महिला आरक्षण पर चर्चा के समय ध्यान रखनी चाहिए ये बातें
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

भारत सरकार ने लोकसभा में महिलाओं को मिले आरक्षण को जमीन पर उतारने के लिए 16, 17 और 18 अप्रैल को संसद का विशेष सत्र बुलाया है. इस दौरान केंद्र सरकार कुल तीन बिल पेश करेगी.महिला आरक्षण को लागू करने के लिए संसद में बहस होनी है. उम्मीद की जा रही है कि इसके साथ ही संसद में तीन दशकों से लंबित महिलाओं के आरक्षण का सवाल निर्णायक मोड़ पर पहुंच जाएगा. सरकार लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दे चुकी है. इसे जमीन पर उतारने के लिए 16, 17 और 18 अप्रैल को संसद का विशेष सत्र बुलाया गया है. इन तीन दिनों के दौरान केंद्र सरकार तीन बिल पेश करेगी. इसमें परिसीमन, संविधान संशोधन और केंद्र शासित राज्यों के कानून संशोधन शामिल हैं. चर्चा के लिए लोकसभा में 18 घंटे और राज्यसभा में 10 घंटे का समय रखा गया है.

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साल 2023 में ही 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' दोनों सदनों में पारित हो चुका है. इसके तहत लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं की 33 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी गई थीं. हालांकि इसे तुरंत लागू नहीं किया गया था. इसे नई जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के बाद लागू करने का प्रस्ताव था. अगर ये तीनों विधेयक पास हो जाते हैं, तो 2029 के आम चुनावों में 33 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी.

परिसीमन का विरोध क्यों कर रहे दक्षिण के राज्य

विपक्षी दल इन तीनों विधेयकों की आलोचना कर रहे हैं. केंद्र सरकार लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर 816 करना चाहती है. यानी नई लोकसभा में करीब 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. दक्षिणी राज्यों जैसे तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक ने जनसंख्या नियंत्रण नीतियों को काफी हद तक सफलतापूर्वक लागू किया है. ऐसे में अगर परिसीमन पिछली यानी 2011 की जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो इन राज्यों की लोकसभा सीटें कम हो जाएंगी.

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने चेतावनी दी, "अगर राज्यों का लोकसभा में प्रतिनिधित्व कम होता है तो उन्हें केंद्र से मिलने वाला फंड कम हो सकता है. इससे महिला सशक्तिकरण पर असर पड़ेगा, छात्रों के लिए अवसर कम होंगे और किसानों को भी नुकसान होगा."

यह भी समझना जरूरी है कि राजनीतिक दल इन तीन दिनों की चर्चा से क्या चाहते हैं और उनकी क्या अपेक्षाएं हैं.

ओबीसी महिलाओं को भी मिले हिस्सेदारी

उत्तर प्रदेश के कैराना से समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा चौधरी ने बताया कि उनकी पार्टी ने अपने चुनाव अभियानों में पहले ही आशा वर्कर्स, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, स्वयं सहायता समूहों और विश्वविद्यालयों की महिलाओं को जोड़ना शुरू कर दिया है.

इकरा चौधरी कहती हैं कि पार्टी का रुख बिल के समर्थन में है. लेकिन चिंता इसके लागू करने के तरीके को लेकर है. इकरा के मुताबिक, "सरकार एक तीर से कई निशाने लगाना चाहती है. अगर मंशा ठीक होती, तो वह जनगणना और परिसीमन से जोड़ने की शर्त शामिल किए बिना अगले विधानसभा चुनाव से ही इस आरक्षण को लागू करते. महिला आरक्षण के साथ अन्य मुद्दे जोड़कर सरकार राजनीतिक लाभ उठाना चाहती है."

