दुलारचंद यादव हत्याकांड: अनंत सिंह पर FIR दर्ज, मोकामा के 'छोटे सरकार' कैसे बनें बिहार के बाहुबली? जानें पूरी 'क्राइम कुंडली'
(Photo : X)

Anant Singh Accused in Murder of Dular Chand Yadav in Mokama: बिहार और चुनावी हिंसा का चोली-दामन का साथ रहा है. दशकों से यहां की सियासत ने गोलियों की गूंज और बारूद की गंध के बीच ही अपना रास्ता बनाया है. साल 2025 के विधानसभा चुनाव भी इससे अछूते नहीं रहे हैं. 30 अक्टूबर की तारीख ने इस खूनी खेल की सबसे वीभत्स तस्वीर पेश की, जब पटना जिले के मोकामा में 'जनसुराज' के एक प्रमुख समर्थक दुलार चंद यादव की दिनदहाड़े, बेरहमी से हत्या कर दी गई.

यह कोई आम हत्या नहीं थी. यह एक संदेश था. दुलार चंद यादव को पहले पैर में गोली मारी गई, ताकि वह भाग न सकें. फिर, जब वह जमीन पर गिर पड़े, तो उन्हें एक गाड़ी से बार-बार रौंदकर कुचल दिया गया. यह तरीका सिर्फ मौत देना नहीं, बल्कि एक इलाके पर, एक समुदाय पर और एक राजनीतिक विचारधारा पर अपना खौफ कायम करने का ऐलान था.

इस बर्बर हत्याकांड का आरोप किसी और पर नहीं, बल्कि मोकामा के पर्याय बन चुके, 'छोटे सरकार' और 'मोकामा का डॉन' कहे जाने वाले बाहुबली नेता अनंत सिंह पर लगा है. दुलार चंद के परिवार ने सीधे तौर पर अनंत सिंह का नाम लिया है. पोते रविरंजन ने कांपती आवाज में मीडिया को बताया, "गोली अनंत सिंह ने खुद मारी. पैर पर गाड़ी चढ़ाई."

यह घटना सिर्फ एक कत्ल नहीं है. यह बिहार की राजनीति के उस स्याह पन्ने की वापसी है, जिसे 'सुशासन' के दौर में बंद मान लिया गया था. यह इस बात का सबूत है कि एके-47, अपहरण, फिरौती और जातीय अदावत की जमीन पर खड़ी बाहुबल की इमारत आज भी कितनी मजबूत है. दुलार चंद यादव की मौत ने एक बार फिर वही सवाल खड़ा कर दिया है जो बिहार से हर चुनाव में पूछा जाता है: क्या बाहुबली राजनीति का यह युग बिहार में कभी खत्म होगा?


कौन थे दुलार चंद यादव?

मोकामा की सियासी जमीन पर दुलार चंद यादव का नाम नया नहीं था. सच तो यह है कि वह खुद एक जमाने में इलाके में दहशत का दूसरा नाम माने जाते थे. उन पर भी कई आपराधिक मामले दर्ज थे, जैसा कि पटना जिला प्रशासन ने खुद अपने बयान में स्वीकार किया है. दुलार चंद की कहानी बिहार की राजनीति के उस जटिल ताने-बाने को दिखाती है, जहां 'अच्छा' और 'बुरा' के बीच की रेखा बहुत धुंधली है.

अतीत का साया: दुलार चंद यादव का एक लंबा आपराधिक इतिहास रहा. मोकामा और बाढ़ के इलाकों में उनकी गिनती उन लोगों में होती थी, जिनसे आम लोग खौफ खाते थे. यह वही इलाका है, जहां दशकों से जातीय वर्चस्व की लड़ाई लड़ी जाती रही है. एक तरफ भूमिहार समुदाय का दबदबा, जिसका चेहरा अनंत सिंह बने, तो दूसरी तरफ यादव और अन्य पिछड़ी जातियों की गोलबंदी. दुलार चंद इसी दूसरी धुरी के एक मजबूत, यद्यपि विवादित, स्तंभ थे.

