World Puppetery Day 2022: क्या भारत की यह प्राचीनतम कला खात्मे की कगार पर है? जानें इस अनुपम कला के संदर्भ में रोचक बातें!
कठपुतली

World Puppetery Day 2022: रंगमंच पर खेले जाने वाले प्राचीनतम खेलों में एक है कठपुतली. आज जब युवा ही नहीं अधिकांश लोग अपना ज्यादा समय मोबाइल गेमों एवं दूसरे मनोरंजनो में व्यस्त हैं, कठपुतली की कला खत्म होने की कगार पर दिख रही है. गाहे-बगाहे कुछेक समारोहों में आयोजित कठपुतली के खेलों को अपवाद मान लें तो कहा जा सकता है कि कठपुतली की कला-संस्कृति के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है, क्योंकि अब तो यदा-कदा बड़े-बुजुर्गों से ही इस कला के किस्से सुनने को मिलते हैं. यह भी पढ़ें: Rang Panchami 2022: क्यों और कैसे मनाते हैं रंगपंचमी? जानें रंगपंचमी के संदर्भ में दो आध्यात्मिक कथाएं!

प्रत्येक वर्ष 21 मार्च को विश्व कठपुतली दिवस मनाया जाता है, हम यह जानकर गर्वित होते हैं कि दुनिया भर में अपने मनोरंजन का डंका पीटने वाली काठ की पुतलियां कभी हमारी भारतीय संस्कृति का एक अहम हिस्सा रही हैं, जो शनै-शनै भूली-बिसरी यादों में सिमटती जा रही हैं. यह देखकर दुःख होता है कि हमारी इस कला को जिस तरह से सात समंदर पार अमेरिका, रूस, चीन, जापान, इंडोनेशिया, म्यांमार, थाइलैंड और श्रीलंका के दर्शकों ने सर आंखों पर लिया, उसकी रक्षा उसके अस्तित्व को हम अपने हाथों गंवा रहे हैं. आज पूरा विश्व अंतर्राष्ट्रीय कठपुतली दिवस मना रहा है, आइये जानें, कठपुतली का पौराणिक संबंध तथा कैसे शुरु हुआ मनोरंजन का यह सस्ता और सुगम खेल?

कठपुतली शब्द संस्कृत के पुत्तलिका या पुत्तिका तथा लैटिन के प्यूपा से मिलकर बना है, इसका शाब्दिक अर्थ है छोटी गुड़िया. ईसा से पूर्व चौथी शताब्दी में महाकवि पाणिनी के अष्टाध्यायी ग्रंथ पुतला नाटक का उल्लेख मिलता है. उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के सिंहासन में 32 पुतलियों का उल्लेख सिंहासन बत्तीसी में मिलता है. शुरु में इसका इस्तेमाल राजा-महाराजाओं की कथाओं, धार्मिक व्याख्यानों में राजनैतिक व्यंग्यों को प्रस्तुत करने के लिए किया जाता था.

कैसे हुई विश्व कठपुतली दिवस की शुरुआत

कठपुतली वस्तुतः लकड़ी की गुड़िया (wooden doll) के नाम से विश्व भर में प्रसिद्ध है. साल 2001 में ईरान के कठपुतली प्रस्तुतकर्ता जावेद जोलपाधरी के मन में विश्व कठपुतली दिवस मनाने का ख्याल आया, ताकि तेजी से विलुप्त होती इस अनोखे कला को जीवित रखा जा सके. कुछ लोगों की सहमति एवं प्रेरणा से यूनिमा के 2002 में जावेद ने अपना विचार रखा, जिसे तुरंत स्वीकृति मिल गयी, इसके बाद 2003 से नियमित रूप से 21 मार्च के दिन विश्व कठपुतली दिवस मनाया जा रहा है.

पौराणिक संदर्भ में कठपुतली-कथा

एक किवदंती के अनुसार, सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने सृष्टि के निर्माण के दौरान अपनी पत्नी सरस्वती के मनोरंजन के लिए एक काठ की पुतली का निर्माण किया, लेकिन दोनों ही इस रचना से संतुष्ट नहीं हुए. ब्रह्मा ने नट-भट्ट नामक निर्मित कठपुतली को पृथ्वी पर भेज दिया. कहा जाता है कि यह कथा संभवतः राजस्थानी परंपरा पर लागू होती है, नट भट्ट इस क्षेत्र की कठपुतली का बहुत लोकप्रिय नाम है.

धरोहर राजस्थान की

कठपुतली मूलतः राजस्थान की कला-संस्कृति का हिस्सा मानी जाती है. राजस्थानी पोशाक पहने इन कठपुतलियों द्वारा इतिहास के विभिन्न प्रसंगों, जिसमें प्रेम प्रसंग प्रमुख होते थे, मसलन हीर-रांझा, लैला-मंजनू एवं शीरी फरहाद की प्रेम कथाएं दर्शकों को बहुत रास आती थी. इसके अलावा राजा-रानी, सेठ-सेठानी, जमींदार-किसान और मसखरों के किरदार भी खूब लोकप्रिय हुए. लेकिन जो किरदार सबसे ज्यादा पापुलर हुआ, वह थे राजस्थान के अमर सिंह राठौड़, क्योंकि उनके चरित्र में नृत्य-गीत, युद्ध एवं शौर्य गाथाएं जैसी तमाम बातें शामिल थीं. राजस्थान में आज भी सैकड़ों परिवार के रोजगार का साधन कठपुतली ही है. राजस्थान में इस कला के महत्व का अहसास इसी से किया जा सकता है कि आज भी जयपुर में एक मोहल्ले का नाम ही कठपुतली नगर है. भारत के इस सबसे सस्ते मनोरंजक खेल को जब रूस, चीन, जापान, अमेरिका एवं थाईलैंड के दर्शकों का भी खूब मनोरंजन किया. कठपुतली की बढ़ती लोकप्रियता के चलते कालांतर में यह उड़ीसा के साखी-कुंदेई, असम का पुतला नाच, महाराष्ट्र का मालासूत्री बहुली, कर्नाटक की गोंबेयेट्टा, केरल के तोलपवकुथू, आंध्र प्रदेश के थोलू बोमलता के नामों से भी कठपुतली संस्कृति को बढ़ावा मिला.

क्या खत्म हो जायेगी कठपुतली की सांस्कृतिक विरासत

कठपुतली का खेल दिखाना आसान नहीं होता है. क्योंकि इसमें एक या दो व्यक्ति को पर्दे के पीछे से गायन, संवाद अदायगी के साथ उंगलियों का कौशल भी पल-पल बदलते घटनाक्रमों के अनुरूप दिखाना पड़ता है. कठपुतली के खेल में लेखन, नाट्य, चित्रकला, मूर्तिकला, काष्टकला एवं वस्त्र निर्माण आदि तमाम कलाओं का मिश्रण होता है. लेकिन मानव निर्मित कठपुतलियों की यह कला आज संकट के दौर से गुजर रही हैं. कल तक जो कठपुतलियां हमारी संस्कृति का प्रतिबिंब मानी जाती थीं, हमारे सस्ते मगर उद्देश्यपरक मनोरंजन का साधन हुआ करती थीं, आज तकनीकी विकास दौर में विलुप्त होने की कगार पर है. कठपुतली कलाकार अपना पुश्तैनी धंधा छोड़कर अन्य कामकाज में व्यस्त होने लगे हैं, आखिर उन्हें भी अपना परिवार चलाना है.