Lal Bahadur Shastri Jayanti 2025: ऐसा प्रधानमंत्री जिसके पास निजी कार नहीं थी जानें लाल बहादुर शास्त्री के जीवन के कुछ फैक्ट!

आजाद भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने बतौर प्रधानमंत्री लगभग 18 माह कार्य किया, इस छोटे से कार्यकाल में उन्होंने साल 1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध पर जिस कुशलता से नियंत्रित किया और पाकिस्तान को बुरी तरह हराया, और देश-दुनिया पर अपनी अमिट छाप छोड़ी. लाल बहादुर शास्त्री 1920 में भारत की आजादी की लड़ाई में शामिल हुए. उन्होंने ‘असहयोग आंदोलन’ (1921), ‘दांडी मार्च’ (1930), ‘भारत छोड़ो’ (1942) जैसे तमाम आंदोलनों में शिरकत किया और कई बार जेल गए.

  आजाद भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने बतौर प्रधानमंत्री लगभग 18 माह कार्य किया, इस छोटे से कार्यकाल में उन्होंने साल 1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध पर जिस कुशलता से नियंत्रित किया और पाकिस्तान को बुरी तरह हराया, और देश-दुनिया पर अपनी अमिट छाप छोड़ी. लाल बहादुर शास्त्री 1920 में भारत की आजादी की लड़ाई में शामिल हुए. उन्होंने असहयोग आंदोलन (1921), दांडी मार्च (1930), भारत छोड़ो (1942) जैसे तमाम आंदोलनों में शिरकत किया और कई बार जेल गए. जय जवान जय किसान का नारा बुलंद करने वाले और अमेरिका जैसे देश को गेहूं आयात नीति पर दो टूक जवाब देनेवाले लाल बहादुर शास्त्री ने थोड़े समय में जता दिया कि उनका कद छोटा जरूर था, मगर देश के प्रति उनके विचार आसमान छूने वाले थे. शास्त्री जी की जयंती (2 अक्टूबर) के अवसर पर आइये जानते हैं उनके जीवन के कुछ अनछुए एवं रोचक प्रसंग के बारे में...

बालपन से संघर्ष

  तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्म अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय (आज पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर) में हुआ था. जब वे डेढ़ वर्ष के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया था. लाल बहादुर शास्त्री जी को उच्च शिक्षा के लिए उनके चाचा के साथ रहने भेज दिया गया. सर्दी हो या गर्मी वह कई मील नंगे पांव चलकर स्कूल जाते थे. यह भी पढ़ें : Gandhi Jayanti 2025 Wishes: गांधी जयंती के इन हिंदी WhatsApp Messages, Facebook Greetings, Quotes के जरिए दें प्रियजनों को शुभकामनाएं

शास्त्री सरनेम नहीं उपाधि थी

   बहुतायत लोग विशेषकर आज पीढ़ी समझती है कि लाल बहादुर शास्त्री का सरनेम शास्त्री है, जबकि शास्त्री उनका सरनेम नहीं, बल्कि एक उपाधि थी, जो उन्हें काशी विद्यापीठ से स्नातक परीक्षा पास करने के बाद प्राप्त हुई थी. यहां शास्त्री का आशय विद्वान से हैऔर यह उन्हें उनकी विद्वता को दर्शाने वाला सम्मान था. जहां तक उनके नाम की बात है तो उनका पूरा नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था.

पीएम बनने के बाद भी निजी कार नहीं थी

प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनका रहन-सहन एक आम आदमी जैसा था. उनके पास निजी संपत्ति लगभग नहीं के बराबर थी. कहा जाता है कि उनके पास अपनी खुद की कार तक नहीं थी. प्रधानमंत्री बनने के बावजूद वह सरकारी गाड़ी का उपयोग निजी कार्य के लिए नहीं करते थे.

स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा विदेशी का परित्याग

महात्मा गांधी से प्रभावित होकर लाल बहादुर शास्त्री शुरू से ही विदेशी वस्त्रों से दूरी बनाकर रहते थे. वह ताउम्र खादी वस्त्र का इस्तेमाल करते थे, इसे उन्होंने अपने रुटीनी व्यवहार में शामिल कर लिया था.

'जय जवानजय किसानकेवल नारा नहींक्रांति था

साल 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध और देश में पड़े सूखे के दौरान लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान का नारा बुलंद किया था, ताकि सैनिकों का मनोबल बढ़े, साथ ही किसानों को खाद्यान्न आत्मनिर्भरता की ओर ले जाने के लिए प्रोत्साहित किया. उन्होंने सप्ताह में एक दिन उपवास रखने की सलाह देते हुए खुद से इसकी शुरुआत की. इस नारे से देशवासियों में देशभक्ति और एकजुटता की भावना जागृत हुई. 

पीएम का अंतिम संस्कार और धनाभाव

  ताशकंद (उज़्बेकिस्तान) में जब लाल बहादुर शास्त्री का निधन हुआतो उनके परिवार के पास इतनी संपत्ति नहीं थी कि अंतिम संस्कार की व्यवस्था कर सकें. शास्त्री जी के नाम पर कोई बड़ा बैंक खाताजायदाद या संपत्ति नहीं मिली. सिर्फ कुछ पुस्तकें इत्यादि.

आज भी रहस्यमय है शास्त्री जी की मृत्यु

  पाकिस्तान के साथ युद्ध के बाद जब लाल बहादुर शास्त्री ने ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर किए. उसी रात (11 जनवरी 1966) उनका रहस्यमय तरीके से निधन हो गया. उनकी मृत्यु आज भी रहस्य बनी हुई है, हालांकि उनकी मृत्यु की जांच की मांग बार-बार उठती रही है.

नैतिकता की मिसाल

साल 1956 में हुई अरियालुर रेल दुर्घटना में काफी लोग हताहत हुए. उन्होंने बिना किसी दबाव के केंद्रीय रेल मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. यह आज भी भारतीय राजनीति में नैतिकता की मिसाल मानी जाती है.

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