एशिया-प्रशांत क्षेत्र में रक्षा क्षमताएं बढ़ाने की होड़
दुनिया भर में रक्षा बजट बढ़ता जा रहा है.
दुनिया भर में रक्षा बजट बढ़ता जा रहा है. सिंगापुर में सुरक्षा सम्मेलन में भी हथियारों और सैन्य ताकत बढ़ाने पर जोर दिखा जबकि अमेरिका-चीन की होड़ यहां की चर्चा का मुख्य विषय था.पिछले सप्ताह सिंगापुर में शांगरी-ला डायलॉग (एसएलडी) में दुनिया भर के रक्षा मंत्री, सैन्य अधिकारी और सुरक्षा विशेषज्ञ एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति पर चर्चा के लिए जुटे. यह सम्मेलन साल हर साल लंदन के 'इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज' (आईआईएसएस) आयोजित करता है. यह सिलसिला 2002 से चला आ रहा है. इस बार सम्मलेन से क्या प्रमुख नतीजे सामने आए?
1.एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बिगड़ती सुरक्षा स्थिति
शांगरी-ला डायलॉग 2026 के सिंगापुर में शुरू होने से एक सप्ताह पहले, सिंगापुर के प्रधानमंत्री लॉरेंस वोंग ने बयान दिया, "इस बदली हुई दुनिया की हकीकत यह है कि अस्थिरता बढ़ेगी और हमें एक के बाद एक संकटों का सामना करना पड़ेगा."
उनकी यह चेतावनी सही साबित होती दिख रही है. हाल के समय में एशिया-प्रशांत क्षेत्र में कई संघर्ष तेज हो गए हैं. मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच संक्षिप्त युद्ध हुआ था. थाईलैंड और कंबोडिया के बीच संघर्ष बड़ी मुश्किल से दिसंबर 2025 में खत्म हो सका. फरवरी 2026 में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बार-बार होने वाली झड़पें पाकिस्तानी हवाई हमलों के बाद और तीव्र हो गईं. म्यांमार में गृहयुद्ध अब भी जारी है. दक्षिण चीन सागर में भी समय-समय पर तनाव बढ़ता रहता है. दूसरी तरफ क्षेत्र की कई सुरक्षा चुनौतियों के केंद्र में रहने वाला ताइवान अभी भी अनिश्चितताओं से घिरा हुआ है.
हालांकि, सबसे अधिक चर्चा अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती होड़ की रही. चीन की तेजी से मजबूत होती सैन्य शक्ति एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन को बदल रही है.
आईआईएसएस दक्षिण-पूर्व एशिया सुरक्षा और रक्षा फेलो इवान ए.लक्ष्मण ने शांगरी-ला डायलॉग की वार्षिक सुरक्षा रिपोर्ट में स्थिति के बारे में कहा, "क्षेत्र का कोई भी देश, चाहे वह बड़ा, मध्यम या छोटा हो, इस बिगड़ते सुरक्षा हालात के असर से अछूता नहीं रह सकता."
शुक्रवार शाम सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए वियतनाम के राष्ट्रपति तो लाम ने अपने मुख्य भाषण में कहा कि देशों के बीच प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है, लेकिन उसे नियंत्रण में रखा जाना चाहिए. वह कहते हैं, "मतभेदों को कानून के दायरे में सुलझाया जाना चाहिए, ताकि देशों के बीच प्रतिस्पर्धा सीमित, जिम्मेदार और अनुमान के मुताबिक रहे. डर और आपसी अविश्वास के आधार पर क्षेत्र में स्थायी शांति और व्यवस्था कायम नहीं की जा सकती."
तो लाम आगे कहते हैं, "कई देशों के लिए विकास, सुरक्षा के बाद आने वाला दूसरा विकल्प नहीं है बल्कि सुरक्षा जितना ही महत्वपूर्ण है."
ऑस्ट्रेलिया के उप-प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री रिचर्ड मार्लेस ने भी इस बात से सहमति जताते हुए कहा, "सुरक्षा पूरी तरह से विकास से जुड़ी हुई है. जहां समृद्धि और लोगों का विकास होता है, वहां स्थिरता और शांति को भी मजबूती मिलती है. जब इन सब पर सवाल उठते हैं, तभी अस्थिरता और अशांति पैदा होती है."
2. हथियारों पर बढ़ता खर्च
शांगरी-ला डायलॉग में बिगड़ते सुरक्षा माहौल से निपटने के लिए विकास नहीं, बल्कि सैन्य ताकत बढ़ाने पर अधिक जोर दिखाई दिया. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) के अनुसार, एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सैन्य खर्च 2025 में 8.1 प्रतिशत बढ़कर 681अरब डॉलर हो गया.
