हंगरी में ओरबान की हार और विपक्ष की जीत काफी नहीं, असल जीत दो-तिहाई बहुमत में
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

हंगरी में 12 अप्रैल को आम चुनाव है. सर्वेक्षण बता रहे हैं कि मौजूदा पीएम ओरबान की हार तय है. विपक्षी नेता पीटर माग्यार को भारी समर्थन है. क्या ये समर्थन जीत में बदलेगा? हर हाल में ये चुनाव ईयू की दशा-दिशा तय करेगा.विक्टर ओरबान 16 साल से प्रधानमंत्री हैं और यूरोपीय संघ (ईयू) के 27 सदस्य देशों में सबसे पुराने सरकार प्रमुख. वे यूरोप के धुर-दक्षिणपंथीनेताओं के 'भीष्म पितामह' हैं और ईयू के नेताओं के लिए नाक के बाल. रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन से परेशान यूरोपीय नेता उन्हें पुतिन का सबसे बड़ा मददगार समझते हैं.

रविवार, 12 अप्रैल को हो रहा चुनाव बहुत से लोगों के लिए अहम है. सबसे पहले तो खुद ओरबान के लिए कि वे सोमवार से देश के प्रधानमंत्री रहेंगे या नहीं. उनके सत्ता में रहने या न रहने का असर पूरे देश पर होगा, जिसे अपने 16 साल के शासन में ओरबान ने अनुदारवादी लोकतंत्र में बदल दिया है और जहां कानून के राज्य की कोई अहमियत नहीं बची है. इसका असर यूरोपीय संघ के साथ उसके रिश्तों पर भी पड़ा है. इसी का एक हिस्सा है यूक्रेन के लिए ईयू के आर्थिक सहयोग में रोड़े अटकाना.

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मजबूत विपक्ष और उसके चुनावी नारे

विक्टर ओरबान के चुनावी प्रचार का मुख्य मुद्दा हंगरी को यूक्रेन युद्ध से बचाना है, तो उन्हें चुनौती दे रहे विपक्षी उम्मीदवार पीटर माग्यार लोगों के लिए सरकारी सुविधाओं, स्कूली शिक्षा और अस्पतालों की दशा को मुद्दा बना रहे हैं. अब तक के रुझानों को देखकर लगता है कि लोगों को ओरबान का यूक्रेन युद्ध का डर उतना डरा नहीं रहा है, जितना वे ओरबान से छुटकारा पाने के लिए बेताब हैं.

माग्यार अपने अभियानों में बहुलवादी लोकतंत्र की वकालत कर रहे हैं और मतदाताओं से दो-तिहाई बहुमत देने की अपील कर रहे हैं, ताकि ओरबान की अधिनायकवादी संरचनाओं को तोड़ा जा सके. जनमत संग्रह संस्था 'मेडियान' माग्यार की तिसा पार्टी को 138 से 142 सीटें दे रहा है. इससे कम सीटें आने पर सरकार बनाने के बावजूद माग्यार बहुत कुछ कर नहीं पाएंगे. ओरबान ने हर कानून को संवैधानिक दर्जा दे रखा है, जिसे बदलने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होगी.

दुनियाभर में अक्सर चुनाव घरेलू मुद्दों पर जीते जाते हैं, विदेशी मामलों के मुद्दों पर नहीं. हंगरी इसका अपवाद नहीं है. फिर पिछले सालों में ओरबान की फिडेस पार्टी ने चुनावी नियमों को इस तरह बदला है कि उसे फायदा पहुंचे. हंगरी की संसद में कुल 199 सीटें हैं, जिनमें से 106 सीटों पर सीधे चुनाव क्षेत्रों में चुनाव होता है.

ये 'सिंगल कैंडिडेट कॉन्स्टिट्यूएंसी' कहलाती हैं, यानी हर निर्वाचन क्षेत्र से एक प्रतिनिधि का चुनाव. इनमें से अधिकांश सीटें देहाती इलाकों में है और यहां फिडेस पार्टी को बढ़त है. माग्यार राजधानी बुडापेस्ट के मेयर हैं, यहां विपक्ष ताकतवर है. हंगरी में इस बार लड़ाई सीधे सीधे शहर और देहात में है.

