बॉम्बे हाई कोर्ट ने पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा को किया बरी
बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा और पांच अन्य लोगों को बरी कर दिया है.
बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा और पांच अन्य लोगों को बरी कर दिया है. साईबाबा पर सरकार ने प्रतिबंधित माओवादी संगठनों के लिए काम करने के आरोप लगाए थे.न्यायमूर्ति विनय जोशी और वाल्मीकि एसए मेनेजेस की पीठ ने एक सेशंस अदालत के 2017 के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसके तहत साईबाबा और अन्य लोगों को दोषी साबित किया गया था.
बॉम्बे हाई कोर्ट ने ही इससे पहले भी अक्टूबर, 2022 में साईबाबा को बरी किया था, लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने उस फैसले के खिलाफ तुरंत सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी. सुप्रीम कोर्ट ने 2 मार्च को एक विशेष सुनवाई में उस आदेश को खारिज कर हाई कोर्ट को मामले पर फिर से सुनवाई करने का आदेश दिया था.
क्या है मामला
साईबाबा और अन्य लोगों को महाराष्ट्र में गडचिरोली पुलिस ने 2013 से 2014 के बीच गिरफ्तार किया था. उन सब पर प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) और उसके सहयोगी संगठन रेवोल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट के सदस्य होने का आरोप था.
पुलिस ने दावा किया था कि साईबाबा के घर से कई दस्तावेज, एक हार्ड डिस्क और कुछ पेन ड्राइव बरामद हुई थीं, जिनमें माओवादी साहित्य, चिट्ठियां, रिसाले और सीपीआई (माओवादी) की बैठकों की ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग थी.
साईबाबा और महेश करीमन तिर्की, हेम केशवदत्त मिश्रा, पांडु पोरा नारोते और प्रशांत राही को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. विजय तिर्की को 10 साल कारावास की सजा सुनाई गई.
दिल्ली विश्वविद्यालय ने साईबाबा को निलंबित कर दिया और बाद में उन्हें नौकरी से निकाल भी दिया.
लंबे समय से बहुत बीमार हैं साईबाबा
54 साल के साईबाबा 80 प्रतिशत विकलांग हैं और व्हीलचेयर पर ही कहीं जा पाते हैं. कुछ मीडिया रिपोर्टों में उन्हें 99 प्रतिशत विकलांग बताया गया है. उनके परिवार ने बार-बार अदालत से अपील की कि स्वास्थ्य आधार पर उन्हें जमानत दे दी जाए.
मई 2015 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने उन्हें जमानत दे भी दी, लेकिन जल्द ही उन्हें फिर से जेल भेज दिया गया. सितंबर 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत दी और तब वो जेल से निकल पाए. मुकदमा चलता रहा.
पहली बार क्यों हुए थे बरी
अक्टूबर, 2022 में उन्हें बरी करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा था कि उनके मामले में कानूनी प्रक्रिया का पूरी तरह से पालन नहीं हुआ है. दरअसल उन्हें 'अनलॉफुल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) ऐक्ट' (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार किया गया था.
ऐसे मामलों में कोई भी अदालत अपराध को संज्ञान में तब तक नहीं ले सकती, जब तक राज्य सरकार या केंद्र सरकार से अनुमति ना मिल जाए.
हाई कोर्ट ने कहा था कि इस मामले में सेशंस अदालत ने बिना अनुमति मिले मामले को संज्ञान में ले लिया था, जो कि प्रक्रिया का उल्लंघन है. इसके अलावा अदालत ने यह भी कहा था कि बाद में जब अनुमति आई भी, तो वह किसी स्वतंत्र अथॉरिटी की जगह डायरेक्टरेट ऑफ प्रॉसिक्यूशन से ली गई, और यह भी तय प्रक्रिया का उल्लंघन है.
इसी आधार पर अदालत ने साईबाबा और अन्य लोगों को बरी कर दिया था. उन्हें बरी करने का फैसला देने वाली पीठ के एक सदस्य न्यायमूर्ति रोहित देव ने अगस्त 2023 में इस्तीफा दे दिया था.
उन्होंने भरी अदालत में निजी कारणों की वजह से इस्तीफे की घोषणा की थी. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उन्होंने यह भी कहा था कि वो अपने आत्मसम्मान के खिलाफ काम नहीं कर सकते थे.
(The above story first appeared on LatestLY on Mar 05, 2024 05:20 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

