Madanlal Dhingra Punya Tithi: साहस और शौर्य के प्रतीक क्रांतिकारी मदन लाल ढींगरा! जिन्होंने खूंखार कर्जन वायली को दिन-दहाड़े गोली से उड़ाया!
ब्रिटिश हुकूमत से गुलाम भारत को आजादी दिलाने में असंख्य क्रांतिकारियों ने हिस्सा लिया था. अंग्रेजों की बर्बरता का सामना करते हुए निर्वाचन, कारावास एवं संपत्ति जब्ती की पीड़ा सहते हुए हंसते हुए फांसी के तख्ते पर झूल गये. लेकिन तमाम असंख्य क्रांतिकारियों के नामों निशां भी मानों मिटा दिये गये.
ब्रिटिश हुकूमत से गुलाम भारत को आजादी दिलाने में असंख्य क्रांतिकारियों ने हिस्सा लिया था. अंग्रेजों की बर्बरता का सामना करते हुए निर्वाचन, कारावास एवं संपत्ति जब्ती की पीड़ा सहते हुए हंसते हुए फांसी के तख्ते पर झूल गये. लेकिन तमाम असंख्य क्रांतिकारियों के नामों निशां भी मानों मिटा दिये गये. इनमें से श्यामजी कृष्ण वर्मा, वीर सावरकर, भीकाजी कामा, बैरिस्टर सरदार सिंह राणा, वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय, मदनलाल ढींगरा, सरदार अजीत सिंह, लाला हरदयाल, रासबिहारी बोस, राजा महेंद्र प्रताप एवं चंपक रमन पिल्लई प्रमुख थे. आज हम ऐसे ही एक अदम्य साहस एवं त्याग के प्रतिमूर्ति मदन लाल ढींगरा की बात करेंगे. मदनलाल ढींगरा को ब्रिटिश हुकूमत ने 17 अगस्त 1909 को फांसी पर लटका दिया था. इस महान क्रांतिकारी की 113वीं पुण्य-तिथि पर आइये जानें इनकी बहादुरी की कहानी...
मदनलाल ढींगरा का जन्म 18 सितंबर 1883 को अमृतसर हुआ था. उनके पिता जीतमल नेत्र-रोग विशेषज्ञ एवं सिविल सर्जन थे, और अमृतसर के सिविल सर्जन थे. कहते हैं कि वे इस प्रतिष्ठित पद पर पहुंचने वाले पहले भारतीय चिकित्सक थे. माँ धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी. मदनलाल सात भाइयों में छठे नंबर के थे. पिता के साथ-साथ भाई अच्छे पदों पर आसीन थे.
ऐशो-आराम त्याग कर बने क्रांतिकारी!
मदन लाल ढींगरा का परिवार अंग्रेजों का विश्वासपात्र था. लेकिन मदनलाल ने जब गरीबों पर अंग्रेजों का दमन और यंत्रणा देखा, तो उनसे रहा नहीं गया. वह क्रांतिकारियों के साथ मिलकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खड़े हो गये. उनकी इस हरकत से परिवार ने उनसे नाता तोड़ लिया. तब वह गुजारे के लिए कभी क्लर्क बने, कभी तांगा चलाकर आजीविका चलाया. कुछ समय फैक्टरी में भी कार्य करना पड़ा. फैक्टरी में कार्य करते हुए जब वहां के मजदूरों की दशा उन्होंने देखा तो उनके जीवन को सुधारने हेतु संगठन बनाया, लेकिन इससे पूर्व ही उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया. अंततः बड़े भाई की मदद से वह उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड चले गये.
लंदन में मदनलाल की मुलाक़ात राष्ट्रवादी विनायक दामोदर सावरकर से हुई. देश-प्रेम और भारत की आजादी की चाहत देख सावरकर ने उन्हें 'अभिनव भारत’ नामक क्रान्तिकारी संस्था का सदस्य बनाकर हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिलाना शुरू किया.
देश की पूजा ही राम की पूजा है!
मदनलाल भारतीयों के गरीबों को लेकर बहुत चिंतित रहते थे, उन्होंने अध्ययन करने पर पाया कि औपनिवेशिक सरकार की औद्योगिक और वित्तीय नीतियों को स्थानीय उद्योग को दबाने और ब्रिटिश आयातों की खरीद के पक्ष में बनाया गया था, जो भारत के आर्थिक विकास का दुश्मन बन रहा था. उन्होंने आंदोलनों के माध्यम से विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना शुरू किया, और शेष भारतीयों को भी इसमें शामिल होने के लिए प्रेरित किया. उन्होने नारा दिया- ‘देश की पूजा ही राम की पूजा है’.
कर्जन वायली की हत्या की कूटनीतिक तरीका!
उन दिनों ब्रिटिश ऑफीसर विलियम कर्जन वायली सावरकर एवं कुछ विशिष्ठ क्रांतिकारियों के पीछे हाथ धोकर पड़ा था. वस्तुतः कर्जन वायली भारत में लंबे समय से तैनात थे और सीक्रेट पुलिस प्रमुख थे, क्रांतिकारियों के कट्टर दुश्मन थे. ब्रिटिश प्रशासन को उस पर अदम्य भरोसा था. वायली ढींगरा के पिता के अच्छे दोस्त थे. मदनलाल ढींगरा ने उसकी हत्या की सुनियोजित योजना बनाई. एक मिशन के तहत 1 जुलाई 1908 को बड़े कूटनीति तरीके से वह इंडियन नेशनल एसोसिएशन (INA) का हिस्सा बने. उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से दर्शाया कि उन्हें सावरकर एवं क्रांतिकारियों की गतिविधियां पसंद नहीं हैं. आईएनए के माध्यम से उन्हें कई विशिष्ठ व्यक्तियों से मिलने का अवसर मिला. उन्होंने INA की सचिव मिस एम्मा जोसेफ बेक का विश्वास हासिल किया. यहीं पर उन्होंने कर्जन वायली की हत्या की व्यूह रची. 1 जुलाई 1909 को इण्डियन नेशनल ऐसोसिएशन के वार्षिकोत्सव में भाग लेने के लिए भारी संख्या में भारतीय और अंग्रेज़ अधिकारी उपस्थित थे. जैसे ही विलियम हट कर्जन वायली पत्नी के साथ हाल में पहुंचे, मदनलाल धींगड़ा ने उनके चेहरे पर पांच गोलियां दाग दी. इसके बाद ज्यों ही उन्होंने खुद को गोली मारनी चाही, वहां मौजूद ब्रिटिश सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें पकड़ लिया. बाद में उनके पिता ने उनसे नाता तोड़ लिया क्योंकि ढींगरा ने उनके दोस्त की हत्या की थी.
मुस्कुराते हुए फांसी का फंदा गले में डाल लिया!
23 जुलाई 1909 को उन्हें ओल्ड बेली कोर्ट (लंदन) में पेश किया गया. उन्होंने जज को बेखौफ बताया कि हां कर्जन वायली को उन्होंने ही गोली मारी थी. जज ने उन्हें मृत्यु की सजा सुनाई. कहते हैं कि 17 अगस्त को लंदन की पेंटविले जेल में जब उन्हें फांसी स्थल पर लाया गया तो उन्होंने मुस्कुराते हुए स्वयं ही फांसी का गले में डाल लिया. यह देख वहां पर उपस्थित जल्लाद और जज भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहे.
(The above story first appeared on LatestLY on Aug 17, 2022 12:11 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

