यूरोप में जिन शरणार्थियों को शरण नहीं मिलती या फिर जिनके मूल देश के बारे में जानकारी नहीं हो, उन्हें अब यूरोपीय संघ के बाहर के किसी देश में रखा जाएगा.यूरोपीय संघ ने संघ के बाहर के देशों में प्रत्यर्पण केंद्र बनाने का रास्ता साफ कर दिया है. यूरोपीय संसद और यूरोपीय संघ के सदस्यों के बीच अस्थायी सहमति होने के बाद अब यह संभव होगा.
सोमवार, 01 जून की शाम को यूरोपीय संसद के प्रतिनिधियों और यूरोपीय संघ की सरकारों के बीच इस मुद्दे पर सहमति बन गई. यूरोपीय संघ की परिषद के वर्तमान अध्यक्ष साइप्रस ने यह जानकारी दी है. सहमति के मुताबिक शरण का आवेदन खारिज होने वाले जिन लोगों को उनके मूल देश वापस नहीं भेजा जा सकता उन्हें "रिटर्न हब" में यूरोपीय संघ के बाहर कहीं रखा जाएगा.
रिटर्न हब कहां होगा?
अभी यह साफ नहीं है कि कथित रिटर्न हब कहां बनाए जाएंगे. मुख्य रूप से इसमें वो लोग हैं जिनके मूल देश का या तो पता नहीं है या फिर यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के साथ उनके राजनयिक संबंध नहीं हैं. इस कदम का मकसद प्रत्यर्पण को बढ़ाना और उन प्रवासियों की संख्या बढ़ाना है जिन्हें यहां से भेजा जाना है मगर फिर भी वे संघ में रुके हुए हैं. ऐसे आप्रवासियों के साथ जो नाबालिग बच्चे हैं उन्हें इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है. हालांकि परिवारों को इस योजना के तहत "रिटर्न हब" में भेजा जा सकता है.
इस तरह के प्रत्यर्पण के लिए सबसे जरूरी है किसी गैर यूरोपीय संघ के देश के साथ रिटर्न हब के लिए करार.यह देश शरणार्थियों को अपने यहां रखेगा और उसके बदले में आर्थिक हर्जाना और वीजा जारी करने जैसे मामलों में प्राथमिकता मिल सकती है.
यूरोपीय संसद की प्लेनरी और यूरोपीय संघ के सदस्य देशों को इस करार को अभी औपचारिक मंजूरी देना बाकी है. जर्मनी, ग्रीस, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड्स और डेनमार्क इस योजना के लिए काफी दबाव बना रहे थे. इटली ने पहले से ही अल्बानिया के साथ शरण मांगने वालों को रखने के लिए करार कर चुका है.
शरण नहीं पाने वाले शरणार्थियों पर सख्ती
इस करार में उन लोगों के लिए नियमों को सख्त किया गया है जिनके शरण का आवेदन खारिज हो गया है. इसका मकसद उन लोगों के प्रत्यर्पण में तेजी लाना है जिन्हें उनके मूल देश वापस भेजा जा सकता है. नई योजना के तहत ऐसे लोगों को अधिकारियों के साथ सहयोग करना होगा नहीं तो प्रत्यर्पण लंबित रहने तक उन्हें हिरासत में रखा जा सकता है. जो लोग सहयोग नहीं करेंगे उन्हें सरकार से मिलने वाले लाभ से वंचित किया जा सकता है. इसके साथ ही उनके यात्रा दस्तावेजों को भी जब्त किया जा सकता है.
नए नियमों में राष्ट्रीय सुरक्षा को ऐसे व्यक्तियों से किसी तरह का खतरा होने पर उन्हें हिरासत में रखना भी शामिल है. उन्हें अधिकतम 24 महीने तक हिरासत मे् रखा जाता सकता है, असाधारण मामलों में यह अवधि छह महीने के लिए बढ़ाई जा सकती है. चर्चा में शामिल मुद्दों की जानकारी रखने वालों के हवाले से समाचार एजेंसी डीपीए ने यह खबर दी है.
यूरोपीय संघ के आप्रवासन आयुक्त मैग्नस ब्रुनर ने इस समझौते का स्वागत किया है. उनका कहना है कि नए नियम अधिकारियों को "यूरोपीय संघ में कौन आ सकता है, कौन रह सकता है और कौन जाएगा इसे तय करने के लिए ज्यादा नियंत्रण देंगे."
ईयू की नई योजना पर विवाद
यूरोपीय संघ की इस नई योजना पर विवाद हो रहा है क्योंकि इसे यूरोपीय संसद की दक्षिणपंथी पार्टियों के सहयोग से लाया गया है. आमतौर पर मध्यमार्गी पार्टियां बहुमत से ऐसे फैसले पास कराती हैं.
इससे पहले डीपीए ने खबर दी थी कि मध्य दक्षिणपंथी यूरोपीय पीपुल्स पार्टी (ईपीपी) धुर दक्षिणपंथी पार्टियों के संसदीय गुटों के साथ संपर्क में थी ताकि उन्हें इस मुद्दे पर साथ लाया जा सके. पार्टियों के बीच व्हाट्सएप पर ग्रुप चैट के जरिए चर्चा भी हुई.
यूरोपीय संघ की आप्रवासन और शरण रिपोर्ट, 2025 के मुताबिक 2023 में यूरोप में कुल 44 लाख लोग आए इसमें यूरोपीय और गैर यूरोपीय देशों से आए शरणार्थी शामिल हैं. उसी अवधि में करीब 15 लाख लोग यूरोपीय संघ से बाहर गए. गैर यूरोपीय संघ के देशों से यूरोपीय संघ में आने वाले सबसे अधिक करीब 19 लाख शरणार्थी स्पेन गए. इसके बाद 925,000 शरणार्थियों ने जर्मनी का रुख किया. इसके बाद इटली, फ्रांस और पोलैंड का नंबर है.













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