ईयू-मर्कोसुर डील पर सहमति, फ्रांस समेत यूरोपीय किसान नाराज
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

दक्षिण अमेरिकी देशों के समूह 'मर्कोसुर' और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौते पर सहमति बन गई है. हालांकि, फ्रांस और पोलैंड समेत यूरोप भर के किसान इस समझौते के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं.यूरोपीय संघ ने दक्षिण अमेरिकी देशों के समूह मर्कोसुर के साथ करीब 25 साल से अटके बड़े व्यापार समझौते को आखिरकार हरी झंडी दे दी. शुक्रवार को ब्रसेल्स में राजदूतों की बैठक के बाद यूरोपीय संघ के 27 देशों में से ज्यादातर ने इस समझौते का समर्थन किया. मर्कोसुर लैटिन अमेरिकी अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है जिसमें अर्जेंटीना, ब्राजील, पराग्वे और उरुग्वे शामिल हैं. अर्जेंटीना के मुताबिक, इस समझौते पर 17 जनवरी को पराग्वे में दस्तखत किए जाएंगे.

ईयू के कारोबारी समूहों ने इस समझौते की तरफदारी की है. समर्थक इस करार को निर्यात बढ़ाने, यूरोपीय महाद्वीप की सुस्त अर्थव्यवस्था को सहारा देने और वैश्विक अनिश्चितता के दौर में राजनयिक रिश्तों को बढ़ावा देने के नजरिए से अहम मानते हैं. हालांकि यूरोपीय किसानों ने मर्कोसुर समझौते को तगड़ा विरोध किया है. पूरे फ्रांस और ईयू के मुख्यालय ब्रसेल्स में बड़े विरोध प्रदर्शन हुए हैं.

वैश्विक अनिश्चितता के बीच बड़ी सफलता

यूरोपीय आयोग की प्रमुख उर्सुला फॉन डेय लाएन ने कहा कि यह समझौता,"इस बात का सबूत है कि यूरोप अपना रास्ता खुद तय करता है और एक भरोसेमंद साथी के तौर पर खड़ा है." जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स ने कहा कि इस करार ने "हमारी रणनीतिक संप्रभुता और कदम उठाने की क्षमता का एक अहम संकेत" भेजा है. स्पेन ने भी जर्मनी के नजरिए से सहमति जताई है. मर्कोसुर समूह की तरफ से ब्राजील के राष्ट्रपति लुइस इनासियो लूला दा सिल्वा ने इसे "बहुपक्षवाद के लिए एक ऐतिहासिक दिन" बताया.

फ्रांस समेत पांच देश विरोध में

मर्कोसुर समूह से बातचीत करने वाला यूरोपीय आयोग, संघ के सभी सदस्य देशों को एक साथ लाने में कामयाब नहीं हो सका. ईयू की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था फ्रांस में तमाम राजनीतिक खेमे, मर्कोसुर समझौते के खिलाफ हैं. किसानों के साथ राजनेताओं को भी डर है कि इससे देश के प्रभावशाली कृषि क्षेत्र को काफी नुकसान होगा. आयरलैंड, पोलैंड, हंगरी और ऑस्ट्रिया ने भी इस समझौते के खिलाफ वोट दिया है. हालांकि, यह विरोध समझौते को रोकने के लिए काफी नहीं था क्योंकि अब तक विरोध कर रहे इटली ने आखिर में समझौते का समर्थन कर दिया.

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यूरोपीय अर्थव्यवस्था पर असर

ईयू के मुताबिक, इस समझौते से यूरोपीय कंपनियां हर साल चार अरब यूरो का शुल्क बचा पाएंगी. साथ ही लैटिन अमेरिकी देशों को वाहन, मशीनरी, वाइन और शराब निर्यात करने में आसानी होगी. थिंक टैंक 'यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस' से जुड़ीं अगाथ दुमाराए मानती हैं कि यह समझौता ईयू को रेयर अर्थ मैटिरियल के लिए चीन पर अपनी निर्भरता घटाने में भी मदद करेगा. उन्होंने कहा, "ईयू-मर्कोसुर व्यापार समझौते का पूरा होना यूरोप की वैश्विक भू-राजनीतिक और आर्थिक ताकत के लिए बहुत बड़ी खबर है."

किसान नाराज, अब आगे क्या?

फ्रांस समेत इस समझौते के अन्य आलोचकों ने चिंता जताई है कि उनके किसानों को कृषि दिग्गज ब्राजील और उसके पड़ोसियों से आने वाले मांस, चीनी, चावल, शहद और सोयाबीन जैसे सस्ते उत्पादों से नुकसान होगा. हालांकि फ्रांस की कृषि मंत्री एनी जिनेवा ने कहा है कि यह "कहानी का अंत नहीं है", क्योंकि यूरोपीय संसद में इस डील पर अभी भी वोटिंग होनी है. डील की घोषणा होने के बाद कई यूरोपीय देशों में किसानों ने प्रदर्शन किया है. पोलैंड की राजधानी वारसॉ में विरोध मार्च निकाला गया, वहीं फ्रांस और बेल्जियम में सड़कें जाम कर दी गईं. इटली के मिलान में नाराज किसानों ने अपने ट्रैक्टरों से यातायात बाधित किया, और क्षेत्रीय परिषद की इमारत के सामने भूसा बिखेर दिया और दूध जमीन पर बहा दिया.