क्यों अफगानिस्तान में मौसम इतना जानलेवा होता जा रहा है?
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

अफगानिस्तान में एक बार फिर भारी बारिश, बाढ़ और लैंडस्लाइड का जानलेवा मेल तबाही मचा रहा है. आखिर क्यों देश में बरसात जैसे मौसमी चक्र इतने घातक होते जा रहे हैं?चरम मौसमी घटनाओं के लिहाज से यह साल भी अफगानिस्तान पर भारी गुजर रहा है. बीते 10 दिनों में, भारी बरसात और तूफान के कारण आई बाढ़, भूस्खलन और बिजली गिरने की घटनाओं में 77 लोगों की जान गई और 137 लोग घायल हुए. देश के आपदा प्रबंधन विभाग ने यह आंकड़ा दिया है. आने वाले दिनों में और बारिश की आशंका है. लोगों को बाढ़ की आशंका वाले इलाकों और नदी तटों से दूर रहने की सलाह दी गई है.

क्या है 35 सेल्सियस वेट बल्ब टेम्परेचर, जिसमें जान जा सकती है

संपत्ति की भी खासी क्षति हुई है. सैकड़ों की संख्या में मकान क्षतिग्रस्त हुए, 793 घर पूरी तरह तबाह हो गए, 337 किलोमीटर की सड़क नष्ट हो गई. आपदा प्रबंधन विभाग ने नुकसान का जो ब्योरा दिया है उसके मुताबिक कारोबार, खेतिहर जमीन, कुओं और सिंचाई की नहरें भी क्षतिग्रस्त हुई हैं. कुल मिलाकर 5,800 से ज्यादा परिवार प्रभावित हुए हैं.

जलवायु परिवर्तन की वजह से धंस रही धरती, बन रहे हैं विशालकाय सिंकहोल

समाचार एजेंसी एपी ने लोक निर्माण विभाग के प्रवक्ता अशरफ हकशिनास के हवाले से बताया कि राजधानी काबुल को अन्य प्रांतों से जोड़ने वाले कई राजमार्गों को भी नुकसान पहुंचा है. इनमें काबुल-जलालाबाद हाई-वे शामिल है, जो कि राजधानी को पाकिस्तानी सीमा और देश के पूर्वी प्रांतों से जोड़ने वाला मुख्य मार्ग है. बाढ़ के चलते सलांग दर्रा भी बंद हो गया है. हिंदू कुश पर्वत शृंखला का यह दर्रा काबिल को देश के उत्तरी हिस्से से जोड़ता है.

अफगानिस्तान में आपदाएं क्यों ज्यादा नियमित होती जा रही हैं?

पिछले कुछ सालों के दौरान अफगानिस्तान में चरम मौसम का संकट गंभीर होता गया है. सिपरी (स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट) ने अपनी 2023 की फैक्टशीट में देश को जलवायु परिवर्तन के असर के प्रति बहुत संवेदनशील माना है. यहां चरम मौसम की घटनाएं ज्यादा नियमित होती जा रही हैं.

तापमान भी वैश्विक औसत के मुकाबले ज्यादा रफ्तार से बढ़ रहा है. जलवायु के ये कारक जब चार दशक लंबे युद्ध की विरासत, आर्थिक संकट और बदहाल बुनियादी ढांचे के साथ मिलते हैं तो प्राकृतिक आपदाओं का असर कई गुना बढ़ जाता है. ऊपर से, आपदा की स्थिति में आपातकालीन मानवीय सहायता पहुंचाने की व्यवस्था भी जटिल है. ऐसे में, आपदाओं का सामना करने या उनके असर को कम करने के मामले में लोग ज्यादा असुरक्षित और असहाय हो जाते हैं.

सिपरी की रिपोर्ट बताती है कि बदल रहा तापमान, पिघलती बर्फ और बरसात जैसे कारक सूखा और बाढ़ जैसी मौसमी घटनाओं को प्रभावित करते हैं, लेकिन इनका असर एक जैसा नहीं है. देश के अलग-अलग ईकोलॉजिकल हिस्सों में अलग पैटर्न नजर आता है. चाहे धीमी गति से होने वाली मौसमी घटनाएं हों या औचक आईं आपदाएं, अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन इन्हें ना केवल ज्यादा नियमित बनाएगा बल्कि इनकी तीव्रता भी बढ़ाएगा.

