20वीं सदी के तानसेन थे बड़े गुलाम अली खान, जिनकी ठुमरी पर देश झूमता था...
उस्ताद बड़े गुलाम अली खां (Photo Credits: Facebook)

पटियाला (Patiala) घराने के उस्ताद बड़े गुलाम अली खां (Bade Ghulam Ali Khan) की गायकी और उनकी शख्सियत को चंद शब्दों में समेटना आसान नहीं. शास्त्रीय संगीत का एक ऐसा साधक, ऐसा विद्वान और गायक, जिनके तिलस्मी आवाज से आज की पीढ़ियां भी भाव-विह्वल हो जाती हैं. बड़े गुलाम अली खयाल, ध्रुपद, ठुमरी सब कुछ गाते थे लेकिन उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी ठुमरी, जो बनारस की गलियों को आज भी सजीव बनाती हैं. बड़े गुलाम अली की 51वीं पुण्य-तिथि (25 अप्रैल) पर भावभीनी श्रद्धांजलि...

पटियाला घराने की विरासत

सन 1902 में लाहौर के केसुर कस्बे में पिता अली बख्श के घर में पैदा हुए गुलाम अली खान ने पांच वर्ष की अवस्था से संगीत में तालीम लेनी शुरु कर दी थी. अली बख्श खान भी अपने जमाने के जाने-माने गायक और सारंगीवादक थे. लेकिन बड़े गुलाम अली ने सारंगी वादन और गायकी की कला अपने चाचा काले खान के सानिध्य में सीखी थी. उस्ताद काले खान का नाम भी उन दिनों के सफलतम गायक और कंपोजर में शुमार था. उन दिनों की बड़ी-बड़ी महफिलें काले खान के बिना सूनी मानी जाती थीं. 21 वर्ष की उम्र में बड़े गुलाम अली खान बनारस आ गये. बनारस आते ही उन्होंने सारंगी पर संगत देने के साथ-साथ स्वतंत्र गायकी भी शुरू कर दी. इस युवा ने अपने फन से प्रशंसकों के दिल में ऐसी पैठ बनाई कि उनकी गायकी का जादू बंगाल के जादू पर भारी पड़ा. कलकत्ता के एक बड़े समारोह में अनुभवी संगीतज्ञों की भीड़ में इस युवा ने अपने फन का वह जादू बिखेरा कि फिर उन्हें पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ी.

भारतीय मिट्टी ज्यादा भाई

साल 1947 में जब भारत के दो टुकड़े हुए, तब केसुर कस्बा पाकिस्तान के हिस्से में चला गया, लिहाजा उऩ्हें भी पाकिस्तान जाना पड़ गया. लेकिन भारत की मिट्टी में मिला प्यार, स्नेह और प्रशंसा उन्हें वापस हिंदुस्तान खींच लाई. इसके बाद वे यहीं के बनकर रह गये.

तो भारत का बंटवारा नहीं होता

बंटवारे के दर्द से बड़े गुलाम अली भी बहुत द्रवित हुए थे. एक एक समारोह में उनके दिल का दर्द जुबान पर छलक आया. उन्होंने कहा था, -अगर हिंदुस्तान के हर घर में एक भी बच्चे को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत सिखाया गया होता तो भारत के दो टुकड़े नहीं होते. इतना विश्वास था उन्हें हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत पर. हिंदुस्तान में आकर वह यहां की मिट्टी में रच बस चुके थे. लेकिन 1957 में मोरार जी देसाई ने उन्हें हिंदुस्तान की नागरिकता दिलाने में बहुत मदद की. भारत सरकार ने‘अतिथि देवो भव’ की तर्ज पर उनका खूब सादर-सत्कार किया. केंद्र सरकार ने उऩ्हें बंबई के सबसे ढनाढ्य एरिया मलाबार हिल्स में समंदर किनारे एक खूबसूरत बंगला भेंट किया. यह अलग बात थी कि उनके फन के इतने कद्रदान थे कि उनके पांव बंबई में टिकते ही नहीं थे. उनका ज्यादातर वक्त कलकत्ता, लाहौर और हैदराबाद आदि जगहों पर बीतता था.

काम नहीं करना तो नहीं करना

बड़े गुलाम अली थोड़े आलसी किस्म के थे, या यूं कहिए कि वे स्वयं को काम के बोझ के नीचे दबने नहीं देना चाहते थे. इसलिए जब कोई उन्हें अपनी फिल्म में काम देने की पेशकश करता तो वे अपनी कीमत 25 हजार रूपए बताते थे, ताकि निर्माता उल्टे पैरों घर वापस लौट जाए. क्योंकि उन दिनों मो रफी और लता मंगेशकर सबसे ज्यादा पारिश्रमिक (पांच सौ रुपये) लेते थे. वह तो के. आसिफ का जिद और जुनून था, जो उन्हें अपनी फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ के लिए गवाने के लिए तैयार कर सका था.

सर चढ़कर बोलती थी उनकी ठुमरी

पटियाला घराने के उस्ताद बड़े गुलाम अली खां की गायकी और उनकी शख्सियत को शब्दों में समेटना बेहद मुश्किल काम है. वह खयाल, ध्रुपद, ठुमरी सब कुछ गाते थे लेकिन उनकी ठुमरी की दीवानगी श्रोताओं के सर चढ़कर बोलती थी. ‘का करूं सजनी आए न बालम’, ‘प्रेम जोगन बन के’, ‘कंकर मार जगाए’, ‘याद पिया की आए’, ‘नैना मोरे तरस रहे’, उनकी ये ठुमरियां आज भी कोई सुनता है तो उसके लिए समय ठहर-सा जाता है. यही वजह थी कि बड़े-बड़े संगीतकार भी उन्हें बीसवीं सदी का तानसेन मानते थे.

सम्मान

बड़े गुलाम अली मानते थे कि उनका सबसे बड़ा पुरस्कार सामने बैठे दर्शक होते थे, जो अच्छे-बुरे का रियेक्शन तुरंत दर्शा देते थे. हालांकि 1962 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया. इसके बाद संगीत नाट्य अकादमी अवार्ड से भी उनका सम्मान किया गया.

खाक-ए-सिपुर्द हुए

जीवन के अंतिम पड़ाव में बड़े गुलाम अली खान लंबी बीमारी के पश्चात लकवा के शिकार हो गये थे. अंततः 25 अप्रैल 1968 में हैदराबाद के बशीरगढ़ पैलेस में खान साहब ने अंतिम सांसे ली.