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जर्मनी में चर्च की खाली इमारतों को मिल रहा है नया जीवन

जर्मनी में ईसाई अनुयायियों की संख्या लगातार घट रही है.

जर्मनी में चर्च की खाली इमारतों को मिल रहा है नया जीवन
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

जर्मनी में ईसाई अनुयायियों की संख्या लगातार घट रही है. चर्च खाली हो रहे हैं, घंटियों की गूंज थम रही है. सवाल यह है कि इन उपासना स्थलों का आगे क्या होगा?अपने आखिरी दिन पर सेंट आना चर्च लगभग फिर से भर गया है. एक गायक मंडली गा रही है और छोटा सा ऑर्गन उनका साथ दे रहा है. जर्मनी-नीदरलैंड्स सीमा के पास बाड बेंटहाइम के गिल्डेहाउस जिले में स्थित इस छोटे कैथोलिक चर्च में होने वाली यह आखिरी सामूहिक प्रार्थना है. भविष्य में यह इमारत अब उपासना स्थल नहीं रहेगी.

सर्विस खत्म होते होते इस चर्च का अंत होने भी भावनात्मक सच्चाई भी बेहद वास्तविक हो जाता है. श्रद्धालु वेदी को खोलते हैं और उसमें से अवशेष निकालते हैं. ये किसी संत के अवशेष होते हैं जो या तो उनकी हड्डियों के टुकड़े होत हैं या उनके कपड़े के हिस्से. किसी भी कोन्सिक्रेटेड कैथोलिक चर्च की वेदी में इन्हें शामिल किया जाता है. जाहिर है कि चर्चों को बंद करना बेहद भावुक कर देने वाला पल होता है. कैथोलिक पादरी हुबेर्टुस गोल्डबेक आंख के कोने से आंसू पोंछते हुए डीडब्ल्यू से कहते हैं कि उनका छोटा सा समुदाय जिस दौर से गुजर रहा है, वैसी स्थिति जर्मनी भर के कई आस्थावान ईसाइयों की भी है.

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जब चर्चों की संख्या घटती है. तो इमारतों को भी छोड़ना पड़ता है. जर्मनी में चर्च के सदस्यों की संख्या तेजी से गिर रही है. केवल 2024 में ही दो बड़े चर्चों ने 10 लाख से अधिक ईसाइयों को खो दिया. ये संख्या ऐसे लोगों की है जिन्होंने या तो खुद चर्च छोड़ दिया या उनकी मृत्यु हो गई. फिलहाल जर्मनी की 45 प्रतिशत से अधिक आबादी अभी भी या तो जर्मनी के प्रोटेस्टेंट चर्च या कैथोलिक चर्च से जुड़ी है. तीस साल पहले यह आंकड़ा लगभग 69 प्रतिशत था. यही वजह है कि अब कई चर्चों को डीकोन्सेक्रेट या डीसेक्रलाइज किया जा रहा है.

2000 के बाद से सैकड़ों कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट चर्चों को बंद किया जा चुका है. डीडब्ल्यू की पूछताछ के जवाब में जर्मन बिशप्स कॉन्फ्रेंस ने बताया कि 2000 से 2024 के बीच 611 कैथोलिक चर्च बंद और डीकमिशन किए गए. प्रोटेस्टेंट चर्च का अनुमान है कि इसी अवधि में लगभग 300 से 350 चर्च स्थायी रूप से बंद हुए. हालांकि अधिक सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं.

बिकने वाली चर्च की इमारतों का क्या होता है

इन पूर्व उपासना स्थलों का आगे क्या होता है. बर्लिन जैसे कुछ शहरों में बढ़ते ऑर्थोडॉक्स ईसाई समुदायों ने चर्च इमारतों को अपने कब्जे में लिया है. लेकिन यह अपवाद है. आम तौर पर इन्हें बेच दिया जाता है.

अकेले बर्लिन में ही इस समय कई बड़े चर्च भवन बिक्री के लिए उपलब्ध हैं. और चर्चों को गिरा दिया जाना भी असामान्य नहीं है. कुछ इमारतों को नए उपयोग में लाया गया है. कोलोन और आखेन के बीच स्थित शहर यूलिष में स्थित पूर्व कैथोलिक सेंट रोखुस चर्च में अब साइकिलें बेची जाती हैं. कारोबारी थोमास ओएलर्स इसे खरीदने के बाद अपनी दुकान 'टॉम्स बाइक सेंटर' इसी चर्च में ले आए.

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ओएलर्स डीडब्ल्यू को बताते हैं कि पैरिश ने उनसे संपर्क किया और पूछा कि क्या वह चर्च में अपना व्यवसाय चला सकते हैं. यही वह चर्च है जहां उनका बपतिस्मा हुआ था. उन्होंने पहली बार कम्यूनियन लिया था और वे अक्सर प्रार्थना सभाओं में आते थे. बाहर से चर्च में ज्यादा बदलाव नहीं दिखता लेकिन अंदर की तस्वीर बदल चुकी है.

मुंस्टर के उत्तर में स्थित वेट्रिंगन शहर में एक एबे को सॉकर चर्च में बदल दिया गया है. जहां फुटबॉल खेला जाता है. क्लेवे नाम की जगह पर पूर्व प्रोटेस्टेंट चर्च को बॉक्सिंग एरीना में बदल दिया गया है. कुछ पूर्व चर्चों में अब पब, लाइब्रेरी और बुक स्टोर भी चल रहे हैं. कहीं-कहीं पूरे के पूरे मठ को होटल परिसर में भी बदला गया है. डुसेलडॉर्फ में एक होटल ने वहां पहले चलने वाले ननों के कॉन्वेंट की याद में होटल का नाम भी 'मुटरहाउस' बनाए रखा है.

