Sangli: महाराष्ट्र का सांगली जिला, जहां देश की लगभग 75 फ़ीसदी किशमिश का होता है उत्पादन
महाराष्ट्र का सांगली जिला भारत की 'किशमिश राजधानी' (Raisin Capital) के रूप में जाना जाता है, जहां देश के कुल उत्पादन का लगभग 75% किशमिश तैयार होता है. भौगोलिक विशेषताओं और जीआई (GI) टैग के कारण यहां के बेदाने अपनी खास मिठास और गुणवत्ता के लिए दुनिया भर में मशहूर हैं.
सांगली को क्यों कहते हैं 'किशमिश राजधानी'?
भारत के कुल किशमिश उत्पादन में 75 फीसदी से अधिक की हिस्सेदारी अकेले सांगली जिले की है. यहां का तासगांव (Tasgaon) और मीरज (Miraj) क्षेत्र इस उद्योग के मुख्य केंद्र हैं. सांगली में तैयार होने वाली किशमिश न केवल देश के विभिन्न राज्यों में सप्लाई की जाती है, बल्कि इसका एक बड़ा हिस्सा विदेशों में भी निर्यात (Export) होता है. PM Kisan 23rd Installment: पीएम किसान योजना की 23वीं किस्त पर बड़ा अपडेट, जानें कब तक आपके खाते में आएंगे 2000 रुपये और कैसे करें बैलेंस चेक
भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल होने के कारण इस क्षेत्र को वर्ष 2016 में 'सांगली किशमिश' (Sangli Raisins) के लिए भारत सरकार द्वारा भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग (GI Tag) भी दिया गया है.
कैसे तय होती है किशमिश की वैरायटी?
बाजार में मिलने वाली किशमिश मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है, जो अंगूर की किस्म और प्रोसेसिंग के तरीके पर निर्भर करती है:
बेदाना किशमिश: यह बिना बीज वाले (Seedless) अंगूरों से तैयार की जाती है. इसका आकार एकसमान होता है और यह पूरी तरह से बीज रहित होती है. बाजार में इस किस्म की मांग और कीमत सबसे अधिक रहती है.
मुनक्का: जिन अंगूरों में बीज होते हैं, उन्हें सुखाकर मुनक्का तैयार किया जाता है. आकार में यह सामान्य किशमिश से बड़ा और रंग में थोड़ा गहरा होता है. आयुर्वेद और औषधीय रूप से इसे बहुत गुणकारी माना जाता है.
सांगली में मुख्य रूप से थॉमसन सीडलेस, सोनाका, माणिकचमन और तास-ए-गणेश जैसी उन्नत अंगूर की किस्मों का उपयोग करके उच्च गुणवत्ता वाली किशमिश बनाई जाती है.
अन्य राज्यों में भी होता है उत्पादन
हालांकि महाराष्ट्र उत्पादन के मामले में सबसे शीर्ष पर है, लेकिन देश के कुछ अन्य राज्यों में भी सीमित मात्रा में किशमिश तैयार की जाती है. उत्तर और दक्षिण भारत के कुछ चुनिंदा हिस्सों जैसे पंजाब, कर्नाटक और राजस्थान में अंगूर की खेती और किशमिश बनाने का काम होता है. राजस्थान के बीकानेर क्षेत्र में भी स्थानीय स्तर पर किशमिश का उत्पादन किया जाता है, जो क्षेत्रीय बाजारों की आपूर्ति करता है.
प्राकृतिक पद्धति से तैयार होती है फसल
सांगली की मिट्टी में पोटाश और फॉस्फेट की प्रचुरता है, और यहां कृष्णा व वारणा नदियों का पानी उपलब्ध है. इसके अलावा यहां की कम आर्द्रता (Low Humidity) और गर्म मौसम अंगूरों को स्वाभाविक रूप से सुखाने के लिए एकदम अनुकूल हैं.
यहां के किसान अंगूरों को सीधे धूप में सुखाने के बजाय विशेष रूप से बनाए गए शेड (Drying Sheds) के अंदर हवा में सुखाते हैं. इस पारंपरिक और वैज्ञानिक पद्धति के कारण सांगली की किशमिश का प्राकृतिक रंग (हरा और सुनहरा), स्वाद और कोमलता लंबे समय तक बरकरार रहती है. यही वजह है कि सांगली के बेदाने अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए हैं.