चीन के नए कानून को लेकर तिब्बती समुदाय में डर है कि उनकी भाषा, संस्कृति और पहचान को धीरे‑धीरे हाशिये पर धकेला जा रहा है. चीन की ऐसी ही नीतियों का विरोध करने पर डॉ. ज्याल लो को तिब्बत छोड़कर कनाडा में निर्वासित होना पड़ा,हाल ही में चीन की नेशनल पीपुल्स कांग्रेस ने एक नया कानून पारित किया. चीनी सरकार के अनुसार "जातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देने वाले" इस कानून का उद्देश्य देश के 55 अल्पसंख्यक समुदायों के बीच साझी राष्ट्रीय पहचान बनाना है. इसका मुख्य प्रावधान यह है कि शिक्षा के प्री‑किंडरगार्टन स्तर से लेकर हाई स्कूल तक पढ़ाई के 'बुनियादी माध्यम' के रूप में इस्तेमाल किया जाए. यह अब तक के 'द्विभाषी मॉडल' से हटकर पूर्ण एकीकरण की ओर एक बड़ा कदम है.
इसके अलावा अगर सार्वजनिक स्थानों पर अल्पसंख्यक भाषाओं का इस्तेमाल होता है, तो वहां भी मैंडरिन को प्रमुखता देनी होगी. लेकिन तिब्बत जैसे क्षेत्रों में भाषा ही पहचान की बुनियाद है. वहां के कई लोगों को डर है कि यह कानून तिब्बती भाषा, संस्कृति और आत्मविश्वास को और कमजोर कर देगा. ज्याल लो के अनुसार यह केवल नीति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विनाश को कानूनी रूप देना है.
कानून का एक अहम हिस्सा "पुरानी प्रथाओं को बदलने" और अंतरजातीय विवाह (विशेषकर गैर-हन और हन समुदायों के बीच) को बढ़ावा देने पर केंद्रित है. चीन के भीतर और बाहर कोई व्यक्ति या संगठन यदि जातीय एकता को नुकसान पहुंचाने वाला काम करेगा तो उस पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है. चीनी सरकारी मीडिया ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि सरकार पर लगे सांस्कृतिक क्षरण के आरोप भ्रामक हैं और यह कानून कठोर विधायी प्रक्रिया से गुजरा है. चीनी अधिकारियों के अनुसार मैंडरिन को बढ़ावा देना आर्थिक और सामाजिक भागीदारी के लिए जरूरी है.
तिब्बती शिक्षा को बचाने का संघर्ष
तिब्बत में पले‑बढ़े ज्याल लो ने वहां स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय में एमए तक पढ़ाई की और फिर दस साल से अधिक समय तक उसी विश्वविद्यालय में अध्यापन किया. 2000 के दशक में वह चीन के राष्ट्रीय, स्थानीय और स्कूल लेवल पर तीन‑स्तरीय पाठ्यक्रम सुधार की बहस का हिस्सा थे. ज्याल लो डीडब्ल्यू हिन्दी से बातचीत में कहते हैं कि "राष्ट्रीय पाठ्यक्रम पूरी तरह बीजिंग के नियंत्रण में है. तिब्बती भाषा में स्थानिक शिक्षा को शामिल करने का लगभग कोई अधिकार नहीं था.”
उन्होंने तिब्बती, मंगोल और चीनी विद्वानों के साथ मिलकर स्थानीय पाठ्यक्रम की किताबें तैयार कराईं थीं, लेकिन कुछ ही वर्षों में इन्हें सीमित कर दिया गया. स्कूलों ने स्थानीय पाठ्यक्रम पढ़ाना बंद कर दिया. उनके अनुसार यही प्रवृत्ति अब नए कानून के बाद और तेज हो सकती है, क्योंकि इसमें प्री‑स्कूल से ही मैंडरिन को शिक्षा की मुख्य भाषा बनाने की बात कही गई है.
