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हर दिन एक नई भाषा, फिर भी 20 साल कम पड़ जाएंगे

अंग्रेजी, मैंडरिन चायनीज, हिंदी, स्पैनिश, अरबी और फ्रेंच दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाती हैं लेकिन भाषा का संसार यहां खत्म होने की बजाय शुरू होता है.

हर दिन एक नई भाषा, फिर भी 20 साल कम पड़ जाएंगे
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

अंग्रेजी, मैंडरिन चायनीज, हिंदी, स्पैनिश, अरबी और फ्रेंच दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाती हैं लेकिन भाषा का संसार यहां खत्म होने की बजाय शुरू होता है. हर रोज एक भाषा सुनने पर भी सारी भाषाओं की बारी आने मे 20 साल लगेंगे.ज्यादा इस्तेमाल होने वाली भाषाएं बोलने वालों में मातृभाषी के अलावा दूसरे लोग भी शामिल है. कुल मिला कर पृथ्वी पर इस समय लगभग 7,500 भाषाएं बोली जा रही हैं. यह संख्या भले बहुत लग रही हो लेकिन यह सर्वाधिक नहीं है. इतिहास में ऐसा भी वक्त रहा है जब दसियों हजार भाषाएं इस्तेमाल में थीं. रिसर्चरों के मुताबिक यह समय ईसा पूर्व के पहले एक हजार साल से ईसा बाद के एक हजार साल तक के दौर में था.

रिसर्चरों ने गणितीय मॉडल और मानवविज्ञान की अंतरदृष्टि के साथ ही जनसांख्यिकीय आकलनों का इस्तेमाल कर बीते 12,000 सालों से दुनिया भर में इस्तेमाल हो रही भाषाओं की संख्या का पता लगाया है. यह वो समय था जब आखिरी हिम युग खत्म हो रहा था. इसे पूरे समय को होलोसीन युग भी कहा जाता है.

रिसर्चरों ने भाषा के लिहाज से "स्वर्ण युग" के बाद से भाषाओं की संख्या में भारी कमी आने का भी पता लगाया है. इसकी वजह यह थी कि कई सदियों तक चले विशाल साम्राज्यों के विस्तार और यूरोपीय उपनिवेशवाद की वजह से कुछ भाषाओं ने दूसरी भाषाओं की जगह ले ली.

30,000 से 75,000 तक भाषाएं

इस बारे में हुई रिसर्च की रिपोर्ट साइंस जर्नल में छपी है. अमेरिका के कनेक्टिकट में येल यूनिवर्सिटी की भाषा और मानवविज्ञान की प्रोफेयर क्लेयर ब्रोवेर्न इस रिसर्च रिपोर्ट की प्रमुख लेखिका हैं. उनका कहना है, "भाषाएं अपने समुदायों के लिए काफी अर्थपूर्ण हैं. वैज्ञानिकों के लिए भाषाएं अतीत के बारे में बहुत सारी जानकारियां साथ लेकर चलती हैं, लोग कहां रहते थे, क्या खाते थे और किस बारे में बात करते थे. वे इंसान के दिमाग में झांकने के लिए खिड़कियां भी खोलती हैं."

बहुत सारे भाषा परिवार जन्मे और उभरे जिसके बाद आखिरकार लिखित भाषा सामने आई. सबसे पहले मेसोपोटामिया में सुमेरियाई भाषा को कीलाक्षर लिपी में लिखा गया. यह ईसा पूर्व चार हजार साल पहले की बात है. इसके साथ ही मिस्र, चीन और मेसोअमेरिका में भी अलग अलग यह काम हुआ. रिसर्चरों ने अनुमान लगाया है कि कोई समय ऐसा भी रहा होगा जब 30,000 से लेकर 75,000 तक भाषाएं एक ही समय में दुनिया के अलग अलग हिस्सों में इस्तेमाल हो रही थीं.

स्पेन के कातालान इंस्टीट्यूशन फॉर रिसर्च एंड एडवांस्ड स्टडीज से जुड़े कॉग्निटिव साइंटिस्ट डामियान ब्लासी भी इस रिसर्च रिपोर्ट के प्रमुख लेखकों में हैं. उनका कहना है, "हम इस बात से शायद ही कभी खुश होते हैं कि महज कुछ हजार साल पहले तक मानवता आज जितना हम जानते हैं उसकी तुलना में बहुत ज्यादा विविध सांस्कृतिक दुनिया में जी रही थी."