बहुत सी नजरें टिकी हैं हंगरी के चुनाव पर

चुनाव में विपक्ष जीत भी जाए, तो हंगरी तुरंत लाइन पर नहीं आ जाएगा. वहां बदलाव से यूरोपीय संघ की उम्मीदें लगी हैं, तो यूक्रेन की भी. यूक्रेन, रूस के खिलाफ अपनी लड़ाई में यूरोपीय संघ के समर्थन पर निर्भर है, जो उसे मिल भी रहा है. लेकिन जब एकमत फैसले की बात आती है, तो हंगरी हमेशा उसके विरोध में होता है.

ताजा मामला है यूक्रेन को अगले साल तक 90 अरब यूरो कर्ज देने का. भारी दबाव में ओरबान सहमत तो हो गए थे, इस शर्त पर कि कर्ज की जिम्मेदारी हंगरी नहीं लेगा. लेकिन अब वह इस मदद के ट्रांसफर में बाधा डाल रहे हैं और यूक्रेन से पाइप लाइन के जरिए रूसी तेल आने देने को कह रहे हैं.

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दूसरा मामला यूरोपीय संघ के फंड से हंगरी को 19 अरब यूरो की मदद का है, जिसे ईयू में ओरबान सरकार द्वारा कानूनी राज्य के सिद्धांत को तोड़े जाने के कारण रोक रखा है. यूरोपीय संघ इस मदद को नकारने को हंगरी की मुश्किलों की वजह बताता है, तो ओरबान यूरोपीय संघ के नेताओं को युद्ध समर्थक बताते हैं. अब ब्रसेल्स और कीव दोनों की उम्मीदें पीटर माग्यार की संभावित जीत पर टिकी हैं. वह जीतें, तो हालात बदलें.

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लेकिन हालात बदलने के आसार इतने आसान नहीं. ओरबान पिछले चुनावों में भी निश्चित हार को जीत में बदल चुके हैं और इस बार भी वही हो सकता है. उनके समर्थकों में इस बार पुतिन के अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप भी है. इसी हफ्ते उन्होंने ओरबान के चुनाव प्रचार में मदद के लिए उपराष्ट्रपति जेडी वैंस को बुडापेस्ट भेजा. ओरबान को समर्थन देने वालों में फ्रांस और जर्मनी की धुर-दक्षिणपंथी पार्टियां भी हैं. अगर माग्यार जीत जाते हैं, तो उम्मीदें कायम रहेंगी.

नरमी दिखा सकता है यूरोपीय संघ

चुनावी वादों को पूरा करने के लिए पीटर माग्यार की तिसा पार्टी को आर्थिक मदद की जरूरत होगी. विपक्ष की जीत की हालत में यूरोपीय संघ नर्मी दिखा सकता है. लेकिन यूरोपीय संघ के पुनर्निर्माण फंड से 19 अरब की आर्थिक मदद के लिए हंगरी को अगस्त तक 27 शर्तें पूरी करनी होगी, जिनमें न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी शामिल है. विपक्ष ये बदलाव अगस्त तक ला पाएगा इसमें संदेह है.

हालांकि, यूरोपीय संघ इसमें रियायतें दे सकता है. ऐसा पहले भी हो चुका है. यूरोपीय संघ ने मुश्किल संबंधों वाली सरकार बदलने के बाद रियायतें दी हैं. पोलैंड में भी धुर-दक्षिणपंथी सरकार के साथ यूरोपीय संघ के रिश्ते बहुत खराब थे. उसने भी न्यायपालिका की स्वतंत्रता खत्म कर दी थी और बदलाव के लिए ईयू का दवाब था. सरकार बदलने के बाद न्यायिक सुधारों की घोषणा भर काफी थी, जब ईयू ने सहायता राशि पर लगी रोक को हटा लिया था.