दो बच्चियों की कहानी जिसने सब बदल दिया
ज्याल लो का संघर्ष केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रहा. वे बताते हैं कि 1980 के दशक से चीनी सरकार ने तिब्बती इलाकों में बोर्डिंग स्कूलों का एक बड़ा ढांचा खड़ा किया, जिसके चलते बच्चे सप्ताह के पांच दिन घर वापस नहीं आ पाते थे. 1985 के बाद बच्चों को तिब्बत से निकालकर चीन की प्रांतीय राजधानियों के स्कूलों में भेजा जाने लगा, जहां शिक्षा और संस्कृति लगभग पूरी तरह मैंडरिन पर आधारित थी. 2016 में शुरू हुआ ये मॉडल उन्हें सबसे अधिक चिंतित करता है. बोर्डिंग प्री‑स्कूल में चार से छह साल के बच्चे सप्ताहभर परिवार से दूर रहते हैं, और पूरी शिक्षा मैंडरिन में होती है. 2017 से 2020 के बीच वे पचास से अधिक प्री‑स्कूलों का दौरा कर चुके हैं.
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2016 का एक वाकया बताते हुए वह कहते हैं कि एक शाम उन्हें फोन पर उनके भाई ने कहा, "अरे, घर आ जाओ. बच्चियों में अजीब‑सा बदलाव आया है. तुम शिक्षा के विशेषज्ञ हो, आकर देखो क्या हुआ है.” उनके भाई बता रहे थे कि जब वह स्कूल से अपनी दो पोतियों (उम्र पांच और छह साल) को घर लाए, तो जो देखा उसने उन्हें हिला दिया. बच्चियां घर पहुंचते ही अपना बस्ता जमीन पर फेंक देती थीं. वे परिवार से भावनात्मक तौर पर नहीं जुड़ पा रही थीं. स्कूल शुरू होने के तीन महीने पहले तक वे अच्छी तिब्बती बोलना जानती थी, पर अब बातचीत में शामिल ही नहीं हो पा रही थी.
इस पर ज्याल लो कहते हैं, "ऐसा लग रहा था जैसे वे अपनी पहचान से ही दूरी बना रही हों. यह मेरे लिए सबसे खतरनाक संकेत था.” उनके अनुसार कई तिब्बती परिवार मजबूरन बच्चों को बोर्डिंग स्कूल भेजते हैं, क्योंकि स्कूल न भेजने पर अगले साल एडमिशन रुक सकता है, सरकारी लाभ बंद हो सकते हैं, या कार्रवाई की चेतावनी मिल सकती है. ज्याल लो को बच्चों के माता-पिता कहते थे, "हमारे बच्चे शारीरिक रूप से तो बड़े हो रहे हैं, पर मानसिक रूप से हम उन्हें खो रहे हैं”.
तिब्बतियों की शिक्षा का भविष्य
ज्याल लो मानते हैं कि तिब्बती शिक्षा अब एक ऐसे पड़ाव पर आकर रुकी है जहां समुदाय और सरकार विपरीत दिशाओं में चलते दिखाई दे रहे हैं. एक ओर, परिवार बोर्डिंग स्कूलों के असर को समझकर बच्चों को भाषा, संस्कृति और धार्मिक विरासत से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. दूसरी ओर, चीनी प्रशासन इन प्रयासों से वाकिफ हो कर ऐसी नई नीतियां ला रहा है जो बच्चों को धार्मिक और सांस्कृतिक स्थानों से दूर करती हैं. जैसे नाबालिगों को बौद्ध मठों से हटाने की नीति और हालिया संकेत, जिनमें बच्चों के मठ‑समुदाय में प्रवेश पर रोक लगाई गई है. उनके अनुसार यह स्थिति बच्चों और समुदाय के बीच असंगति पैदा करती है और इसी दबाव ने उन्हें स्वयं निर्वासन में जाने के लिए मजबूर किया. बाहर आने के बाद अब वे तिब्बत में रह रहे लोगों के लिए बेबाकी से आवाज उठाने की जिम्मेदारी महसूस करते हैं.