भाषा का समाज और संस्कृति से संबंध

रिसर्चरों ने अपने आकलनों तक पहुंचने के लिए कुछ चतुराई भी दिखाई. बोवेर्न का कहना है, "हाल के दिनों तक भाषाओं की संख्या का कोई सीधा सबूत नहीं था. हम प्राचीन काल के अधूरे सबूतों पर भरोसा नहीं कर सकते थे. हम भाषाओं और समाजों के बीच संबंध के बारे में बहुत कुछ जानते हैं इसलिए समय के दौर में भाषा की विविधता का सिम्युलेशन मॉडल बनाने में कुछ धारणाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं."

रिसर्चरों ने अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और दक्षिण पूर्वी एशिया में प्राचीन समय से लेकर अब तक मौजूद शिकारी घुमक्कड़ समुदायों के आंकड़ों का इस्तेमाल कर जातीय भाषाई समूहों के आकार का पता लगाया. इनमें से हर समुदाय होलसीन युग के शुरू होने के समय अलग भाषा का प्रतिनिधित्व करता है. उन्होंने इसे उस समय की इंसानी आबादी का आकलन करने में इस्तेमाल किया.

लोग उस वक्त छोटे छोटे समूहों में पूरी दुनिया में फैले हुए थे और शिकारी घुमक्कड़ बंजारों का जीवन जी रहे थे. खेती की शुरुआत के साथ जटिल संस्कृतियों का समय अभी शुरू नहीं हुआ था. रिसर्चरों का अनुमान है कि 12,000 साल पहले यहां वहां बिखरी आबादी 4,500 से 6,200 भाषाओं का इस्तेमाल करती थी.

खेती के साथ हुआ भाषा का विकास

आने वाली सदियों में जब वैश्विक जनसंख्या बढ़ने के साथ मानव समाज में बदलाव हुए तो भाषाओं की संख्या का भी विस्तार होता गया. बोवेर्न का कहना है, "जब जनसंख्या बढ़ रही थी और खेती का इस्तेमाल स्थाई रूप से टिक कर रहने वाले समुदाय ज्यादा बना रहा था तो वह स्थित छोटी-छोटी कई भाषाओं को पाल रही थी."

बहुत सी छोटी बड़ी भाषाएं आईं और चली गईं. सुमेरियाई, हिट्टिटे, अक्काडियन और एट्रुस्कन भाषाएं, प्राचीन मिस्र में इस्तेमाल होने वाली भाषाएं, प्राचीन चीन और कुछ अफ्रिकी भाषाएं इनमें शामिल हैं. बोवेर्न ने भाषाओं के लुप्त होने के कुछ तरीके भी बताए. उनका कहना है, "उस भाषा को बोलने वाले लोगों की मौत या फिर उन लोगों की भाषा बदलने या फिर दूसरी भाषा को अपनाने के लिए मजबूर होने से" ऐसा हुआ. बोवेर्न ने इस ओर भी ध्यान दिलाया कि पुरानी भाषाओं का विकास नई भाषा में भी हुआ. ईसा बाद 476 साल में पश्चिमी रोमन साम्राज्य के खत्म होने के बाद लैटिन और प्राचीन रोम की जबान विकसित हो कर फ्रेंच, इटैलियन और स्पैनिश भाषा में बदल गई.

आधी से ज्यादा भाषाएं खतरे में

औपनिवेशिक ताकतों ने अकसर भाषाई साम्राज्यवाद भी चलाया. उदाहरण के लिए इंग्लैंड ने आयरलैंड में आयरिश भाषा पर चोट की, स्पेन ने अमेरिका में स्थानीय भाषाओं पर प्रतिबंध लगाया और पुर्तगाल ने ब्राजील की घरेलू भाषाओं को बंद करा दिया. अफ्रीकी उपनिवेशों में फ्रांस का फ्रेंच को बढ़ावा देना और कोरिया में जापान का कोरियन भाषा को दबाना भी शामिल है. हालांकि इसके बाद भी कुछ भाषाएं अपना अस्तित्व बचाने में सफल हुईं. इंका, माया और एजटेक की भाषाएं स्पैनिश के दबाव के बाद भी बची रहीं.

आज जितनी भाषाएं इस्तेमाल हो रही हैं उनमें से आधी लुप्त होने का खतरा झेल रही हैं. बोवेर्न का कहना है, "दुनिया की 90 फीसदी आबादी केवल 10 फीसदी भाषाओं का इस्तेमाल करती है, तो ऐसे में बहुत सी ऐसी भाषाएं हैं जिनका इस्तेमाल बहुत थोड़े से लोग या फिर गायक करते हैं."

(The above story first appeared on LatestLY on Jul 28, 2026 05:50 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).