मुखिया की पुकार, मुझे मेरे वोटरों से बचाओ
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

जर्मनी के एक गांव में मुखिया लोगों से अपील कर रहा है कि प्लीज मुझे वोट मत दो, लेकिन गांव वालों को यह मंजूर नहीं है. असल में मुखिया जी ने तो चुनाव भी नहीं लड़ा, फिर भी आधे लोगों ने उन्हीं के नाम पर वोट डाल दिया.जर्मनी के दक्षिणी प्रांत बवेरिया में पिछले हफ्ते स्थानीय चुनाव हुए. आम तौर पर स्थानीय चुनाव इलाके के बाहर सुर्खियां नहीं बनते, लेकिन लोवर फ्रैंकोनिया का एक गांव मेयर के चुनाव न लड़ने के कारण चर्चा में है. लोवर फ्रैंकोनिया का गांव मिटेलसिन एक जाना माना गांव है. उसने जर्मनी के क्रिसमस ट्री गांव का खिताब ले रखा है. क्रिसमस के दौरान यहां गली चौराहों, दफ्तरों और घरों में सजावट के लिए क्रिसमस ट्री लगाए जाते हैं और इसके बड़े पैमाने पर पैदावार के कारण मिटेलसिन विख्यात है.

फ्रैंकफर्ट से करीब डेढ़ घंटे की दूरी पर बसा मिटेलसिन सिन नदी पर स्थित है और इसका अर्थ है मध्य सिन. 70 किलोमीटर लंबी सिन नदी के नाम की भी बड़ी कहानी है. बहुत समय तक ये माना जाता रहा कि ये नाम सिन सबसे पहले रजिस्टर्ड सिना नाम से आया है. सिना की उत्पत्ति प्राचीन भारतीय शब्द सिंधु से हुई, जिसका अर्थ नदी होता है. जर्मन और हिंदी दोनों ही इंडो जर्मन भाषा समुदाय का हिस्सा हैं, इसलिए इसे मानने में किसी को आपत्ति नहीं थी.

कहां से आया गांव का नाम

नदियों के नामों की उत्पत्ति पर हो रहे शोध में अब इस पर संदेह किया जा रहा है. शोधकर्ताओं का कहना है कि यह शब्द प्राचीन केल्ट और जर्मन सेंट शब्द से बना होगा जिसका अर्थ चलना होता है. इस तरह तीनों ही भाषाओं में सिन का अर्थ बहने वाला यानी नदी ही होगा. इस बीच इस शब्द की उत्पत्ति सानिया से मानी जा रही है जिसका केल्ट और लैटिन भाषाओं में अर्थ होता है दलदल. अब ये नाम कहीं से भी आया हो, यह तय है कि 780 में लिखित दस्तावेजों में सिना, तो 1607 और 1802 में सिन नाम का जिक्र मिलता है.

मिटेल सिन में करीब 800 लोग रहते हैं. यहां 1864 से ही मुखिया का चुनाव हो रहा है और अब तक 18 मुखिया रह चुके हैं. अंतिम मुखिया डिर्क शीफर हैं जो 2023 में मुखिया बने थे. 2020 के आंकड़ों के अनुसार गांव में 345 नौकरीशुदा लोग रहते हैं जबकि वहां के कृषि उद्यमों में 118 लोग फुलटाइम काम करते हैं. गांव में एक रेलवे स्टेशन भी है.

और यही स्टेशन जोड़ता है गांव के मुखिया डिर्क शीफर को जर्मनी की रेल कंपनी डॉयचे बान के साथ. शीफर पेशे से रेलवे ड्राइवर हैं और इस समय इंजनों की देखभाल करने वाली टीम के इंस्पेक्टर हैं. मिटेल सिन के गांव के मुखिया, जिसे जर्मन में बुर्गरमाइस्टर और अंग्रेजी में मेयर कहते हैं, इस मानद पद है और इस काम के लिए उन्हें कोई तनख्वाह नहीं मिलती है. पिछले तीन साल में डिर्क शीफर ने महसूस किया कि फुल टाइम नौकरी करना और गांव का मुखिया होना आसान काम नहीं है.

क्रिसमस ट्री के लिए प्रसिद्ध

मिटेलसिन गांव पहुंचकर जहां तक नजर जाती है, वहां क्रिसमस ट्री ही दिखते हैं. कहते हैं कि यहां की जमीन ऐसी है कि उसमें और कुछ नहीं फलता फूलता, लेकिन क्रिसमस ट्री खूब बड़े होते हैं. यही वजह है कि ये इलाका क्रिसमस के दौरान इस्तेमाल होने वाले पेड़-पौधों के उत्पादन और उनकी बिक्री का गढ़ बन गया है. गांव के उद्यमियों और राजनीतिज्ञों ने इसका फायदा उठाया है और गांव को पर्यटकों का आकर्षण बना दिया है. दिसंबर के महीने में यहां क्रिसमस से ठीक पहले दो बार क्रिसमस मेला लगता है जहां का मुख्य कारोबार क्रिसमस ट्री की बिक्री का है, लेकिन मेले में खाने पीने का भी खूब बंदोबस्त रहता है.

