ग्वाटेमाला से पनामा तक: अमेरिका ने कब-कब किया लैटिन अमेरिका में हस्तक्षेप
वेनेजुएला पर अमेरिकी हमला, लैटिन अमेरिका में अमेरिका के सैन्य और राजनीतिक दखल के पुराने इतिहास का एक हिस्सा है.
वेनेजुएला पर अमेरिकी हमला, लैटिन अमेरिका में अमेरिका के सैन्य और राजनीतिक दखल के पुराने इतिहास का एक हिस्सा है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका ने इस तरह की कई कार्रवाइयों को अंजाम दिया है.3 जनवरी 2026 की सुबह, अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को हिरासत में ले लिया. दोनों को अमेरिका ले जाया गया है, जहां सत्ता से हटाए गए मादुरो पर अब नशीले पदार्थों की तस्करी और आतंकवाद (नार्को आतंकवाद) के आरोप लगाए गए हैं.
अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अवैध माना जाने वाला यह अमेरिकी सैन्य अभियान, लैटिन अमेरिका में अमेरिकी हस्तक्षेप के लंबे इतिहास की एक ताजा कड़ी है. वाशिंगटन अक्सर क्षेत्रीय सुरक्षा का हवाला देकर अपनी इन कार्रवाइयों को जायज ठहराता आया है.
इनमें से कई हस्तक्षेपों की जड़ें ‘मोनरो सिद्धांत' में देखी जा सकती हैं. यह विदेश नीति का एक ऐसा सिद्धांत है, जो 19वीं सदी में शुरू होने के बावजूद पिछले 200 वर्षों से अमेरिकी विदेश नीति को लगातार प्रभावित कर रहा है.
मोनरो सिद्धांत क्या है?
मोनरो सिद्धांत का इतिहास 1823 से शुरू होता है. उस समय तत्कालीन राष्ट्रपति जेम्स मोनरो ने यूरोपीय शक्तियों को पश्चिमी गोलार्ध के मामलों में दखलंदाजी न करने की चेतावनी दी थी.
1904 में राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट ने इस सिद्धांत को आगे बढ़ाया, जिसे ‘रूजवेल्ट कोरोलरी' के नाम से जाना जाता है. रूजवेल्ट ने तर्क दिया कि अमेरिका को लैटिन अमेरिकी देशों में हस्तक्षेप करने का अधिकार है, ताकि वहां होने वाली ‘पुरानी गड़बड़ियों' और अस्थिरता को रोका जा सके.
ट्रंप प्रशासन का इशारा, और भी देश आ सकते हैं निशाने पर?
2025 में प्रकाशित अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में कहा गया है: "वर्षों की अनदेखी के बाद, संयुक्त राज्य अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी वर्चस्व को बहाल करने और अपनी मातृभूमि तथा पूरे क्षेत्र के प्रमुख भौगोलिक क्षेत्रों तक अपनी पहुंच की रक्षा करने के लिए मोनरो सिद्धांत को फिर से लागू और प्रभावी करेगा.”
मादुरो को अमेरिकी सेना द्वारा पकड़े जाने के कुछ ही समय बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने भी इस सिद्धांत का उल्लेख किया. उन्होंने कहा, "मोनरो सिद्धांत एक बड़ी बात है, लेकिन हम इससे बहुत आगे निकल चुके हैं, वास्तव में बहुत आगे. अब लोग इसे ‘डॉनरो' सिद्धांत कहते हैं.”
दूसरे विश्व युद्ध के बाद से लैटिन अमेरिका में अमेरिकी दखल के पांच मामलों की जानकारी यहां दी गई है.
1954 ग्वाटेमाला: सीआईए के समर्थन से हुआ तख्तापलट
लैटिन अमेरिका में शीत युद्ध के दौरान हुए शुरुआती हस्तक्षेपों में से एक ग्वाटेमाला में किया गया था. यहां अमेरिका ने लोकतांत्रिक रूप से चुने गए राष्ट्रपति जैकोबो अर्बेंज का तख्तापलट करने में मदद की. अर्बेंज ने भूमि सुधार कानून लागू किए थे, जिसके तहत निजी संपत्ति का राष्ट्रीयकरण किया जाना था. इससे अमेरिका की ‘यूनाइटेड फ्रूट कंपनी' (जिसे अब चिक्विटा ब्रांड्स इंटरनेशनल के नाम से जाना जाता है) को भी अपनी जमीन छिनने का डर सताने लगा था.
तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहावर की सरकार अर्बेंज की सरकार को एक कम्युनिस्ट खतरे के रूप में देखती थी. उस समय के अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन फोस्टर डलेस ने अर्बेंज पर ‘कम्युनिस्ट-टाइप का आतंक राज' कायम करने का आरोप लगाया था.
सीआईए के एजेंटों ने ग्वाटेमाला के बागियों की एक सेना का समर्थन किया और कार्लोस कैस्टिलो अर्मास को राष्ट्रपति बनाया. अर्मास ने तुरंत भूमि सुधार कानूनों को वापस ले लिया.