बदलाव की राह: 'जनसुराज' का दामन लेकिन हाल के वर्षों में दुलार चंद यादव ने अपनी छवि बदलने की कोशिश शुरू कर दी थी. वह बिहार में एक नई राजनीतिक व्यवस्था का वादा कर रहे प्रशांत किशोर के 'जनसुराज' अभियान से जुड़ गए थे. वह मोकामा से जनसुराज के उम्मीदवार प्रियदर्शी पीयूष के लिए न सिर्फ समर्थन जुटा रहे थे, बल्कि उनके प्रमुख रणनीतिकार और प्रचारक भी बन गए थे.

यह कदम अपने आप में एक बड़ा सियासी मोड़ था. एक पुराना बाहुबली, जो खुद हिंसा और दबंगई की राजनीति का हिस्सा रहा हो, वह अब 'सिस्टम' बदलने की बात कर रहा था. यह 'जनसुराज' के लिए भी एक अजीब स्थिति थी, जो साफ-सुथरी राजनीति की बात करता है, लेकिन अपनी जमीन तैयार करने के लिए उसे दुलार चंद जैसे 'जमीनी' और 'मजबूत' लोगों का सहारा लेना पड़ रहा था.

टक्कर का मतलब: मोकामा में अनंत सिंह के खिलाफ चुनाव प्रचार करना हमेशा से जानलेवा रहा है. दुलार चंद का जनसुराज के मंच पर जाना, अनंत सिंह के 'इलाके' में एक नई राजनीतिक ताकत को सीधे चुनौती देना था. यह सिर्फ एक चुनावी मुकाबला नहीं था, यह मोकामा के 'डॉन' के एकाधिकार को तोड़ने की कोशिश थी. 30 अक्टूबर को बसावन चक इलाके में जब वह चुनाव प्रचार कर रहे थे, तभी उन पर हमला हुआ. यह हमला दुलार चंद पर नहीं, यह 'छोटे सरकार' के प्रभुत्व को चुनौती देने वाली हर आवाज पर हमला था.

 


कत्ल का दिन और सियासी भूचाल

30 अक्टूबर को जो हुआ, वह किसी गैंगवार फिल्म का सीन लग सकता है, लेकिन यह मोकामा की हकीकत थी. दुलार चंद यादव अपने समर्थकों के काफिले के साथ जनसुराज उम्मीदवार प्रियदर्शी पीयूष के लिए वोट मांग रहे थे. तभी हथियारों से लैस हमलावरों ने उनके काफिले को घेर लिया.

प्रत्यक्षदर्शी का दावा: दुलार चंद के पोते रविरंजन के मुताबिक, हमलावरों का नेतृत्व खुद अनंत सिंह कर रहे थे. रविरंजन ने दावा किया कि पहले दुलार चंद को रोकने के लिए उनके पैर में गोली मारी गई. जब वह गिर गए, तो हमलावरों ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं. उन पर गाड़ी चढ़ा दी गई और उन्हें तब तक रौंदा गया, जब तक उनकी जान नहीं निकल गई.

यह तरीका साफ बताता है कि हत्या का मकसद सिर्फ जान लेना नहीं, बल्कि एक उदाहरण पेश करना था. यह मोकामा की गलियों में यह संदेश देना था कि 'छोटे सरकार' से टकराने का अंजाम क्या होता है.

पुलिस का बयान और अनंत की सफाई: हत्या की खबर लगते ही पटना से लेकर दिल्ली तक की सियासत में हड़कंप मच गया. पटना (ग्रामीण) के एसपी विक्रम सिहाग ने फौरन मौके पर पहुंचकर जांच शुरू की. उन्होंने शुरुआती बयान में कहा, "हमें पता चला है कि दुलार चंद यादव को पहले पैर में गोली मारी गई, फिर गाड़ी से कुचल दिया गया. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के बाद ज्यादा जानकारी मिलेगी."

पुलिस ने परिवार की शिकायत पर अनंत सिंह और उनके समर्थकों के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास और आर्म्स एक्ट के तहत संगीन धाराओं में केस दर्ज कर लिया है.