आज मिटेलसिन जर्मनी में सबसे ज्यादा क्रिसमस ट्री बेचने वाला गांव है. गांव के 24 फार्म क्रिसमस ट्री बेचते हैं तो 60 स्टॉल पर खाने पीने का इंतजाम होता है. दो वीकएंड के दौरान 800 लोगों वाले गांव में 25,000 लोग क्रिसमस ट्री खरीदने और मेले का मजा लेने आते हैं. मिटेलसिन इस बीच इतना लोकप्रिय हो गया है कि यहां के क्रिसमस मेले के उद्घाटन पर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी आ जाते हैं.

मुखिया का चुनाव न लड़ने का फैसला

इसी प्रसिद्ध गांव के मुखिया डिर्क शीफर ने इस बार के चुनाव में उम्मीदवार नहीं बनने का फैसला किया. उनकी जगह लेने के लिए बवेरिया की सत्ताधारी पार्टी सीएसयू, विपक्षी एसपीडी और दलगत राजनीति से स्वतंत्र नागरिकों के गठबंधन ने मिलकर एक उम्मीदवार खड़ा किया. इस व्यापक गठबंधन के कारण उम्मीदवार फिलिप कून की जीत पक्की लग रही थी. लेकिन दिक्कत ये हुई कि वे अकेले उम्मीदवार थे. स्थानीय चुनाव के नियमों के हिसाब से चूंकि कून अकेले उम्मीदवार थे, मिटेलसिन के मतदाता मतपत्र पर अपनी पसंद के एक उम्मीदवार का नाम डाल सकते थे.

अब जब वोटों की गिनती हुई तो पता चला कि फिलिप कून को 49.1 फीसदी वोट मिले. जीतने के लिए 50 फीसदी वोट का आना जरूरी है. उन्हें बहुमत नहीं मिला. बहुत सारे मतदाताओं ने जो नाम मतपत्र पर लिखा वो डिर्क शीफर का नाम था. बहुमत उन्हें भी नहीं मिला, लेकिन उन्हें कून से दो मत ज्यादा मिले. अब अगले हफ्ते गांव में मुखिया के चुनाव के लिए फिर से वोट डाले जाएंगे.

बवेरिया के चुनाव की खासियत

चुनाव कानून के अनुसार यदि बैलट पेपर पर अधिकतम एक उम्मीदवार हो तो मतदाता कलम से अपना एक सुझाव लिख सकते हैं. और फिर फैसला उन सुझावों के बीच होता है. इन चुनावों में मिटेलसिन के अलावा भी ऐसे कुछ दिलचस्प मामले सामने आए हैं जब उम्मीदवार नहीं बनने वाले कुछ नेता भी चुने गए हैं और आखिरकार उन्होंने मतदाताओं की बात मान ली है और पद पर काम करना स्वीकार कर लिया है.

टिरलाचिंग के मुखिया चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे. कोई और भी उम्मीदवार नहीं था. बैलट खाली था. मतदान हुआ और मतदाताओं ने अपनी पसंद के उम्मीदवारों के नाम बैलट पर लिखे. मौजूदा मुखिया का नाम 68 फीसदी लोगों ने बैलट पर लिखा. उनकी भारी जीत हुई और उन्होंने मुखिया बने रहना मान भी लिया. ब्रुनेन में भी मुखिया और उप मुखिया दोनों ही उम्मीदवार नहीं बनना चाहते थे. कोई और भी उम्मीदवार नहीं था. समय बीत चुका था. लोगों की बैठक हुई. दोनों के नाम का प्रस्ताव आया. दोनों ने माना कि अगर जीते तो पद को स्वाकीर करेंगे. चुनाव में उप मुखिया की भारी जीत हुई.

उम्मीदवार चुनाव न लड़े तो फिर क्या

पहले तो शीफर ऊहापोह में थे कि उम्मीदवार न होने के बावजूद इतना बड़ा समर्थन. लेकिन चुनाव लड़ें कि न लड़ें, पद संभालें कि नहीं संभालें, ये फैसला नितांत व्यक्तिगत होता है. जर्मनी के स्थानीय चुनावों में फैसला पूर्ण बहुमत से होता है. अगर किसी उम्मीदवार को पहले चरण में 50 फीसदी से ज्यादा वोट न मिले तो दो हफ्ते बाद दूसरे चरण में फैसला सबसे ज्यादा मत पाने वाले दो उम्मीदवारों के बीच होता है. बैलट पर कून के अलावा शीफर का भी नाम है. लेकिन काफी सोचविचार करने के बाद शीफर ने फैसला कर लिया है कि वे चुनाव नहीं लड़ेंगे और जीत के बदले उनका प्रचार अभियान ये चल रहा है कि प्लीज मुझे वोट मत दो.

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई है. अगले रविवार यानी 22 मार्च को फिर मतदान है. शीफर का नाम वोटिंग पेपर पर है. उनके मना करने के बावजूद अगर मतदाता उन्हें जिता देते हैं तो क्या होगा? शीफर का कहना है कि वे फैसला कर चुके हैं कि वह किसी भी हालत में मुखिया का पद नहीं संभालेंगे. और कून का क्या होगा? अगर वे चुनाव हार जाएंगे तो गांव को नए मुखिया के लिए फिर से चुनाव करना होगा. कून ने भी धमकी दे दी है. एक बार और चुनाव नहीं लड़ूंगा. जर्मनी के चुनाव इतिहास में पहले कभी ऐसा हुआ है या नहीं, ये रिसर्चर बाद में बताएंगे. फिलहाल फ्रैंकफर्ट और वुर्त्सबुर्ग के बीच स्थित मिटेलसिन गांव हर हाल में एक इतिहास तो बनाने जा ही रहा है.