नयी दिल्ली, 21 जुलाई दिल्ली उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें विश्व हिंदू परिषद (विहिप) नेता आलोक कुमार के खिलाफ 2019 में एक रैली में कथित रूप से नफरत फैलाने वाला भाषण देने के मामले में प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया गया था।
उच्च न्यायालय ने कहा है कि सांप्रदायिक वैमनस्य का कोई सबूत रिकार्ड में सामने नहीं आया है।
उच्च न्यायालय ने एक मजिस्ट्रेट अदालत का फरवरी, 2020 का आदेश खारिज कर दिया। मजिस्ट्रेट अदालत ने आदेश दिया था कि सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर द्वारा सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत कुमार के खिलाफ दर्ज की गयी शिकायत और आवेदन के आधार पर प्राथमिकी दर्ज की जाए।
उच्च न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता के विरूद्ध आपराधिक कार्यवाही का जारी रहना कानूनी प्रक्रिया का दुरूपयोग और इंसाफ का गला घोंटना होगा।
न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने 73 पृष्ठों के अपने फैसले में कहा कि 2019 में यह मामला दो समुदायों के सदस्यों के बीच सौहार्दपूर्ण तरीके से सुलझा लिया गया था और तोड़फोड़ का मामला पहले से दर्ज है एवं आरोपियों पर मुकदमा चल रहा है।
मंदर की शिकायत नौ जुलाई, 2019 की एक घटना के संबंध में है जब यहां हौजकाजी के लालकुंआ में विहिप ने एक जनसभा आयोजित की थी और इस कार्यक्रम में काशी के ‘एक स्वामी’ ने कथित रूप से भड़काऊ भाषण दिया था।
मंदर ने पुलिस में शिकायत दर्ज करायी थी कि अज्ञात स्वामी की टिप्पणी प्रथमदृष्टया दंगे भड़काने, समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने के लिए थी।
बाद में मंदर ने निचली अदालत में अर्जी दाखिल कर स्वामी और कुमार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का अनुरोध किया।
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