दूसरी तरफ, खुद पर लगे आरोपों के बाद जेडीयू प्रत्याशी अनंत सिंह ने इसे एक राजनीतिक साजिश करार दिया. उन्होंने इस कत्ल का इल्जाम अपने धुर-विरोधी और आरजेडी प्रत्याशी सूरजभान सिंह पर मढ़ दिया. यह बिहार की राजनीति का एक और क्लासिक दांवपेंच है, जहां हर बाहुबली अपने अपराधों को छिपाने के लिए दूसरे बाहुबली का नाम लेता है. लेकिन दुलार चंद के परिवार के सीधे बयानों ने अनंत सिंह की मुश्किलें बढ़ा दी हैं.


कौन है 'छोटे सरकार' अनंत सिंह?

बिहार की राजनीति में बाहुबलियों का जलवा कोई नया नहीं है. शहाबुद्दीन से लेकर पप्पू यादव और सूरजभान सिंह तक, यह फेहरिस्त बहुत लंबी है. लेकिन जब बात अनंत सिंह की आती है, तो कहानी ही अलग हो जाती है. 'छोटे सरकार' और 'मोकामा का डॉन', ये नाम ही कभी लोगों के रोंगटे खड़े कर देते थे.

पहचान और जुनून: कहते हैं कि एक वक्त ऐसा था जब मोकामा में कानून नहीं, बल्कि अनंत सिंह का फरमान चलता था. सफेद सफारी सूट, आंखों पर महंगा चश्मा, सिर पर हैट और बग्घी की सवारी का शौक. उनके शौक भी आम नहीं थे. उन्हें अजगर पालने का जुनून था. एक तरफ वह गरीबों के बीच 'रॉबिनहुड' की छवि रखते थे, तो दूसरी तरफ उनके घर से एके-47 और हैंड ग्रेनेड बरामद होते थे.

अपराध की पहली सीढ़ी (9 साल की उम्र): अनंत सिंह का अपराध से नाता बहुत पुराना है. पटना से करीब 40 मिनट दूर बाढ़ का इलाका, जो राजपूतों और भूमिहारों की खूनी जंग का गवाह रहा है, वहीं के लदमा गांव में अनंत सिंह का जन्म हुआ. चार भाइयों में सबसे छोटे अनंत ने जरायम की दुनिया में पहला कदम तब रखा, जब उनकी उम्र महज 9 साल थी. कहा जाता है कि पहली बार वह इसी उम्र में जेल गए थे.

भाई की विरासत और साधु से 'बाहुबली' बनने की कहानी: अनंत सिंह की आपराधिक विरासत उनके बड़े भाई दिलीप सिंह से शुरू होती है. दिलीप सिंह खुद बिहार के बड़े बाहुबली नेता थे और लालू प्रसाद यादव की सरकार में मंत्री भी रहे. 80 के दशक में वह कांग्रेस विधायक श्याम सुंदर धीरज के लिए बूथ कब्जाने का काम करते थे. 1990 में वह जनता दल के टिकट पर विधायक बने. दिलीप सिंह ने राजनीति का रास्ता बनाया, जिस पर चलने के लिए अनंत सिंह तैयार हो रहे थे.

लेकिन अनंत सिंह की जिंदगी का एक दिलचस्प किस्सा भी है. कहा जाता है कि एक वक्त उन्हें वैराग्य हो गया था और वह सब कुछ छोड़कर अयोध्या और हरिद्वार में साधु बन गए थे. वह जटाएं रखने लगे थे और भगवा धारण कर लिया था. लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था.

बदले की आग: जब अनंत सिंह साधु बने हुए थे, तब उनके सबसे बड़े भाई बिरंची सिंह की हत्या कर दी गई. भाई की मौत की खबर ने अनंत के अंदर के साधु को मार दिया और एक खूनी बदले की आग जला दी. वह हरिद्वार से सीधे अपने गांव लौटे. कहा जाता है कि उन्होंने नदी पार की, अपने भाई के हत्यारे को ढूंढा और उसे ईंटों से कुचल-कुचलकर मार डाला. यही वह दिन था, जब बिहार की धरती पर 'छोटे सरकार' का असली जन्म हुआ.


