देश की खबरें | स्पेक्ट्रम साझा करने के शुल्क सहित एजीआर के बकाये के रूप में 195 करोड का भुगतान किया : जियो
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. रिलायंस जियो ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि उसने समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) संबंधी बकाये में 195 करोड़ रुपए का भुगतान किया है। इसमें रिलायंस कम्युनिकेशंस (आरकॉम) का स्पेक्ट्रम साझा करने का शुल्क भी शामिल है।
नयी दिल्ली, 18 अगस्त रिलायंस जियो ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि उसने समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) संबंधी बकाये में 195 करोड़ रुपए का भुगतान किया है। इसमें रिलायंस कम्युनिकेशंस (आरकॉम) का स्पेक्ट्रम साझा करने का शुल्क भी शामिल है।
रिलायंस जियो ने कहा कि दूसरी कंपनी का एजीआर से संबंधित बकाया राशि का एक ऑपरेटर द्वारा भुगतान करने का सवाल ही पैदा नहीं होता जैसा की शीर्ष अदालत ने पहले सुझाव दिया था और उसने अपनी सारी देनदारियों का भुगतान कर दिया है।
देश के सबसे धनी कारोबारी मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाली जियो ने न्यायालय से कहा कि अगर अभी भी आरकॉम का स्पेक्ट्रम साझा करने संबंधी कोई रकम बकाया है तो वह इसका भुगतान करने के लिये तैयार है।
न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा, न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर और न्यायमूर्ति एम आर शाह की तीन सदस्यीय पीठ को रिलायंस जियो और आरकॉम के ऋणदाताओं की समिति की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा कि यह निर्णय करना अभी जल्दबाजी होगी कि क्या दिवाला और ऋण अक्षमता संहिता के तहत स्पेक्ट्रम बेचा जा सकता है या नहीं। पीठ इस मामले में बुधवार को भी सुनवाई करेगी।
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साल्वे ने कहा जब आरकॉम समाधान के आवेदक स्पेक्ट्रम बेचने के बारे में दूरसंचार विभाग जायेंगे तभी इसका निर्णय होगा।
पीठ ने टिप्पणी की कि समायोजित सकल राजस्व से संबंधित बहुत बड़ी रकम देय है और वह इसे ऐसे ही नहीं जाने देगी।
पीठ ने कहा, ‘‘हमने एक निश्चित अवधि के भीतर एजीआर की बकाया राशि के भुगतान का निर्देश दिया था लेकिन सरकार 20 साल का समय चाहती है, इस दौरान अगर कंपनियां दिवालिया हो गयी तो क्या होगा। हम इस कार्यवाही के प्रति सजग हैं और हम अपनी सीमा से बाहर नहीं जायेंगे।’’
न्यायालय ने कहा कि वह इस मामले से जुड़े सारे कानूनी मुद्दों का फैसला करेगा और अंतिम रूप से ऐसा किया जायेगा।
साल्वे ने दलील दी कि आरकॉम के खिलाफ एरिक्सन ने दिवालिया कार्यवाही शुरू की थी जिसे स्वीडन की दूरसंचार उपकरण बनाने वाली कंपनी की बकाया राशि का भुगतान करने के बाद भी वापस नहीं लिया जा सका।
उन्होंने कहा कि ऋणदाताओं की समिति ने समाधान योजना स्वीकार की है जिसमें दूरसंचार विभाग की सहमति मिलने पर आरकॉम के स्पेक्ट्रम की नीलामी की भी परिकल्पना है।
साल्वे ने कहा कि यूवी असेट पुनर्निर्माण कंपनी पहले अनिल अंबानी के नेतृत्व वाली आरकॉम के लिये बोली लगाने वालों में सबसे ऊपर है।
उन्होंने कहा कि आरकॉम के लिये बोली लगाने में जियो की दिलचस्पी नहीं है और यूवी असेट पुनर्निर्माण कंपनी के इक्विटी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और बीमा कंपनियों से आती है।
साल्वे ने कहा कि दूरसंचार विभाग द्वारा 2015 के दिशानिर्देशों के तहत अनुमति दिये जाने के बाद ही विभिन्न ऑपरेटरों के बीच स्पेक्ट्रम साझा किया गया और जियो दिवाला कार्यवाही शुरू होने से पहले ही आरकॉम के स्पेक्ट्रम को खरीदने की सोच रही थी बशर्ते दूरसंचार विभाग इसकी बिक्री को मंजूरी दे।
पीठ ने साल्वे से सवाल किया कि क्या इस रकम में आरकॉम के स्पेक्ट्रम के इस्तेमाल का शुल्क भी शामिल है तो उन्होंने जवाब दिया कि जियो को कुल 195 करोड़ रुपए का भुगतान करना था। उन्होंने कहा कि त्रिपक्षीय लाइसेंस समझौते के अंतर्गत सरकार ने माना है कि दूरसंचार कंपनियां बैंकों से धन का बंदोबस्त करने के लिये गारंटी के रूप में स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल कर सकती हैं।
उन्होंने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक तो सभी धन उपलब्ध करायेंगे गारंटी को मुद्रीकृत करने की अनुमति होगी।
पीठ ने एक बार फिर अपने पहले सवाल को दोहराया कि आरकॉम ने अपनी संपत्ति पहले 35,000 करोड़ रुपए से ज्यादा होने का दावा किया था लेकिन अब इसकी कीमत 10,000 करोड़ रुपए से कुछ ज्यादा है।
पीठ ने साल्वे से सवाल किया कि एरिक्सन की बकाया राशि के भुगतान के बाद भी आरकॉम कैसे आईबीसी के तहत है जबकि कंपनी ने स्वयं को दिवाला कार्यवाही के लिये अलग से पेश नहीं किया था।
साल्वे ने कहा कि एक बार जब आरकॉम की दिवाला कार्यवाही शुरू हो गयी तो एरिक्सन का भुगतान होने के बाद भी यह जारी रहेगी और इससे बाहर निकलने का एक ही रास्ता है कि बकाया राशि के बारे में ऋणदाताओं के दावों के 90 प्रतिशत का भुगतान किया जाये, जिसका भुगतान करना संभव नहीं है।
शीर्ष अदालत ने मंगलवार को केन्द्र से जानना चाहा कि आरकॉम के 800 मेगाहर्टज स्पेक्ट्रम को साझा करने से राजस्व अर्जित कर रही जियो को क्यों नहीं एजीआर से संबंधित बकाया राशि का भुगतान सरकार को करने के लिये कहा जाये।
केन्द्र ने न्यायालय से कहा था कि दिवाला प्रक्रिया के दौरान स्पेक्ट्रम की बिक्री के मुद्दे पर दूरसंचार विभाग और कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के बीच मतभेद हैं।
सरकार का कहना था कि दूरसंचार विभाग का लगातार यही रुख रहा है कि दिवाला कार्यवाही के दौरान स्पेक्ट्रम बेचा नहीं जा सकता है जबकि कार्पोरेट मामलों का मंत्रालय अधिकतम कीमत पर स्पेक्ट्रम बेचने की अनुमति चाहता है।
न्यायालय ने 14 अगस्त को रिलायंस कम्युनिकेशंस और रिलायंस जियो के बीच स्पेक्ट्रम साझा करने के लिये हुये समझौते का विवरण मांगा था और यह जानना चाहा था कि दूसरी कंपनी के स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल करने वाली कंपनी से सरकार समायोजित सकल राजस्व से संबंधित बकाया राशि की मांग क्यों नहीं कर सकती है।
अनूप
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(The above story first appeared on LatestLY on Aug 18, 2020 09:11 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