ज्याल लो बताते हैं, "मेरे भीतर यह एहसास लगातार और मजबूत होता जा रहा है कि अपनी क्षमता के अनुसार जितनी वकालत कर सकता हूं, उतनी करता रहूं. मुझे यह जिम्मेदारी महसूस होती है कि तिब्बत के भीतर रह रहे लोगों की आवाज दुनिया तक पहुंचाऊं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को बताऊं कि तिब्बत में क्या हो रहा है."
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ज्याल लो का मानना है कि चीन का नया कानून लंबे समय में चीन की एकता को ही कमजोर करेगा, क्योंकि इसका पूरा ढांचा बच्चों को उनके सांस्कृतिक मूल, परिवार और समुदाय से अलग करने पर आधारित है. ऐसी स्थिति में तिब्बतियों की नई पीढ़ी से चीनी मुख्यधारा के साथ एकजुटता की उम्मीद संभव नहीं है. उनके अनुसार इस कानून से चीनी सरकार का मानवाधिकार उल्लंघनों का दायरा भी बढ़ेगा, और अंततः तिब्बत, मंगोलिया, हांगकांग और ताइवान जैसे क्षेत्रों की तरह और भी अल्पसंख्यक समुदाय अपने अधिकारों और पहचान की रक्षा के लिए आवाज उठाने लगेंगे. ज्याल लो का सवाल है कि "अगर बच्चे अपनी भाषा और सांस्कृतिक दुनिया से ही दूर हो जाएं, तो आने वाली पीढ़ी अपने समुदाय के साथ एकजुटता कैसे बनाए रखेगी?”
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाराजगी
डीडब्ल्यू हिन्दी ने जर्मनी में स्थित तिब्बत इनिशिएटिव संगठन से भी बात की. संगठन की डायरेक्टर तेनजिन ज्योचबाउजर कहती हैं कि "तिब्बती भाषा का सीमित होना कोई छोटा मुद्दा नहीं है. यह पूरे क्षेत्र में पहचान को बदलने की प्रक्रिया का केंद्रीय हिस्सा बन गया है. धीरे‑धीरे तिब्बती संस्कृति को पिछड़ेपन से जोड़ा जा रहा है, और कई लोगों को लगता है कि तिब्बती होना ही संदिग्ध बना दिया गया है. चीन की नेशनल पीपुल्स कांग्रेस द्वारा पारित नया कानून किसी तरह की प्रगति नहीं है. यह तिब्बती पहचान को व्यवस्थित रूप से मिटाने की प्रक्रिया का एक और कठोर कदम है.”
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने डीडब्ल्यू हिन्दी के बातचीत के लिए संपर्क करने पर उच्चायुक्त फोल्कर टुर्क के एक हालिया ट्वीट की ओर ध्यान दिलाया. इसमें उन्होंने कहा है कि जातीय एकता कानून अल्पसंख्यक भाषा‑शिक्षा को सीमित कर सकता है, धर्म और संस्कृति की स्वतंत्र प्रैक्टिस पर असर डाल सकता है और "एकरूपता थोपने वाली नीतियों” को कानूनी जामा पहना सकता है. उनका कहना है कि इसके प्रावधान अभिव्यक्ति, आस्था और शांतिपूर्ण एकत्रीकरण की स्वतंत्रताओं को भी बहुत ज्यादा सीमित कर सकते हैं. टुर्क ने याद दिलाया कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून किसी भी देश को अपने जातीय, भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यकों की पहचान की रक्षा करने का दायित्व देता है.
चीन में 1 जुलाई से यह कानून लागू होने वाला है. इसके चलते उइगुर, तिब्बती और ताइवानी जैसे अल्पसंख्यक समुदायों में यह बहस और तेज हो गई है कि राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक पहचान के बीच नई पीढ़ी का भविष्य किस दिशा में जाएगा.












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