इकरा ने बताया कि बिलों पर चर्चा के दौरान सपा के एजेंडा में दो प्रमुख बातें रहेंगी. पहली, एससी और एसटी के साथ-साथ ओबीसी महिलाओं के लिए भी आरक्षण का विस्तार किया जाए. दूसरी, इस आरक्षण को राज्यसभा के लिए भी लागू किया जाए. इसके लिए पार्टी के कुछ नेताओं ने पहले सरकार से मुलाकात भी की थी. सरकार ने उनसे कहा कि जब ओबीसी आरक्षण पूरे लोकसभा में आएगा, तभी यह महिला आरक्षण पर भी लागू किया जाएगा.

इस पर इकरा कहती हैं, "अगर ओबीसी आरक्षण एक अलग विषय है, तो फिर जनगणना और परिसीमन भी अलग मुद्दे हैं. असल में ये दोनों महिला आरक्षण से सीधे तौर पर नहीं जुड़े हैं.”

पार्टी के अंदर भी अहम हों महिलाएं

महिला आरक्षण बिल को लागू करने के प्रयास 1996 से कई बार हुए हैं. पहली बार यह 2010 में राज्यसभा में पारित हुआ था. लेकिन आगे नहीं बढ़ सका. साल 2023 में संविधान संशोधन (128वां) विधेयक लाया गया. इसे दोनों सदनों ने पास किया.

कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौतम सेठ ने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार परिसीमन के जरिए उत्तर और दक्षिण भारत के बीच विभाजन पैदा करने की कोशिश कर रही है. वह कहते हैं, "जिन विधेयकों पर चर्चा होनी है, उसका ड्राफ्ट अभी तक हमारे पास नहीं आया है." उन्होंने सोनिया गांधी समेत कांग्रेस में कई प्रमुख महिला नेता होने की मिसाल दी और बीजेपी पर आरोप लगाया कि अगर पार्टी की नीयत सही होती तो पहले वे पार्टी के अंदर प्रमुख पदों पर महिलाओं को वरीयता देते.

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भारतीय जनता पार्टी की सांसद कमलजीत सेहरावत ने डीडब्ल्यू से कहा, "सरकार इसे आखिरकार लागू करने के लिए एक कानूनी प्रक्रिया शुरू कर रही है. यह पार्टी के भीतर भी विविधता को बढ़ावा देने में मदद करेगा."

कमलजीत सेहरावत बीजेपी के अंदर आए परिवर्तनों की जानकारी देती हैं, "राज्यसभा में विधेयक पास होने के दिन ही पार्टी ने अपने संगठन में 33 प्रतिशत पद महिलाओं के लिए आरक्षित करने का फैसला किया था. पिछले लोकसभा चुनावों में भी पार्टी की नीतियों के कारण ही मैं और बांसुरी स्वराज दिल्ली से चुनाव लड़ सके और जीत हासिल की."

आरक्षण को लागू करने का संघर्ष कम नहीं

नाम ना बताने की शर्त पर एक राष्ट्रीय पार्टी के पुरुष कार्यकर्ता ने डीडब्ल्यू से कहा कि उन्हें चिंता है कि इस फैसले से पार्टी मजबूत सीटें खो सकती है. उनका कहना है कि पार्टियां आमतौर पर जीतने की संभावना के आधार पर टिकट देती है. वे अपने सर्वे करती हैं. यह फैसला लिंग के आधार पर नहीं लिया जाता. वह मानते हैं, "जो उम्मीदवार प्रभावशाली और जनता में पकड़ रखता हो, उसे चुनाव लड़ाना चाहिए. आरक्षण लागू होने से पार्टियां आरक्षित सीटों के अलावा अनारक्षित सीटों पर महिलाओं को टिकट देना कम कर सकती हैं."

ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक से जुडी डॉ. आरती साल 2024 में लखनऊ से चुनाव लड़ी थीं. उनका मानना है कि भारत शुरुआत से ही इस मामले में प्रगतिशील रहा है. आजादी के बाद से ही यहां सभी महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला. जबकि कई देशों में इसके लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा. उनका मानना है कि महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए सिर्फ राजनीतिक प्रतिनिधित्व ही नहीं, बल्कि आर्थिक सहयोग भी जरूरी है.

