Marathwada Mukti Sangram Diwas 2025: क्या है मराठवाड़ा मुक्ति संग्राम की गाथा? जानें हैदराबाद निजाम के निरंकुश शासन से मराठवाड़ा को कैसे मिली मुक्ति?

  ब्रिटिश हुकूमत से जब भारत को आजादी मिली, तब भारत 565 रियासतों में बंटा हुआ था. इनमें से 562 रियासतों ने तो स्वतंत्र भारत में शामिल होने की सहमति जताई, मगर हैदराबाद, कश्मीर और जूनागढ़ की 3 रियासतों ने स्वतंत्र भारत में शामिल होने से मना कर दिया. इन तीन रियासतों के लोग अभी भी आजाद नहीं हुए थे. उन दिनों मराठवाड़ा हैदराबाद राज्य का हिस्सा था और मराठवाड़ा के लोगों को स्वतंत्रता हासिल करने के लिए हैदराबाद के निज़ाम के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी. इस लड़ाई में कई लोगों को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी थी.

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  साल 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआतब हैदराबाद रियासत, जो उस समय तक निज़ाम के अधीन थी, ने हैदराबाद को स्वतंत्र भारत या पाकिस्तान में विलय करने से इनकार कर दिया. उस समय तक आज का तेलंगानाकर्नाटक और महाराष्ट्र के कुछ हिस्से, जिसमें मराठवाड़ा का भी बड़ा हिस्सा हैदराबाद रियासत में शामिल था. निज़ाम और उसकी सेना ने भारत में विलय का विरोध किया और एक स्वतंत्र इस्लामिक राज्य बनाए रखने के लिए अड़े रहे. यही नहीं हैदराबाद रियासत में निज़ाम का हिंदू विरोधी दमनकारी शासन जारी था. आम लोगों पर भारी अत्याचार किए जा रहे थेजिससे जनता में भारी आक्रोश था. यह भी पढ़ें : Vishwakarma Puja 2025 Wishes: विश्वकर्मा पूजा के इन हिंदी WhatsApp Messages, Facebook Greetings, Quotes को भेजकर दें अपनों को शुभकामनाएं

मराठवाड़ा मुक्ति संग्राम की

  निज़ाम के शासन में जोर-जबरदस्तीअत्याचारधार्मिक भेदभाव और रजाकारों (निजाम के निजी सैनिक बल) का वहां के निवासियों पर आतंक चरम पर था. अंततः मराठवाड़ा के लोगों ने निजाम के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया. इस आंदोलन में नेताओं और स्वतंत्रता सेनानियों के साथ-साथ भारी संख्या में किसानछात्रमजदूरशिक्षक और में महिलाओं ने हिस्सा लिया. इस आंदोलन को सही और निर्णायक दिशा देने में भारत सरकार की ओर से गोपीनाथ मुंडे, सरदार वल्लभभाई पटेल, तथा गोविंद भाई श्रॉफ, बाबूराव जी करंजकर, स्वामी रामानंद तीर्थ, विनायक राव पाटिल, बाबूरावजी करंजेकर की बड़ी भूमिका थी.

'ऑपरेशन पोलो' – भारत सरकार की कार्रवाई

    हैदराबाद निजाम की जिद और जबरदस्ती पर अंकुश लगाने और साम, दाम, दंड भेद का रास्ता अपनाते हुए भारत सरकार ने हैदराबाद रियासत को भारत में विलय करने हेतु 'ऑपरेशन पोलो' नामक सैन्य अभियान चलाया. सरदार पटेल के निर्देशन में भारी संख्या में सैनिक बलों ने निजाम को चारों ओर से घेर लिया. ऑपरेशन पोलो अभियान 13 सितंबर से 17 सितंबर 1948 तक चला. अंततः कोई रास्ता नहीं मिलने पर 17 सितंबर 1948 को निज़ाम ने आत्मसमर्पण कर दिया. इसके बाद हैदराबाद रियासत का भारत में विलय हुआ. इसके बाद वहां तिरंगा फहराकर लोगों को आजादी दिलाई. इसलिए प्रत्येक वर्ष 17 सितंबर को मराठवाड़ा मुक्ति संग्राम दिवस के रूप में मनाया जाता हैजिसमें महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र के लोगों द्वारा बड़े हर्ष और गर्व के साथ मनाया जाता है. यह दिवस जनता की एकतासाहस और बलिदान के रूप में याद किया जाता है.

मराठा मुक्ति संग्राम की गाथा

   मराठवाड़ा मुक्ति संग्राम की गाथा मराठवाड़ा क्षेत्र के हैदराबाद राज्य से भारतीय गणराज्य में विलय की कहानी हैजो 17 सितंबर 1948 को संपन्न हुआइस संघर्ष का मुख्य उद्देश्य जनता के नागरिक और राजनीतिक अधिकारों की सुरक्षा तथा निज़ाम की दमनकारी सत्ता को समाप्त कर संपूर्ण निजाम को भारत में शामिल करना था. भारत की स्वतंत्रता के 13 माह बादभारतीय सेना ने हैदराबाद राज्य पर कब्ज़ा कियानिज़ाम को उखाड़ फेंका और मराठवाड़ा क्षेत्र का भारत के साथ विलय सुनिश्चित किया. यह घटना मराठवाड़ा मुक्ति दिवस के रूप में हर साल 17 सितंबर को मनाई जाती है.