इंसान ही नहीं, इकोनॉमी को भी झुलसा रही है तीखी गर्मी

जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा असुरक्षित देशों में है अफगानिस्तान

जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के जिन देशों की हालत सबसे संवेदनशील है, उनमें अफगानिस्तान शीर्ष के देशों में है. जर्मन वॉच के 'क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2021' में जलवायु से सबसे ज्यादा असुरक्षित देशों की सूची में अफगानिस्तान छठे नंबर पर था. तापमान में हो रही बढ़ोतरी को देखें, तो साल 1951 से 2020 के बीच हवा का औसत सालाना तापमान (मीन एनुएल टेम्परेंचर्स) 1.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा है. जबकि इस अवधि में वैश्विक औसत 1.5 डिग्री सेल्सियस था.

मौसम ने प्रभावित की 24 करोड़ बच्चों की पढ़ाई

हालांकि, यह वृद्धि समूचे देश में एकसार नहीं है. ऊंचाई और भूभागीय बनावट के हिसाब से अंतर है. मसलन, हिंदू कुश इलाके में सबसे कम 0.6 डिग्री सेल्सियस का इजाफा हुआ. सबसे अधिक करीब 2.4 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी पूर्वी हिस्सों में दर्ज की गई. साल 2021 में मीन एनुएल टेम्परेचर 14.3 डिग्री मापा गया. साल 1901 के बाद से यह सबसे ज्यादा आंकड़ा था.

सिपरी के मुताबिक, अनुमान है कि 2050 तक तापमान में 1.7–2.3 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हो सकती है. यानी, अफगानिस्तान में तापमान वैश्विक औसत से ज्यादा तेजी से बढ़ने की आशंका है. एक तरफ तापमान बढ़ रहा है, दूसरी तरफ बारिश घट रही है. 1997 के बाद से लगभग हर साल सूखा या सूखे जैसे हालात रहे हैं है. बीता साल, पिछले तीन दशकों में सबसे बदतर सूखा माना गया. उससे पहले 2022 को भी यही कहा गया था.

यूनाइटेड नेशन्स ऑफिस फॉर दी कॉर्डिनेशन ऑफ ह्यूमैनिटेरियन अफेयर्स (ओसीएचए) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कम-से-कम 60 फीसदी आबादी सिंचाई के लिए खेती पर निर्भर है. ऐसे में एक के बाद एक "सबसे सूखे साल" का रिकॉर्ड मानवीय संकट को गाढ़ा करता जा रहा है. ओसीएचए के मुताबिक, जमीन के रेगिस्तानीकरण यानी आमतौर पर सूखे के कारण उपजाऊ जमीन के मरुस्थल बनने की प्रक्रिया ने उत्तरी, पश्चिमी और दक्षिणी हिस्सों में 75 फीसदी से ज्यादा भूमि को चपेट में ले लिया है. मिट्टी की गुणवत्ता और कृषि पैदावार घटती जा रही है. नतीजा, गरीबी और विस्थापन में इजाफा.

अफगानिस्तान का मौसम, यहां की बदलती जलवायु, सूखे की बढ़ती अवधि फिलहाल भले ही बस अफगानिस्तान की समस्या लगे, लेकिन ये पड़ोसी देशों को भी चपेट में ले सकती है. अफगानिस्तान आसपास के इलाके के सबसे बड़े, ताजे पानी के नवीकरणीय स्रोत हिंदू कुश शृंखला के केंद्र में है. जर्मन थिंक टैंक 'हेनरिष बोल श्टिफटुंग' की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया की 276 ट्रांस-बाउंड्री नदियों में से चार नदियों का हिस्सा है. जब नदी का पानी एक से ज्यादा देश साझा करते हैं, तो पानी की उपलब्धता और प्रबंधन काफी संवेदनशील मुद्दा बन जाता है.

जितने तरह का सूखा, उतनी तरह की समस्याएं

मसलन, हेलमंद नदी अफगानिस्तान में जन्म लेकर दक्षिणपश्चिम की ओर बढ़ते हुए ईरान के सिस्तान बेसिन जाती है. हेलमंद नदी के पानी के बंटवारे पर दोनों देशों में पुराना विवाद रहा है. वहीं पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच नौ नदियां बहती हैं, लेकिन पानी के साझा प्रबंधन या बंटवारे के लिए दोनों देशों में कोई आधिकारिक समझौता नहीं है. जैसे-जैसे जलवायु से जुड़ी समस्याएं और प्रचंड होती जाएंगी और मीठे पानी जैसे प्राकृतिक संसाधन सिमटते जाएंगे, उनपर तनाव और संघर्ष बढ़ने की आशंका है.