देश की खबरें | उत्तराखंड के मंदिरों से संबंधित 2019 का कानून : उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत में अपील
एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, 16 अक्टूबर उत्तराखंड में चार धाम हिमालय धर्मस्थलों सहित अनेक मंदिरों का प्रबंधन राज्य सरकार द्वारा गठित बोर्ड को सौंपने संबंधी 2019 के कानून को वैध करार देने वाले उच्च न्यायालय के फैसले को बृहस्पतिवार को शीर्ष अदालत में चुनौती दी गयी। इस संबंध में न्यायालय में दो याचिकायें दायर की गयी हैं।

ये अपील पीपुल फॉर धर्म एंड इंडिक कलेक्टिव ट्रस्ट ने दायर की हैं। इनमें दावा किया गया है कि उच्च न्यायालय ने उत्तराखंड चार धाम देवस्थानम प्रबंधन कानून, 2019 की वैधता बरकरार रखकर गलत किया है क्योंकि इसके प्रावधान मनमाने हैं और ये राज्य में चार धाम श्राइन के श्रद्धालुओं के मौलिक अधिकारों का हनन करते हैं।

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उत्तराखंड में यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ चार प्रसिद्ध धर्मस्थान हैं।

उच्च न्यायालय ने इस साल 21 जुलाई को अपने फैसले में इस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी थी। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि 2019 का यह कानून हिन्दू मंदिरों का प्रबंधन बोर्ड को सोंपने के लिये विभिन्न राज्यों में बनाये गये तमाम कानूनों की कड़ी का हिस्सा है।

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अधिवक्ता सुविदत्त एम एस के माध्यम से दायर इन अपील में दावा किया गया है कि और मंदिरों को इसमे शामिल करने और बोर्ड की सिफारिश पर उपकर लगाने का अधिकार और बोर्ड के सदस्य के रूप में सदस्यों को नामित करने या नियुक्त करने के अधिकार से नागरिकों द्वारा अपने धार्मिक संस्थाओं को प्रशासनिक संचालन करने के अधिकारों का हनन है।

इस अपील में कहा गया है कि बोर्ड को दिये गये इस तरह के मनमाने अधिकार धार्मिक तीर्थयात्रा के लिये श्रद्धालुओं के अधिकार संरक्षित रखने और उनकी पवित्रता बनाये रखने का उल्लंघन करते हैं।

अपील के अनुसार अगर कानून की मंशा तीर्थ सर्किट को सहजता से पहुंचने योग्य और पर्यटन के अनुरूप बनाना है तो इस तरह के कानून के जरिये पंथनिरपेक्ष राज्य की अनेक संस्थाओं के प्रबंधन की घेराबंदी करना मनमानीपूर्ण है।

अपील में आरोप लगाया गया है कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के अंतर्गत धार्मिक संस्थाओं को नियंत्रित करना शासन के संवैधानिक कौशल से बाहर जाना है और अनुच्छेद 31ए तथा शीर्ष अदालत द्वारा प्रतिपादित नजीर के भी विपरीत है।

इसमें कहा गया है कि प्राचीन काल से ही जारी पारंपरिक और धार्मिक अधिकारों को एक ऐसे कानून से नहीं लिया जा सकता जो प्रबंधकों को अपने हाथ में लेने की सही मंशा या कारणों को नहीं बताता है।

अनूप

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