अमेरिका के युद्ध मंत्री पीट हेगसेथ मानते हैं कि यह पर्याप्त नहीं. शनिवार को सम्मेलन में उन्होंने कहा कि अमेरिका जल्द ही रक्षा पर 1.5 ट्रिलियन डॉलर खर्च करेगा. साथ ही उन्होंने एशिया में अमेरिका के सभी सहयोगी देशों से अपनी सुरक्षा और रक्षा क्षमताओं पर अधिक निवेश करने का आग्रह किया.
वह कहते हैं, "शक्ति का संतुलन बनाए रखने के लिए ऐसे सहयोगियों की जरूरत है जिनके पास मजबूत सेना, पर्याप्त औद्योगिक क्षमता और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति हो. लंबे समय से इस क्षेत्र की सुरक्षा का बोझ मुख्य रूप से अमेरिकी सैन्य ताकत पर टिका रहा है जबकि हमारे कई सहयोगी देशों ने अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया."
उन्होंने विशेष रूप से दक्षिण कोरिया, फिलीपींस, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, वियतनाम और भारत की सराहना की. उनका कहना था कि यूरोप के विपरीत इन देशों ने यह समझ लिया है कि शांति केवल ताकत के दम पर ही सुनिश्चित की जा सकती है. उन्होंने अपने भाषण में इस बात को दोहराया भी.
अमेरिकी आलोचना के बावजूद जर्मन प्रतिनिधिमंडल शांत रहा. जर्मनी के रक्षा मंत्रालय में राज्य सचिव नील्स हिलमर ने कहा कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र को भी यूरोप जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, खासकर सैन्य क्षमताओं की कमी का. संविधान में संशोधन के बाद जर्मनी के पास कम से कम पर्याप्त धन उपलब्ध है. उनके अनुसार, "कई सालों में यह पहली बार है कि जर्मन सेना (बुंडेसवेयर) को आवश्यक धन मिल रहा है. फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण काम सही समय पर, सही मात्रा में और सही प्रकार के हथियारों की खरीद करना है."
एसएलडी में इस बात पर बहुत कम चर्चा हुई कि ज्यादा हथियार होने का मतलब हमेशा ज्यादा सुरक्षा और शांति नहीं होता. केवल अंतर्राष्ट्रीय रेड क्रॉस समिति की अध्यक्ष मिर्जना स्पोलजारिक ने चिंता व्यक्त की, "जहां हथियार बनते हैं, वहां उनका इस्तेमाल भी होता है. हथियारों का बढ़ता उत्पादन और रक्षा क्षेत्र में भारी निवेश आखिरकार मानव जीवन और संपत्ति के नुकसान का कारण बनेंगे. इसीलिए हमें रक्षा बजट बनाते समय युद्ध के इस पहलू को पहले दिन से ही ध्यान में रखना होगा."
3.ताइवान को लेकर अनिश्चितता बरकरार
इस साल अपने भाषण में पीट हेगसेथ ने ताइवान का एक बार भी जिक्र नहीं किया. ताइवान एक स्वशासित क्षेत्र है. लेकिन चीन ताइवावन को अपना एक ‘अलग हुआ प्रांत' मानता है. बीजिंग ने ताइवान को 'दोबारा अपने साथ मिलाने' लिए बल प्रयोग करने से इनकार नहीं किया है.
2025 के शांगरी-ला डायलॉग में हेगसेथ का रुख कहीं अधिक आक्रामक था. उन्होंने चेतावनी दी थी कि ‘कम्युनिस्ट चीन' ताइवान पर हमला करने के करीब हो सकता है, जिसके दुनिया भर में विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं.
मई के मध्य में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद अमेरिका-चीन संबंधों, खासकर ताइवान के मुद्दे पर, आए बदलाव ने कई लोगों का ध्यान खींचा. दोनों नेताओं ने भविष्य के संबंधों को दिशा देने के लिए चीन के प्रस्तावित ‘रचनात्मक संबंध और रणनीतिक स्थिरता' के फार्मूले पर सहमति जताई थी. हेगसेथ ने भी अपने भाषण में इन्हीं शब्दों का इस्तेमाल किया. उन्होंने कहा, "अमेरिका और इलाके के देशों की सुरक्षा हालात को लेकर समझ समान है. यदि प्रशांत क्षेत्र में किसी एक देश का दबदबा हो जाता है, तो इससे क्षेत्र में शक्ति संतुलन बिगड़ जाएगा और वह साम्य कमजोर होगा जिसे हम सभी बनाए रखना चाहते हैं."