डॉ. आरती सुझाव देती हैं, "भारत में चुनाव लड़ना महंगा है. लोकसभा चुनाव में केवल जमानत राशि ही 25,000 रूपए है. फिर राजनीति महिलाओं के लिए कई बार असमान और असुरक्षित भी होती है. अगर ज्यादा महिलाएं होंगी, तो पुरुष नेताओं का व्यवहार अधिक जिम्मेदार होगा. महिलाओं को संसद और पार्टी दोनों जगह गंभीरता से लिया जाएगा."

महिला आरक्षण पर लंबे समय से चली आ रही चर्चा के बावजूद अब भी अधिकांश राजनीतिक दल चुनाव में महिलाओं को पर्याप्त सीटें नहीं देते. अभी लोकसभा में 14 प्रतिशत और राज्यसभा में 15 प्रतिशत महिला सांसद हैं. डॉ. आरती उदाहरण देकर समझाती हैं, "कांशीराम ने मायावती को आगे बढ़ाया. लेकिन उसके बाद पार्टी में दूसरी महिला नेताओं का उतना विकास नहीं हुआ. एक बार महिला आरक्षण आ गया तब यह सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा. इससे अन्य क्षेत्रों में भी समान प्रतिनिधित्व और अवसरों का रास्ता खुलेगा."

आरक्षण बिना देरी के लागू हो

इंडियन स्कूल ऑफ डेमोक्रेसी के को-फाउंडर प्रखर भारतीय समाजवादी पार्टी के रुख पर कहते हैं कि ओबीसी आरक्षण की मांग को, महिला आरक्षण के साथ जोड़ना इसके मूल उद्देश्य को कमजोर कर सकता है. सभी पार्टियों को बिना किसी शर्त के इसके लागू होने पर जोर देना चाहिए. दक्षिणी राज्यों की चिंताएं जरूर वास्तविक हैं. पर इन मुद्दों पर अलग से चर्चा हो.

प्रखर डीडब्ल्यू से कहते हैं, "सत्ता में बैठे पुरुष अपनी राजनीतिक शक्ति कभी कम नहीं करना चाहेंगे. महिला आरक्षण लागू होने से पुरुषों की राजनीतिक हिस्सेदारी लगभग 19 प्रतिशत तक घट सकती है. इसे जानबूझकर अन्य मुद्दों से जोड़ दिया गया है ताकि इसके क्रियान्वयन में देरी हो सके."

एक महत्वपूर्ण पहल यह हो सकती है कि पार्टियों के भीतर ही आरक्षण सुनिश्चित किया जाए. इंडियन स्कूल ऑफ डेमोक्रेसी के एक अध्ययन के मुताबिक महिलाओं को पार्टियों के मुख्य संगठनों में 5 प्रतिशत से भी कम पद दिए जाते हैं. उन्हें ज्यादातर केवल महिला या अल्पसंख्यक मोर्चों तक सीमित रखा जाता है. मुख्य निर्णय लेने वाली इकाइयों में उनकी भागीदारी बहुत कम है.

प्रखर कहते हैं, "आज की स्थिति में महिलाओं को अक्सर केवल लाभार्थी के रूप में देखा जाता है. ना कि नेता के रूप में. वर्तमान में कुछ ही पार्टियां, जैसे तृणमूल कांग्रेस और बीजू जनता दल, ऐसी हैं जो महिलाओं को लगभग संख्या में पुरुषों के बराबर टिकट देने की कोशिश करती हैं. आरक्षण लागू होने के बाद भी यह आशंका रहती है कि प्रधानपति जैसी स्थिति बने, जहां महिलाओं के नाम पर पुरुष ही फैसले लेते रहें.”

हालांकि जानकार ये भी कहते हैं कि ऐसी समस्या अक्सर शुरुआती राजनीतिक कार्यकाल में ही ज्यादा देखी जाती है. अगर महिला नेता दूसरे और तीसरे कार्यकाल तक पहुंचती है, तो वो अपने फैसले खुद लेने लगती है."