सुशासन' का बाहुबली: नीतीश और अनंत का साथ

90 का दशक बिहार में लालू प्रसाद यादव के 'जंगल राज' का दौर कहा जाता है. राजनीति दो ध्रुवों में बंटी थी- लालू यादव और जो लालू के खिलाफ थे. 1994 में जब नीतीश कुमार ने लालू से अलग होकर समता पार्टी बनाई, तब उन्हें जातीय समीकरण साधने की जरूरत पड़ी.

नीतीश की जरूरत, अनंत का उदय: लालू के M-Y (मुस्लिम-यादव) समीकरण को तोड़ने के लिए नीतीश कुमार को Luv-Kush (कुर्मी-कोइरी) के साथ-साथ सवर्ण जातियों, खासकर भूमिहारों के समर्थन की जरूरत थी. 1996, 1998 और 1999 के लोकसभा चुनावों में नीतीश को बाढ़ और मोकामा के इलाके में अपने जातीय समीकरण संभालने के लिए एक 'मजबूत' हाथ की जरूरत थी.

यह जरूरत अनंत सिंह के रूप में पूरी हुई. अनंत सिंह तेजी से बाढ़ में भूमिहार समुदाय के रक्षक और 'मसीहा' के तौर पर उभर रहे थे. वह दिलीप सिंह के छोटे भाई थे, लेकिन उनका खौफ अपने भाई से कहीं ज्यादा था.

2005 का 'कलंक': साल 2005 बिहार की राजनीति का निर्णायक मोड़ था. नीतीश कुमार 'सुशासन' के वादे पर 15 साल के 'जंगल राज' को खत्म करने की लड़ाई लड़ रहे थे. लेकिन इसी चुनाव में उन्होंने मोकामा से अनंत सिंह को जेडीयू का टिकट दे दिया. यह एक ऐसा फैसला था, जिसने खुद नीतीश कुमार की छवि पर सवाल खड़े कर दिए. जो नीतीश अपराधमुक्त राजनीति का सपना दिखा रहे थे, वह उस शख्स को टिकट कैसे दे रहे थे, जिस पर हत्या, अपहरण और फिरौती के दर्जनों मामले थे?

लेकिन राजनीति हकीकत के धरातल पर लड़ी जाती है. अनंत सिंह ने मोकामा से जबरदस्त जीत हासिल की. नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और अनंत सिंह 'माननीय विधायक' बन गए.

'रॉबिनहुड' का मायाजाल: विधायक बनने के बाद अनंत सिंह ने अपनी छवि को और मजबूत किया. वह 'छोटे सरकार' थे, जो अपनी 'प्रजा' का ख्याल रखते थे. छठ पर हजारों गरीब महिलाओं को धोती बांटना, गरीबों को तांगा (बग्घी) खरीदकर देना ताकि वे रोजी-रोटी कमा सकें, और रमजान में भव्य इफ्तार पार्टियों का आयोजन करना. यह वह तिकड़ी थी, जिसने अनंत सिंह को मोकामा में गरीबों का 'मसीहा' बना दिया.

यह एक ऐसा मायाजाल था, जिसने उनके संगीन अपराधों पर पर्दा डाल दिया. नीतीश कुमार के साथ हाथ जोड़े उनकी तस्वीरें वायरल हुईं. 'सुशासन' की सरकार में 'बाहुबल' का यह प्रतीक समानांतर सत्ता चलाता रहा.


भाग 5: बाहुबली अनंत सिंह की 'क्राइम कुंडली'

'छोटे सरकार' का रसूख सिर्फ उनके 'रॉबिनहुड' होने से नहीं, बल्कि उनके खौफ से चलता था. उनकी क्राइम कुंडली बिहार पुलिस के लिए हमेशा एक चुनौती रही.