एसएलडी के दौरान डीडब्ल्यू को दिए इंटरव्यू में चीन के पूर्व उप विदेश मंत्री सुई टिंकाई ने इस बदलाव पर संतोष जताते हुए बताया, "राष्ट्रपति शी जिनपिंग और राष्ट्रपति ट्रंप ने चीन-अमेरिका संबंधों के लिए एक नई सोच पर सहमति जताई है. यही रचनात्मक रणनीतिक स्थिरता है. अब दोनों पक्षों के लिए सबसे महत्वपूर्ण काम यह है कि वे मिलकर इस सोच को वास्तविकता में बदलें."
सुई टिंकाई के अनुसार, इसमें ताइवान को हथियारों की आपूर्ति रोकना भी शामिल है, "हम किसी भी समय और किसी भी मात्रा में ताइवान को हथियार बेचने के खिलाफ हैं. इस बारे में हमारा रुख बिल्कुल स्पष्ट है. आगे होने वाली कोई भी हथियार बिक्री रचनात्मक कदम नहीं होगी. इससे क्षेत्रीय स्थिरता को नुकसान पहुंचेगा."
सम्मेलन के दौरान एक श्रोता ने पूछा कि ताइवान के लिए 14 अरब डॉलर के हथियार पैकेज का क्या होगा. इस पैकेज को अमेरिकी कांग्रेस मंजूरी दे चुकी है. हालांकि मई में ट्रंप ने इसे फिलहाल रोक दिया था. इस पर हेगसेथ ने जवाब दिया कि इस बारे में अंतिम फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति का ही होगा.
4.अमेरिका की भूमिका अब भी अहम, लेकिन उसकी भी सीमाएं हैं
लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मामलों पर नजर रखने वाले और पूर्व राजनयिक बिलाहारी कौसिकन ने डीडब्ल्यू से कहा कि बुनियादी वास्तविकताएं अब भी बदली नहीं हैं. वह कहते हैं, "सच्चाई यह है कि अमेरिका के समर्थन के बिना यूरोप, रूस को प्रभावी ढंग से रोक नहीं सकता. अमेरिका के सहयोग के बिना एशिया, चीन के बढ़ते प्रभाव का संतुलन नहीं बना सकता. एक ही अमेरिका है. हमें उसके साथ मिलकर काम करना होगा."
उन्होंने आगे कहा, "इसके आधार पर छोटे और मझले देश भी अपनी भूमिका निभा सकते हैं. वे पूरी तरह बेबस नहीं हैं. अपने हितों के अनुसार वे अलग-अलग क्षेत्रों में आपस में सहयोग कर सकते हैं और साथ मिलकर काम कर सकते हैं.”
फिलहाल एशिया में नई और बहुस्तरीय सुरक्षा साझेदारियां उभर रही हैं. ऑस्ट्रेलिया, फिलीपींस, भारत, न्यूज़ीलैंड और सिंगापुर के साथ जापान अपने सुरक्षा सहयोग को और मजबूत कर रहा है. आईआईएसएस के जापान विशेषज्ञ रॉबर्ट वॉर्ड ने डीडब्ल्यू से कहा, "जापान क्षेत्र में समान सोच वाले देशों का एक नेटवर्क बनाने की कोशिश कर रहा है. यह बहुत बड़ा क्षेत्र है. कोई भी देश अकेले इसकी चुनौतियों से नहीं निपट सकता, यहां तक कि अमेरिका भी नहीं."
वह आगे कहते हैं, "मुझे लगता है कि इसका एक और मकसद चीन के लिए रणनीतिक चुनौतियां बढ़ाना है."
फिलीपींस के रक्षा मंत्री गिल्बर्टो टियोदोरो जूनियर ने भी इसी तरह की बात कही, "अमेरिका हमारे साथ है. लेकिन सिर्फ वही नहीं है. जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा और फ्रांस भी हमारे साथ हैं. संभावित खतरों को रोकने के लिए हमारे साथ सहयोग करने वाले देशों की संख्या बढ़ रही है और यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा."
जर्मनी भी अपने सहयोगियों का विस्तार कर रहा है. राज्य सचिव निल्स हिल्मर कहते हैं, "हम केवल रणनीतिक सहयोग की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि जापान और सिंगापुर जैसे देशों के साथ मिलकर साझा रणनीतियां भी तैयार कर रहे हैं."
उन्होंने जोर देकर कहा कि यह सहयोग सिर्फ बातचीत तक सीमित नहीं है. सुरक्षा नीति के स्तर पर भी व्यावहारिक रूप से लागू किया जा रहा है. हाल ही में जर्मनी ने आरआईएमपीएसी (रिमपैक) में हिस्सा लिया.
यह प्रशांत महासागर में होने वाले विश्व के सबसे बड़े समुद्री सैन्य अभ्यास माना जाता है. जर्मनी 2026 में भी फिर से भाग लेने की योजना बना रहा है.
(The above story first appeared on LatestLY on Jun 02, 2026 08:40 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