आवास की कमी के दौर में कई जगहों पर आर्किटेक्ट चर्च भवनों को आवासीय इमारतों में बदल रहे हैं. उदाहरण के तौर पर बर्लिन, रॉस्टॉक, ट्रियर, कोलोन और वुपरटाल जैसे शहरों में ऐसी मिसालें हैं. इस ट्रेंड की शुरुआत करने वाले कुछ सबसे बड़े परिसरों में शामिल है एसेन शहर का लुकास-के-हाउस. 1961 में बना प्रोटेस्टेंट सेंट लूक चर्च 2008 में डीकोन्सेक्रेट किया गया और 2012 से 2013 के बीच इसे अपार्टमेंट बिल्डिंग में बदल दिया गया. इसमें रहने वाली आलेक्जांड्रा श्रोएडर कहती हैं कि कभी सोचा था कि ऐसी जगह पर रहने को मिलेगा. लेकिन उन्होंने इसे चुना क्योंकि उनके परिवार के लिए अपार्टमेंट में कई बेडरूम थे और पास में अच्छे स्कूल भी थे.

एक मंजिल नीचे फिजियोथेरेपी की प्रैक्टिस चलती है. उसकी प्रमुख जेसिका गुंथर बताती हैं कि नए परिसर की तलाश के दौरान संयोग से उन्हें यह ये कनवर्टेड चर्च मिला. उनका मानना है कि इस पूरी इमारत में एक अच्छी सी शांत भावना महसूस होती है, जिसे वो अपने काम के लिए उपयुक्त मानती हैं. वह जानती हैं कि उनकी प्रैक्टिस के भीतर की सीढ़ियां कभी चर्च की वेदी तक जाती थीं. लेकिन वह इसकी अहमियत को बढ़ा चढ़ाकर नहीं देखतीं. हालांकि उनके एक मरीज इसे सकारात्मक रूप में देखते हैं. जरूरतमंद लोगों की मदद करना आस्था की अभिव्यक्ति है. स्टेफान हेबेनस्ट्राइट डीडब्ल्यू से कहते हैं, "भले ही इमारतें अब चर्च न रही हों. उन्हें डे केयर सेंटर या फिजियोथेरेपी प्रैक्टिस के रूप में इस्तेमाल करना बहुत व्यावहारिक है." खुद भी दिल के दौरे झेल चुके आस्थावान ईसाई हेबेनस्ट्राइट यह बात बहुत सोच समझकर कहते हैं.

अब नहीं आती घंटियों की आवाज

चर्च को ऐसे बदले जाने और अलग तरह के इस्तेमाल को लेकर आलोचना सुननी हो, तो सेंट लूक चर्च के आसपास की उन गलियों में रहने वाले लोगों से बात करिए जो दशकों से वहां रह रहे हैं. किसी को घंटियों की आवाज की कमी खलती है. तो कोई इस बात का अफसोस जताता है कि चर्च टॉवर की घड़ियां हमेशा के लिए बंद हो गई हैं. दोनों प्रमुख चर्चों के पास चर्चों के नए उपयोग को लेकर आधिकारिक आयोग और दस्तावेज मौजूद हैं. शोधकर्ता भी इस सवाल पर काम कर रहे हैं. फिर भी अक्सर किसी इलाके का स्थानीय संदर्भ इसमें निर्णायक होता है.

जर्मनी के प्रोटेस्टेंट चर्च के सांस्कृतिक कार्यालय से जुड़े कला इतिहासकार क्लाउस-मार्टिन ब्रेसगोट और वास्तुकला के छात्रों के एक समूह ने बर्लिन के एक बड़े चर्च के उदाहरण से यह स्टडी किया कि पूर्व चर्च परिसर किसी मोहल्ले और आवासीय क्षेत्र के लिए कितने अहम हो सकते हैं. प्रोटेस्टेंट चर्च को अब वेडिंग इलाके में स्थित विशाल सेंट स्टीफन चर्च की जरूरत नहीं है. 1902 से 1904 के बीच बनी यह इमारत शुरू से ही बहुत बड़ी थी. लेकिन उस दौर में लोग बड़े निर्माण पसंद करते थे. आज यह चर्च बंद है और इतनी मरम्मत की जरूरत में है कि हार्ड हैट पहनकर भी अंदर जाने की अनुमति नहीं है.

ब्रेसगोट और छात्रों ने सबसे पहले इमारत की जांच नहीं की, बल्कि आसपास के लोगों से बात की. इस इलाके की पहचान सामाजिक समस्याओं वाले क्षेत्र के रूप में है. एक बात साफ है. यहां सार्वजनिक स्थानों की कमी है. जहां लोग इकट्ठा हो सकें, खेल खेल सकें या सांस्कृतिक और सामुदायिक गतिविधियों में हिस्सा ले सकें. समय हमेशा बदलता है और कभी कभी चर्चों को ज्यादा अहम माना जाता है. तो कभी कम. ब्रेसगोट डीडब्ल्यू से कहते हैं, "हम जानते हैं कि नेपोलियन युद्धों के दौरान चर्च दशकों तक घोड़ों के अस्तबल के रूप में इस्तेमाल हुए. लेकिन वे फिर भी खड़े रहे. उनके लिए सेंट स्टीफन चर्च इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि जो चर्च शुरू से ही बहुत बड़ा था. वह आज भी समाज की सेवा कर सकता है."

(The above story first appeared on LatestLY on Dec 31, 2025 01:20 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).