देश की खबरें | मप्र: जेल में यातनाओं के दौरान जबरन बाल काटे जाने पर दो सहजधारी सिखों को मुआवजे की सिफारिश

इंदौर, सात मार्च मध्यप्रदेश मानवाधिकार आयोग ने इंदौर की जिला जेल में दो सहजधारी सिखों के कथित तौर पर जबरन बाल काटकर उन्हें यातनाएं दिए जाने के मामले में राज्य सरकार से दोनों व्यक्तियों को 50,000-50,000 रुपये का मुआवजा प्रदान करने की सिफारिश की है। आयोग के एक अधिकारी ने सोमवार को यह जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि 18 जून 2019 को सड़क पर कार खड़ी करने के विवाद में जिला जेल के तत्कालीन जेलर ललित दीक्षित ने आग-बबूला होकर दोनों पीड़ितों के लिए कथित तौर पर अपशब्दों का इस्तेमाल किया और लसूड़िया पुलिस थाने के तत्कालीन प्रभारी संतोष दूधी को फोन कर मौके पर बुलवा लिया।

अधिकारी ने बताया कि दोनों व्यक्तियों को थाने के हवालात में बंद कर दिया गया और बाद में दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 151 (संज्ञेय अपराध घटित होने से रोकने के लिए की जाने वाली एहतियातन गिरफ्तारी) के तहत जेल भेज दिया गया।

अधिकारी ने बताया कि दोनों युवकों ने राज्य मानवाधिकार आयोग को शिकायत करते हुए आरोप लगाया कि गेहूं पीसने की मशीन के पट्टे से जेल में उनकी पिटाई की गई और उन्हें भोजन नहीं दिया गया।

उन्होंने बताया कि पीड़ितों ने शिकायत में खुद को सहजधारी सिख बताते हुए यह आरोप भी लगाया कि उनकी धार्मिक मान्यताओं के विपरीत उनके बाल जेल में जबरन काट दिए गए, जबकि वे पिछले कुछ दिनों से अपने बाल बढ़ा रहे थे।

इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, "सहजधारी" सिख एक ऐसा व्यक्ति है जिसने सिख धर्म का मार्ग चुना है, लेकिन वह अब तक "अमृतधारी" (खालसा में दीक्षित सिख) नहीं बना है।

अधिकारी ने बताया कि आयोग ने पाया कि जेलर और थाना प्रभारी ने दोनों पीड़ितों के साथ ‘‘अमानवीय व्यवहार’’ किया जिससे उनके मानव अधिकारों का ‘‘घोर उल्लंघन हुआ।’’

उन्होंने बताया कि आयोग ने दोनों पीड़ितों में से प्रत्येक को 50,000 रुपये का मुआवजा एक माह के भीतर दिए जाने की अनुशंसा करते हुए कहा है कि राज्य सरकार चाहे तो वह इस राशि की वसूली संबंधित अधिकारियों से भी कर सकती है।

अधिकारी ने बताया कि राज्य सरकार से यह भी कहा गया है कि जेलर और थाना प्रभारी के खिलाफ विभागीय जांच की जाए और इस जांच के परिणाम से आयोग को एक माह के भीतर अवगत कराया जाए।

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