1961 क्यूबा: बे ऑफ पिग्स हमला
1959 में फिदेल कास्त्रो की कम्युनिस्ट क्रांति के बाद अमेरिका, क्यूबा और सोवियत संघ के रिश्तों को लेकर ज्यादा चिंतित हो गया. राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइजनहावर ने क्यूबा के नेता को हटाने की एक योजना बनाई, जिसे 1961 में राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी ने अंजाम दिया.
सीआईए से प्रशिक्षित 1,400 क्यूबाई बागी लोग हवाना से 200 किलोमीटर दूर ‘बे ऑफ पिग्स' के तट पर उतरे. उन्हें लगा था कि वहां पहुंचते ही क्रांति शुरू हो जाएगी और वे कास्त्रो की सरकार को गिरा देंगे, लेकिन उनकी योजना धरी की धरी रह गई. कास्त्रो ने तट पर 20,000 सैनिक भेज दिए और अंत में इन बागियों को घुटने टेकने पड़े.
यह नाकामी अमेरिका के लिए एक बड़ी शर्मिंदगी साबित हुई, जिससे इस क्षेत्र में शीत युद्ध का तनाव और बढ़ गया.
1973 चिली: गुप्त ऑपरेशन और एक मिलिट्री तख्तापलट
चिली ऐसा पहला लैटिन अमेरिकी देश था जो शीत युद्ध के दौरान अमेरिकी प्रभुत्व से बाहर आया. चिली की जनता ने 1970 में सल्वाडोर अलेंदे को चुना और देश समाजवादी व्यवस्था की ओर बढ़ा.
अमेरिका इस बात से परेशान था कि क्यूबा की तरह कहीं चिली में भी कम्युनिस्टों का दबदबा न हो जाए. इसीलिए, वह राष्ट्रपति साल्वाडोर अलेंदे की सरकार को शुरू से ही पसंद नहीं करता था. जब अलेंदे ने बड़ी कंपनियों को सरकारी नियंत्रण में लेना शुरू किया और सोवियत संघ से दोस्ती बढ़ाई, तो अमेरिका ने इसे अपने लिए एक खतरे के तौर पर देखा.
हालांकि, अमेरिका ने सीधे तौर पर तख्तापलट नहीं किया, लेकिन वाशिंगटन ने राजनयिक दबाव, आर्थिक प्रतिबंधों, विपक्षी समूहों को फंडिंग और अलेंदे विरोधी प्रोपेगेंडा के जरिए चिली को अस्थिर करने की कोशिश की.
सितंबर 1973 में, ऑगस्टो पिनोशे के नेतृत्व में चिली की सेना ने अलेंदे की सरकार को गिरा दिया. तख्तापलट के दौरान अलेंदे की मौत के बाद पिनोशे ने सत्ता संभाल ली.
यह दक्षिणपंथी तानाशाह 17 सालों तक चिली पर राज करता रहा, जिससे चिली में 46 साल के लोकतांत्रिक शासन का अंत हो गया. उसके शासन में बड़े पैमाने पर लोगों के गायब होने और टॉर्चर की घटनाएं हुईं.
1983 ग्रानादा: ऑपरेशन अर्जेंट फ्यूरी
ग्रानादा में जब आंतरिक तख्तापलट हुआ और प्रधानमंत्री मौरिस बिशप की हत्या कर दी गई, तो राष्ट्रपति रॉनल्ड रीगन ने तुरंत हमला करने और सेना भेजने का फैसला किया. अमेरिका ने तर्क दिया कि यह कदम वहां रह रहे अमेरिकी नागरिकों को बचाने और पूरे इलाके में शांति बनाए रखने के लिए जरूरी था.
इस हमले को ‘ऑपरेशन अर्जेंट फ्यूरी' नाम दिया गया. अमेरिका ने यह कदम तब उठाया, जब उसे लगा कि ग्रानादा की सोवियत संघ और क्यूबा से बढ़ती नजदीकी उसके लिए खतरा बन सकती है.
भारत और लैटिन अमेरिका के करीब आने के क्या हैं मायने
इस हमले की संयुक्त राष्ट्र महासभा ने कड़ी आलोचना की और लिखा कि यह दखल "अंतरराष्ट्रीय कानून और उस देश की आजादी, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का खुला उल्लंघन था.”
1989 पनामा: ऑपरेशन जस्ट कॉज
दिसंबर 1989 में, राष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश ने ऑपरेशन जस्ट कॉज के तहत पनामा पर बड़े पैमाने पर हमला किया था. उन्होंने जनरल मैनुअल नोरिएगा को सत्ता से हटाने के लिए लगभग 24,000 सैनिक भेजे थे.
नोरिएगा किसी समय अमेरिका के सहयोगी थे, लेकिन ड्रग-ट्रैफिकिंग, रैकेटियरिंग और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे आरोपों में उन पर अमेरिका में मुकदमा चलाया गया और जेल में डाल दिया गया.
हमले के बाद, अमेरिका ने गिलेर्मो एंडारा को राष्ट्रपति के पद पर बैठाया. शीत युद्ध के दौरान हुए पिछले हस्तक्षेपों के विपरीत, पनामा पर हमला किसी कम्युनिस्ट नेता के खिलाफ नहीं था, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के खिलाफ था जो कभी अमेरिका का सहयोगी और मुखबिर रह चुका था.
(The above story first appeared on LatestLY on Jan 09, 2026 07:50 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

