संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य बनना चाहता है जर्मनी
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

आज जब दुनिया के कई स्थापित नियम और व्यवस्था खतरे में हैं, तो जर्मनी संयुक्त राष्ट्र की सबसे ऊंची मेज, यानी सुरक्षा परिषद में जगह पाने की पूरी कोशिश कर रहा है.गाड़ियों का काफिला न्यू यॉर्क के भारी ट्रैफिक को चीरता हुआ आगे बढ़ रहा है. सायरन की आवाजें गूंज रही हैं, हॉर्न बज रहे हैं और न्यू यॉर्क के लोग चिड़चिड़ा रहे हैं. 28 अप्रैल को जर्मनी के विदेश मंत्री योहान वाडेफुल जब संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय पहुंचे, तो उनके पास बस कुछ ही मिनट बचे होते हैं.

वाडेफुल अब 80 साल पुरानी इस संस्था के सबसे शक्तिशाली हिस्से, यानी सुरक्षा परिषद के बीचों-बीच खड़े हैं. उनका तीन मिनट का भाषण समुद्री सुरक्षा, ईरान में युद्ध के विनाशकारी प्रभावों और विशेष रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने पर केंद्रित है.

भाषण देने के बाद, वाडेफुल सुरक्षा परिषद में घोड़े के नाल के आकार जैसी उस मशहूर मेज पर बैठने ही वाले थे. लेकिन तभी किसी ने उन्हें टोकते हुए बगल की कतारों में बैठने के लिए कहा. वजह साफ थी, जर्मनी सुरक्षा परिषद का सदस्य नहीं है, कम से कम फिलहाल तो नहीं.

संयुक्त राष्ट्र में जर्मनी का क्या संदेश लेकर गए वाडेफुल

विदेश मंत्री वाडेफुल का मुख्य लक्ष्य साल 2027 से 2028 के कार्यकाल के लिए सुरक्षा परिषद में जर्मनी की अस्थायी सदस्यता हासिल करना है. बहुत पहले जर्मनी (पूर्व पश्चिमी जर्मनी) अब तक छह बार सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य रह चुका है, और पूर्वी जर्मनी एक बार. वहीं, अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन इसके स्थायी सदस्य हैं. इन सभी के पास वीटो पावर है.

अमेरिका पीछे, चीन आगे? कैसे बदल रही है वैश्विक व्यवस्था

डीडब्ल्यू के साथ एक खास इंटरव्यू में, वाडेफुल ने संभावना जताई कि जर्मनी एक बार फिर से सुरक्षा परिषद का सदस्य बन सकता है. उन्होंने कहा, "मैं कहूंगा कि संभावनाएं अच्छी हैं, लेकिन यह एक मुकाबला है और यह लोकतंत्र है. इसलिए, हम जीत सकते हैं और हार भी सकते हैं. दोनों तरह की संभावनाएं हैं. हमारे तर्क मजबूत हैं. हम दुनिया से जुड़े हुए हैं. हम यूएन सिस्टम में सक्रिय रूप से शामिल हैं.”

कैसी है सुरक्षा परिषद में अस्थायी सीटें जीतने की प्रक्रिया

सुरक्षा परिषद की 10 अस्थायी सीटों में से पांच सीटों के लिए 3 जून को चुनाव होंगे. जर्मनी को इनमें से एक सीट जीतने के लिए इस गुप्त मतदान में 193 सदस्य देशों के वोटों में से दो-तिहाई वोटों की जरूरत होगी.

इस चुनाव के लिए प्रचार कभी भी सीधा-सादा काम नहीं होता. इसमें इतने सारे समीकरण, गठबंधन और मांगें होती हैं कि यह काम बेहद मुश्किल हो जाता है. इस बार तो यह और भी पेचीदा है, क्योंकि जर्मनी ने अपनी उम्मीदवारी का एलान काफी देर से किया है. संयुक्त राष्ट्र के पांच क्षेत्रीय समूहों में से एक, ‘पश्चिमी यूरोपीय देशों और अन्य के समूह', पहले ही ऑस्ट्रिया और पुर्तगाल के नामों पर सहमति बना चुका था. इसलिए, अब जर्मनी को कहीं और से समर्थन जुटाना होगा.

क्या जर्मनी को समर्थन मिल रहा है?

वाडेफुल अपनी उम्मीदों के लिए अफ्रीकी देशों पर भरोसा करते दिख रहे हैं, जो 54 देशों के साथ संयुक्त राष्ट्र का सबसे बड़ा वोटिंग ब्लॉक है. अपनी 29 घंटे की न्यूयॉर्क यात्रा के दौरान उन्होंने कई द्विपक्षीय बैठकें तय की थीं, लेकिन सुरक्षा परिषद की दावेदारी के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण मुलाकातों में से एक ‘अफ्रीकी संघ के प्रतिनिधियों के साथ उनकी बैठक' है.

यहां वाडेफुल ने विकास कार्यों के क्षेत्र में जर्मनी द्वारा किए जाने वाले खर्च के बारे में बात की. हालांकि, उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि सिर्फ पैसा या दान ही जर्मनी को सुरक्षा परिषद की सीट का हकदार नहीं बनाते.

उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "मैं कहूंगा कि इसका मूल मंत्र यह है कि ऐसे देश को चुनें जिसके पास अनुभव हो. साथ ही, जो दूसरे देशों और महाद्वीपों को बेहतर ढंग से समझने में गहरी दिलचस्पी रखता हो.”

एक और बात जो जून में होने वाले मतदान के दौरान मददगार साबित हो सकती है, वह है सुरक्षा परिषद में दो स्थायी सीटें पाने की अफ्रीकी संघ की मांग को जर्मनी का समर्थन. यह कदम संयुक्त राष्ट्र में होने वाले बड़े सुधारों का हिस्सा हो भी सकता है और नहीं भी.

संयुक्त राष्ट्र अब भी कितना प्रासंगिक है?

एक सवाल का जवाब मिलना अभी बाकी है. आज के दौर में जब जंगल का कानून जीतता दिख रहा है, यानी अंतरराष्ट्रीय नियमों के बजाय ताकत का बोलबाला बढ़ रहा है, तो क्या कूटनीति के इन प्रयासों का कोई फायदा है?

वाडेफुल कहते हैं, "बेशक, हम दबाव में हैं. संयुक्त राष्ट्र की पूरी व्यवस्था तनाव से गुजर रही है, लेकिन मुझे लगता है कि इस दुनिया के लिए कूटनीति अभी भी बहुत जरूरी है, ताकि जंगल के कानून को इस रेस में जीतने से रोका जा सके.

यूक्रेन से लेकर सूडान और मध्य पूर्व तक, आज कई युद्ध छिड़े हुए हैं. ऐसे में संयुक्त राष्ट्र में मौजूद बहुत से लोग यह उम्मीद कर रहे हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद नियमों के आधार पर बनी वह व्यवस्था, जिसका प्रतीक संयुक्त राष्ट्र खुद है, फिर से अपनी ताकत हासिल कर ले और सचमुच फिर से पटरी पर लौट आए.

यह साफ है कि जर्मनी खुद को इस वैश्विक व्यवस्था के रक्षक के तौर पर स्थापित कर रहा है. जर्मनी चुपचाप इस संभावित वापसी का नेतृत्व करने वालों में से एक बनने की कोशिश कर रहा है. उसकी मंशा बिल्कुल स्पष्ट है: सुरक्षा परिषद की मेज पर अपनी जगह पक्की करना और दुनिया को फिर से नियमों के रास्ते पर लाना.