Sawan 2025: शिव क्यों करते हैं भस्म से श्रृंगार? समझिए इस वैराग्य के पीछे का गहरा दार्शनिक और वैज्ञानिक रहस्य

Shiva Bhasma Shringar: सावन का महीना आते ही चारों ओर "हर हर महादेव" की गूंज सुनाई देने लगती है. यह महीना भगवान शिव की भक्ति के लिए सबसे खास माना जाता है. जब हम भगवान शिव की कल्पना करते हैं, तो मन में एक ऐसी छवि बनती है जो बाकी देवी-देवताओं से बिलकुल अलग है. जटा में गंगा, गले में सर्प, हाथ में त्रिशूल और डमरू, और पूरे शरीर पर भस्म (राख).

कभी आपने सोचा है कि जहां दूसरे देवी-देवता सुंदर वस्त्र और सोने-चांदी के आभूषण पहनते हैं, वहीं महादेव अपने शरीर पर भस्म क्यों लगाते हैं? यह सिर्फ एक श्रृंगार नहीं है, इसके पीछे एक बहुत गहरा दार्शनिक और वैज्ञानिक रहस्य छिपा है. चलिए, इसे आसान शब्दों में समझते हैं.

भस्म श्रृंगार का दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्व

भगवान शिव का भस्म लगाना हमें जीवन के सबसे बड़े सत्य की याद दिलाता है.

1. यही अंतिम सत्य है: सोचिए, इस दुनिया की कोई भी चीज़, चाहे वो कितनी भी सुंदर या कीमती क्यों न हो, जब उसका अंत होता है और वह जलती है, तो क्या बचता है? सिर्फ राख. यानी 'भस्म' ही इस संसार का अंतिम सत्य है. भगवान शिव इस परम सत्य को अपने शरीर पर धारण करते हैं. इसका अर्थ है कि वे जन्म-मृत्यु, सुख-दुख और दुनिया की हर चीज़ से परे हैं. वह आदि और अंत दोनों हैं.

2. वैराग्य का प्रतीक: भस्म वैराग्य का सबसे बड़ा प्रतीक है. वैराग्य का मतलब है किसी भी चीज़ से कोई लगाव या मोह न रखना. शिवजी का भस्म श्रृंगार यह संदेश देता है कि सांसारिक सुख और मोह-माया एक दिन राख हो जाने वाली चीजें हैं. हमें इनके बंधन में नहीं बंधना चाहिए और अपनी आत्मा की शुद्धि पर ध्यान देना चाहिए.

3. प्रेम और कर्तव्य की कहानी: इसके पीछे एक पौराणिक कथा भी है. जब देवी सती ने अपने पिता के यज्ञ में आत्मदाह कर लिया था, तो भगवान शिव उनके जले हुए शरीर को लेकर पूरे ब्रह्मांड में भटकते रहे. उनका क्रोध और दुख शांत ही नहीं हो रहा था. तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के हिस्से कर दिए. कहते हैं कि इसके बाद शिव ने सती के प्रेम और उनकी याद में उनके शरीर की राख को ही अपना श्रृंगार बना लिया. यह दिखाता है कि शिव का वैराग्य भी प्रेम से भरा है.

4. सृष्टि का आधार: शिव संहार के देवता हैं, लेकिन उनका संहार विनाश के लिए नहीं, बल्कि नए निर्माण के लिए होता है. भस्म उस विनाश का प्रतीक है, जिसके बाद ही नई सृष्टि का सृजन होता है. यह राख हमें याद दिलाती है कि हर अंत एक नई शुरुआत है.

इसके पीछे का वैज्ञानिक पहलू

पुराने समय की परंपराओं के पीछे अक्सर कुछ वैज्ञानिक कारण भी छिपे होते थे. शिव के भस्म लेपन के भी कुछ वैज्ञानिक तर्क दिए जाते हैं:

  • शरीर को कीटाणुओं से बचाना: भस्म एक बेहतरीन कीटनाशक की तरह काम करती है. इसे शरीर पर लगाने से त्वचा के रोमछिद्र बंद हो जाते हैं. इससे मच्छर, कीड़े-मकोड़े और हानिकारक बैक्टीरिया से शरीर की रक्षा होती है. शिवजी, जो अक्सर जंगलों और कैलाश की गुफाओं में ध्यान करते हैं, उनके लिए यह एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह है.
  • शरीर का तापमान नियंत्रित रखना: राख शरीर पर एक परत बना देती है जो शरीर की नमी को बाहर निकलने से रोकती है. साथ ही, यह बाहरी वातावरण के अनुसार शरीर को गर्म या ठंडा रखने में मदद करती है. तपस्वियों के लिए, जो हर मौसम में कठोर तपस्या करते हैं, यह बहुत फायदेमंद है.
  • नकारात्मक ऊर्जा से बचाव: माना जाता है कि भस्म में नकारात्मक ऊर्जा को सोखने और उसे दूर रखने की शक्ति होती है. यह शरीर के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बना देती है.

किस तरह की भस्म का होता है इस्तेमाल?

यह जानना भी ज़रूरी है कि शिवजी कोई आम राख का लेप नहीं करते. शास्त्रों के अनुसार, यह 'चिता भस्म' होती है, यानी किसी शव के जलने के बाद बची हुई राख. यह इस बात का प्रतीक है कि शिव मृत्यु के भी स्वामी हैं और संसार के सभी डर और घृणा से ऊपर हैं. उनके लिए कुछ भी अपवित्र नहीं है.

तो अगली बार जब आप सावन में शिवलिंग पर जल चढ़ाएं या शिव की कोई तस्वीर देखें, तो उनके भस्म श्रृंगार को सिर्फ एक सजावट न समझें. यह जीवन, मृत्यु, वैराग्य और प्रेम का एक गहरा दर्शन है, जो हमें सिखाता है कि असली सुंदरता बाहरी चीजों में नहीं, बल्कि संसार के परम सत्य को समझने में है.