ नीचे आ गिरे.
मौसम विज्ञान की भाषा में, अगर किसी एक जगह पर एक घंटे के अंदर 100 मिलीमीटर (100 mm) या उससे ज़्यादा बारिश हो जाए, तो उसे बादल फटना कहते हैं. यह बारिश इतनी तेज़ होती है कि कुछ ही मिनटों में बाढ़ जैसे हालात पैदा कर देती है.
ज़्यादातर पहाड़ों पर ही क्यों फटते हैं बादल?
इसका एक खास कारण है. जब नमी से भरी गर्म हवा पहाड़ों से टकराती है, तो वह तेजी से ऊपर उठने लगती है. ऊपर जाकर यह हवा ठंडी होती है और इसमें मौजूद पानी की बूंदें बहुत तेज़ी से एक जगह जमा हो जाती हैं. जब इन बूंदों का वजन इतना ज़्यादा हो जाता है कि बादल उन्हें संभाल नहीं पाता, तो वह अचानक एक ही जगह पर सारा पानी गिरा देता है. पहाड़ों की ढलान की वजह से यह पानी बहुत तेजी से नीचे आता है और तबाही मचाता है.
तो फिर दिल्ली और मुंबई में इसका कितना खतरा है?
अब आते हैं मुख्य सवाल पर. क्या दिल्ली और मुंबई में ऐसा हो सकता है? सैद्धांतिक रूप से यह संभव है, लेकिन इसकी संभावना और कारण थोड़े अलग हैं.
मुंबई का मामला:
मुंबई में इसका खतरा दिल्ली के मुकाबले थोड़ा ज़्यादा है. इसके कुछ कारण हैं:
- भरपूर नमी: समुद्र के किनारे होने की वजह से मुंबई की हवा में नमी बहुत ज़्यादा होती है, जो भारी बादलों को बनाने के लिए ज़रूरी है.
- ऊंचे-नीचे इलाके: मुंबई पूरी तरह से मैदानी नहीं है. यहां संजय गांधी नेशनल पार्क जैसे कुछ पहाड़ी और ऊंचे-नीचे इलाके हैं जो बादलों को ऊपर की ओर धकेल सकते हैं.
- मानसून: मानसून के समय अरब सागर से आने वाली हवाएं बहुत शक्तिशाली होती हैं और अपने साथ भारी मात्रा में नमी लाती हैं.
इन वजहों से मुंबई में कभी-कभी "बादल फटने जैसी" घटनाएं हो सकती हैं, जहां बहुत कम समय में अत्यधिक बारिश हो जाती है.
दिल्ली का मामला:
दिल्ली एक मैदानी इलाका है, इसलिए यहां बादल फटने की पारंपरिक स्थितियां नहीं बनतीं. यहां ऊंचे पहाड़ नहीं हैं जो बादलों को रोककर एक जगह पानी बरसाने पर मजबूर कर दें.
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि खतरा बिलकुल नहीं है.
- अरावली का रिज: दिल्ली में अरावली की पहाड़ियों का एक छोटा हिस्सा है (जिसे हम 'रिज' कहते हैं). यह कुछ हद तक मौसम पर असर डाल सकता है.
- शहरी गर्मी (Urban Heat Island): शहरों की गर्मी और प्रदूषण की वजह से कभी-कभी स्थानीय मौसम में ऐसे बदलाव आते हैं, जो अचानक बहुत भारी बारिश का कारण बन सकते हैं.
- मानसून और पश्चिमी विक्षोभ: जब मानसून और पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) जैसी दो अलग-अलग मौसम प्रणालियाँ दिल्ली के ऊपर मिलती हैं, तो ये बहुत शक्तिशाली बादल बना सकती हैं.
इसलिए, दिल्ली में सीधे तौर पर बादल फटना दुर्लभ है, लेकिन "बादल फटने जैसी" यानी एक छोटे इलाके में अचानक बहुत भारी बारिश की घटना से इनकार नहीं किया जा सकता.
सबसे बड़ा खतरा: बदलता मौसम
क्लाइमेट चेंज की वजह से पूरी दुनिया में मौसम का मिजाज बिगड़ रहा है. गर्म होती धरती की वजह से हवा में ज़्यादा नमी टिक सकती है. इसका मतलब है कि जब भी बारिश होगी, उसके बहुत ज़्यादा भारी होने की आशंका बढ़ जाती है. यही कारण है कि अब मैदानी इलाकों में भी कुछ ही घंटों में रिकॉर्ड तोड़ बारिश देखने को मिल रही है.
अगर ऐसा हुआ तो क्या होगा?
कल्पना कीजिए कि दिल्ली या मुंबई के किसी व्यस्त इलाके में एक घंटे में 100 मिलीमीटर बारिश हो जाए.
- चंद मिनटों में सड़कें नदियों में बदल जाएंगी.
- भयंकर जलभराव और ट्रैफिक जाम लग जाएगा.
- अंडरपास और निचले इलाके पूरी तरह से पानी में डूब जाएंगे.
- हमारे शहरों का ड्रेनेज सिस्टम इतनी भारी बारिश को संभालने के लिए नहीं बना है, जिससे हालात और बिगड़ जाएंगे.
तो कुल मिलाकर बात यह है कि दिल्ली और मुंबई में ठीक पहाड़ों की तरह बादल फटने की घटना दुर्लभ है, लेकिन नामुमकिन नहीं. इससे भी बड़ा और वास्तविक खतरा "बादल फटने जैसी" अत्यधिक भारी बारिश का है, जिसकी घटनाएं अब बढ़ रही हैं. इसके लिए हमारे शहरों को अपने ड्रेनेज सिस्टम और आपदा प्रबंधन को और बेहतर बनाने की सख्त जरूरत है.













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