विदेश की खबरें | शांति वार्ताओं में 20 साल बाद भी महिलाओं की समान भागीदारी नहीं: संयुक्त राष्ट्र

उन्होंने कहा कि महिलाओं को संघर्षों को समाप्त करने के लिए होने वाली वार्ताओं से अब भी ’’सोच समझकर बाहर’’ रखा जाता हैं और इन वार्ताओं में पुरुष उनके जीवन को प्रभावित करने वाले फैसले लेते हैं।

संयुक्त राष्ट्र महिला की कार्यकारी निदेशक फुमजिले म्लाम्बो नगकुका ने सुरक्षा परिषद को बताया कि कुछ अच्छी पहलों के बावजूद 1992 से 2019 तक मात्र 13 प्रतिशत महिलाएं शांति वार्ताओं में वार्ताकारों के तौर पर शामिल की गई, मात्र छह प्रतिशत महिलाओं ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई और मात्र छह प्रतिशत महिलाएं इन समझौतों पर हस्ताक्षर करने वालों में शामिल रहीं।

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उन्होंने कहा कि वार्ताकारों ने महिलाओं और शांति स्थापित करने वाले अन्य लोगों को सशक्त बनाने के बजाए ‘‘हिंसा को बढ़ावा देने वाले कारकों’’ को सशक्त बनाया और महिलाओं को या तो ‘‘अनौपचारिक प्रक्रियाओं में शामिल रखा गया या फिर उन्हें केवल दर्शक की भूमिका में रखा गया’’।

जर्मनी की विदेश राज्य मंत्री मिशेल मुंटेफेरिंग ने 31 अक्टूबर, 2000 में पारित संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव को ‘‘छोटी क्रांति’’ बताया, क्योंकि सुरक्षा परिषद ने पहली बार मिलकर यह स्पष्ट किया कि ‘‘विश्व में शांति एवं सुरक्षा कायम रखने के लिए’’ महिलाओं की समान भागीदारी आवश्यक है।

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उन्होंने कहा कि सुरक्षा और संघर्ष रोकथाम के लिए लैंगिक समानता बहुत आवश्यक है और लैंगिक हिंसा या यौन उत्पीड़न ऐसा अपराध है, जिसके लिए सजा दी जानी चाहिए और इसे समाप्त किया जाना चाहिए।

मुंटेफेरिंग ने कहा, ‘‘20 साल और बाद में मुश्किल से पारित हुए सुरक्षा परिषद के नौ प्रस्तावों के बावजूद... महिलाओं को अब भी शांति वार्ताओं से बाहर रखा गया है और संघर्ष समाप्त होने के बाद समाज निर्माण करते समय उनके अधिकारों एवं हितों को अब भी नजरअंदाज किया जाता है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘हम वैश्विक समुदाय के तौर पर हमारी प्रतिबद्धता पूरी नहीं कर पाए हैं।’’

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने परिषद में दोहराया कि नेतृत्व की भूमिका में पुरुषों का ही आधिपत्य है और केवल सात प्रतिशत देशों का नेतृत्व महिलाएं करती हैं।

उन्होंने कहा कि महिलाओं को शांति वार्ताओं के प्रतिनिधिमंडल से आमतौर पर बाहर ही रखा जाता है।

एपी

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