Revolution in Cancer Treatment: कैंसर के इलाज में एक नई क्रांति का आगाज हो चुका है. फ्लैश रेडियोथेरेपी नामक इस अत्याधुनिक तकनीक के माध्यम से अब सिर्फ एक सेकंड के अंदर रेडिएशन दिया जा सकता है. यह नई पद्धति न केवल इलाज को तेज बनाएगी, बल्कि इसे अधिक सुरक्षित और प्रभावी भी बनाएगी. पारंपरिक रेडियोथेरेपी में ट्यूमर पर रेडिएशन कई मिनटों और कई सत्रों तक दिया जाता है. हालांकि यह तकनीक प्रभावी है, लेकिन इससे स्वस्थ ऊतकों (टिशू) को भी नुकसान पहुंच सकता है. खासतौर पर जब कैंसर शरीर के संवेदनशील हिस्सों जैसे दिमाग में हो.
फ्लैश रेडियोथेरेपी इस समस्या का समाधान लेकर आई है. यह तकनीक "मिलीसेकंड्स" में अल्ट्रा-हाई डोज़ रेडिएशन देती है. इसकी खोज मैरी-कैथरीन वोसेनिन ने 2010 के दशक की शुरुआत में की थी.
मानव परीक्षणों में उम्मीद जगी
जानवरों पर किए गए परीक्षणों में इस तकनीक ने न केवल कैंसर को खत्म किया, बल्कि इससे जुड़े हानिकारक साइड इफेक्ट्स, जैसे अंगों की कार्यक्षमता में गिरावट या बच्चों में विकास संबंधी समस्याएं, को भी कम कर दिया. इस नई तकनीक का उपयोग अब मानव परीक्षणों में किया जा रहा है. यह मेटास्टेटिक कैंसर और जटिल ट्यूमर जैसे ग्लायोब्लास्टोमा और हेड-एंड-नेक कैंसर के इलाज में कारगर साबित हो रही है. ये ऐसे कैंसर हैं जिनके इलाज के विकल्प सीमित हैं और जो स्वस्थ ऊतकों को नुकसान पहुंचाने का बड़ा जोखिम रखते हैं.
प्रोटॉन थेरेपी बनी प्रमुख
इन परीक्षणों के दौरान प्रोटॉन थेरेपी को खासतौर पर कारगर पाया गया है. प्रोटॉन शरीर के अंदर गहराई तक असर करते हैं, जिससे यह आंतरिक अंगों के कैंसर के इलाज के लिए उपयुक्त है. वैज्ञानिक इलेक्ट्रॉन्स और कार्बन आयन जैसी वैकल्पिक पद्धतियों पर भी शोध कर रहे हैं.
चुनौतियां और भविष्य की संभावनाएं
फ्लैश रेडियोथेरेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसकी पहुंच है. इस तकनीक के लिए उन्नत पार्टिकल एक्सेलेरेटर्स की आवश्यकता होती है, जो महंगे और बड़े होते हैं. फिलहाल पूरी दुनिया में सिर्फ 14 ऐसी सुविधाएं हैं. अगर छोटे और सस्ते एक्सेलेरेटर्स का विकास हो सके, तो यह तकनीक कैंसर के कई प्रकारों का इलाज करने का सबसे बेहतरीन तरीका बन सकती है.
फ्लैश रेडियोथेरेपी से कैंसर के इलाज का भविष्य उज्जवल नजर आ रहा है, लेकिन इसके व्यापक उपयोग के लिए तकनीकी और आर्थिक बाधाओं को दूर करना अनिवार्य होगा.













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