पौराणिक कथाओं के अनुसार ब्रह्मा ने जब प्रकृति का निर्माण किया तो उन्होंने महसूस किया कि हर चीज उत्कृष्ट होने के बावजूद कहीं कुछ कमी रह गयी थी. इस पर विष्णुजी ने ब्रह्माजी को अपनी कमंडल से जल की कुछ बूंदे पृथ्वी पर छिड़कने के लिये कहा. ब्रह्माजी के ऐसा करते हाथों में वीणा लिए माता सरस्वती का प्रकाट्य हुआ और ज्यों ही उन्होंने वीणा पर अपनी उंगलियां फेरी, प्रकृति की एक-एक चीजें मानों बोल पड़ी हों. सुर और स्वरों ने प्रकृति में एक नई जान फूंक दी. ऐसी ही घटनाक्रमों की तरह थी भारतीय सिनेमा. पहली मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ की रिलीज के 18 साल बाद सुर और स्वर के साथ ‘आलम आरा’ (Alam Ara) दर्शकों के सामने अवतरित हुई, तो सिनेमाई प्रेमियों के चेहरे खिल उठे थे. आज देश की पहली टाकी फिल्म ‘आलम आरा’ की रिलीज के 89 वर्ष पूरे हो चुके. इसके बाद लगातार होते शोधों एवं विकसित तकनीक के साथ भारतीय सिनेमा विश्व सिनेमा के समानांतर पहुंच चुका है. आज भी सिनेमा सबसे मुश्किल तकनीक होते हुए भी मनोरंजन का सबसे सस्ता माध्यम बना हुआ है.
आइये जानें भारत की इस पहली टाकी फिल्म के निर्माण की पृष्ठभूमि क्या थी.
मूक ‘राजा हरिश्चंद्र’ से टाकी ‘आलम आरा’ तक का सफर
मूक फिल्म के दौर का पटाक्षेप करते हुए 14 मार्च 1931 शनिवार के दिन देश की पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ मुंबई के मैजेस्टिक सिनेमा हाल में रिलीज हुई थी. फिल्म के निर्देशक थे अर्देशर ईरानी. दर्शकों ने जब परदे पर नाचती, गाती और बोली आकृतियों को देखा तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. लेकिन 1913 में मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ से शुरू हुआ सफर क्या बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ तक पहुंचने का सफर सचमुच बहुत आसान था? ‘आलम आरा’ के निर्माण में किन-किन समस्याओं का सामना करना पड़ा? और इसके बनने से लेकर दर्शकों तक पहुंचाने में अर्देशर ईरानी को क्या-क्या पापड़ बेलने पड़े आइए जानते हैं.
मूक फिल्मों से दर्शक ऊब चुके थे
कहा जाता है कि ‘राजा हरिश्चंद्र’ के निर्माण के बाद सिनेमा प्रेमियों की उम्मीदें बढ़ने लगी थी. अब उन्हें मूक फिल्में रास नहीं आ रही थीं, क्योंकि तब तक भारतीय सिनेमा घरों में विदेशों की बोलती फिल्में पहुंच चुकी थीं. और वे दर्शकों का भरपूर मनोरंजन कर रही थीं. कहते हैं कि पहली मूक फिल्म बनाने का श्रेय पानेवाले निर्माता निर्देशक दादा साहब फाल्के ने बोलती फिल्म बनाने के काफी प्रयास किये लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली.
क्या थी समस्याएं
भारतीय सिनेमा का इतिहास बताता है कि जिन दिनों अर्देशर ईरानी ‘आलम आरा’ के निर्माण में व्यस्त थे, उन्हीं दिनों कुछ और भी निर्माता बोलती फिल्म बनाने में मशगूल थे. यह बात जब अर्देशर ईरानी को पता चली तो उन्होंने ‘आलम आरा’ निर्माण की प्रक्रिया तेज कर दी. वे चाहते थे कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में पहली बोलती फिल्म बनाने एवं रिलीज करने का रिकॉर्ड उनके नाम से दर्ज हो. लेकिन उस जमाने में तकनीक इतनी विकसित नहीं थी, तमाम कोशिशों के बावजूद रिकॉर्डिंग के समय आसपास की अवांछित आवाजें भी रिकार्ड हो जाती थी. ऐसे में दिन में शूटिंग करने में बहुत दिक्कतें आती थीं, चूंकि सभी कलाकार पूर्व में मूक फिल्में ही किए हुए थे, इसलिए टाकी फिल्म करने के लिए उन पर ज्यादा मेहनत करनी पड़ती थी. उन्हें घंटों सिखाया जाता था कि तुम्हें माइक पर कैसे और कितनी स्पीड में बोलना है. इसके अलावा टैनोर सिंगल सिस्टम कैमरे से शूट करने में बड़ी दिक़्क़त होती थी. एक ही ट्रैक पर साउंड और पिक्चर रिकॉर्ड किये जाते थे, इसलिए कलाकारों को एक ही टेक में शॉट को फाइनल करना होता था. एक और जो अहम समस्या यह थी वह यह कि कैमरे के प्रिंट को स्टोर नहीं किया जा सकता क्योंकि वो नाइट्रेट प्रिंट था, जो बड़ी जल्दी आग पकड़ लेता था. इसके लिये जरूरी था कि सभी की सक्रियता से कम से कम समय में फिल्म को रिलीज कर दिया जाए
इस पारसी नाटक पर आधारित थी ‘आलम आरा’
इतिहासकारों के अनुसार ‘आलम आरा’ जोसेफ़ डेविड निर्देशित एक पारसी नाटक पर आधारित थी. आर्देशर थियेटर में इस पारसी नाटक को देखकर बहुत प्रभावित हुए थे. उन्होंने उसी समय तय कर लिया था कि वे इसे कुछ गानों के साथ फिल्म के परदे पर ले जाएंगे. अंततः लंबे प्रयासों और संघर्षो के बाद पहली टाकी फिल्म ‘आलम आरा’ बनाने का श्रेय अर्देशर ईरानी के नाम दर्ज हुआ. कहा जाता है कि इस बात से वे इतने प्रफुल्लित थे कि मैजेस्टिक सिनेमा घर में जब ‘आलम आरा’ का प्रीमियर रखा गया था तो सिनेमा घर के मुख्य गेट पर स्वयं अर्देशर मेहमानों का स्वागत कर रहे थे.













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