नयी दिल्ली, 31 अगस्त उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि कानून के तहत फैसले की निष्पक्ष आलोचना की इजाजत है लेकिन कोई भी व्यक्ति संस्थान को बदनाम करने के लिये अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार की सीमा नहीं लांघ सकता।
शीर्ष अदालत ने कहा कि जब अभिव्यक्ति की आजादी का दुरूपयोग किया जाये और इसका प्रभाव पूरे संस्थान को बदनाम करने वाला हो और इस संस्थान के सदस्य जो सार्वजनिक रूप से अपना बचाव नहीं कर सकते, तो कानून में इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती।
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न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा, ‘‘बोलने की आजादी कभी भी निर्बाधित नहीं रही है क्योंकि संविधान निर्माताओं ने इस पर कुछ प्रतिबंध लगा रखे हें। विशेषकर जब ऐसी आजादी का दुरूपयोग किया जा रहा हो और इसका प्रभाव पूरे संस्थान को ही बदनाम करने वाला हो और ऐसे संस्थान के सदस्य सार्वजनिक रूप से अपना बचाव नहीं कर सकें तो कानून में इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।’’
पीठ ने कहा कि फैसले की निष्पक्ष आलोचना की कानून में अनुमति है लेकिन संस्थान को बदनाम करने के लिये कोई भी व्यक्ति संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) में प्रदत्त अधिकार की सीमा नहीं लांघ सकता।
पीठ ने अपने फैसले में कहा कि इस मामले में लगाये गये आरोप ‘बदनाम करने वाले थे और वे न्यायिक प्रशासन की बुनियाद को हिलाने और न्याय के प्रशासन के प्रति आम आदमी के विश्वास को डगमगाने की क्षमता रखते थे।
पीठ ने आपराधिक अवमानना के लिये दोषी अधिवक्ता प्रशांत भूषण पर एक रूपए का सांकेतिक जुर्माना लगाने का फैसला सुनाते हुये यह टिप्पणी की। न्यायालय ने न्यायपालिका के प्रति अपमानजनक दो ट्विट को लेकर भूषण को 14 अगस्त को अवमानना का दोषी ठहराया था।
न्यायालय ने कहा कि हालांकि भूषण की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने यह दलील दी थी कि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बोलने की आजादी संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(क) का हिस्सा है। लेकिन हम इससे संतुष्ट नहीं है कि संविधान के अनुच्छेद 129 के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल करते समय हम अनुच्छेद 19 (1)(क) में प्रदत्त अधिकारों में हस्तक्षेप कर रहे हैं। शीर्ष अदालत कोर्ट ऑफ रिकार्ड होने की वजह से अवमानना के लिये दंडित कर सकती है।
अनूप
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