Bottled Water Prices: पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में आई भारी तेजी अब आम उपभोक्ता वस्तुओं को प्रभावित करने लगी है. ताजा रिपोर्टों के अनुसार, बोतलबंद पानी और अन्य पेय पदार्थों की कीमतें आने वाले हफ्तों में बढ़ सकती हैं. उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि तेल की कीमतों में वृद्धि से पैकेजिंग और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ गई है, जिसे कंपनियां अब ग्राहकों पर डालने की तैयारी कर रही हैं.
कच्चे तेल और प्लास्टिक का सीधा संबंध
बोतलबंद पानी की लागत का एक बड़ा हिस्सा इसकी पैकेजिंग, यानी प्लास्टिक की बोतल पर निर्भर करता है. प्लास्टिक बनाने के लिए उपयोग किए जाने वाले प्रमुख कच्चे माल जैसे 'पॉलीइथाइलीन टेरेफ्थेलेट' (PET) और 'एथिलीन', सीधे तौर पर पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस से प्राप्त होते हैं. कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का मतलब है कि इन रसायनों की उत्पादन लागत में भी इजाफा होगा. यह भी पढ़े: Mumbai LPG Cylinder Theft: एलपीजी संकट के बीच मुंबई के कांदिवली में गैस डिलीवरी वैन से 27 सिलेंडर चोरी, धरपकड़ के लिए CCTV खंगालने में जुटी पुलिस
विशेषज्ञों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में हालिया उछाल के बाद प्लास्टिक इनपुट की लागत में 70 प्रतिशत और बोतल रेजिन की कीमतों में 30 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी गई है.
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर गहरा असर
हाल के सैन्य घटनाक्रमों और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तेल की आपूर्ति बाधित होने से ब्रेंट क्रूड की कीमतों में कुछ ही हफ्तों में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है. यह मार्ग वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा संभालता है.
सप्लाई चेन विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर कच्चा तेल 125 से 150 डॉलर प्रति बैरल के बीच रहता है, तो मई तक बोतलबंद पेय पदार्थों की कीमतों में 10 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है. सबसे खराब स्थिति में, यदि तेल 200 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचता है, तो वैश्विक स्तर पर कीमतों में 25 से 30 प्रतिशत का उछाल आ सकता है.
भारत में दिखने लगे शुरुआती लक्षण
भारत में पैकेजिंग और परिवहन लागत बढ़ने के कारण बोतलबंद पानी की कीमतों में पहले ही लगभग 11 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है. कुछ क्षेत्रों में रिटेल कीमतें 20 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई हैं. फरवरी के अंत से ही प्लास्टिक और अन्य इनपुट लागतों में निरंतर बढ़ोतरी हो रही है, जिससे निर्माता दबाव में हैं.
ऐतिहासिक संदर्भ और भविष्य की चेतावनी
विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति 2022 के रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद के ऊर्जा संकट जैसी हो सकती है. ऐतिहासिक रूप से देखा गया है कि ऊर्जा संकट के लगभग तीन महीने बाद प्लास्टिक पैकेजिंग की कीमतों में सबसे अधिक वृद्धि होती है. हालांकि, अमेरिका जैसे देश जो पेट्रोलियम उत्पादों का घरेलू उत्पादन करते हैं, वहां इसका असर आयात पर निर्भर देशों की तुलना में कम हो सकता है.
फिलहाल, पश्चिम एशिया के हालातों पर पूरी दुनिया की नजर है, क्योंकि वहां का तनाव तय करेगा कि आपकी जेब पर महंगाई का बोझ कितना बढ़ेगा.












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