2004: जब किले में तब्दील हो गया घर (STF से मुठभेड़) साल 2004 में, नीतीश के सत्ता में आने से ठीक पहले, बिहार एसटीएफ ने अनंत सिंह को पकड़ने के लिए मोकामा में उनके आलीशान आवास पर छापेमारी की. लेकिन यह छापेमारी एक खूनी जंग में बदल गई. अनंत सिंह का घर एक किले में तब्दील हो गया. उनके गुर्गों और पुलिस के बीच कई घंटों तक दोनों तरफ से अंधाधुंध गोलियां चलती रहीं. इस मुठभेड़ में एसटीएफ का एक जवान शहीद हो गया और अनंत सिंह के आठ लोग मारे गए. गोलियां अनंत सिंह को भी लगीं, लेकिन वह बच निकले. न गिरफ्तारी हुई, न ही उस दिन किसी ने 'छोटे सरकार' को छूने की हिम्मत दिखाई.

2007: पत्रकारों की बेरहम पिटाई (बलात्कार का सवाल) 2007 में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे और 'सुशासन' का ढिंढोरा पीटा जा रहा था. तभी एक महिला के साथ बलात्कार और हत्या के संगीन मामले में अनंत सिंह का नाम उछला. जब एक निजी टीवी चैनल की टीम पटना में उनके विधायक आवास पर उनसे सवाल करने पहुंची, तो 'छोटे सरकार' का पारा चढ़ गया. उनके समर्थकों ने पत्रकारों को बंधक बना लिया और उनकी बेरहमी से पिटाई की. यह मामला राष्ट्रीय मीडिया में छाया रहा. अनंत सिंह की गिरफ्तारी हुई, लेकिन नीतीश सरकार ने इस पर रहस्यमयी चुप्पी साध ली. कुछ ही दिनों में वह बाहर आ गए और उनका बाल भी बांका नहीं हुआ.

2015: खौफ का चरम (चार युवकों का अपहरण और हत्या) 17 जून 2015 की घटना दिखाती है कि अनंत सिंह का अहंकार किस हद तक बढ़ चुका था. बाढ़ के बाजार में अनंत सिंह के परिवार की एक महिला को चार युवकों ने कथित तौर पर छेड़ दिया. यह मामला छोटा था, लेकिन इसका नतीजा भयानक हुआ. आरोप है कि 'छोटे सरकार' के इशारे पर उनके गुर्गों ने चारों युवकों को अगवा कर लिया. अगली सुबह उनमें से एक युवक, पुटुस यादव का शव जंगल में मिला. उसके शरीर पर बेरहमी से पिटाई के निशान थे. बाकी तीन युवकों को पुलिस ने जिंदा बरामद कर लिया. इस मामले ने बिहार को हिलाकर रख दिया.

धमकियां और वायरल वीडियो: अनंत सिंह के खौफ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री थे, तो अनंत सिंह ने उन्हें खुलेआम धमकाने की हिम्मत दिखाई थी. नीतीश सरकार में मंत्री रहीं परवीन अमानुल्लाह को भी उन्होंने धमकी दी थी. उनका एक वीडियो भी वायरल हुआ, जिसमें वह एके-47 लहराते हुए दिख रहे थे.


पतन, जेल और खूनी वापसी

अनंत सिंह की यही हरकतें धीरे-धीरे नीतीश कुमार के लिए बोझ बनती गईं.

2015 का अलगाव: साल 2015 में जब नीतीश कुमार ने अपने पुराने दुश्मन लालू प्रसाद यादव के साथ 'महागठबंधन' बनाया, तो राजनीतिक समीकरण बदल गए. लालू के साथ गठबंधन में अनंत सिंह जैसे 'भूमिहार बाहुबली' के लिए कोई जगह नहीं थी. अनंत सिंह ने जेडीयू से इस्तीफा दे दिया.

जेल से जीत: 2015 का विधानसभा चुनाव अनंत सिंह ने जेल से लड़ा. वह एक दिन भी प्रचार करने के लिए बाहर नहीं आए. लेकिन 'छोटे सरकार' का नाम ही काफी था. उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर 18,000 से ज्यादा वोटों से जीत हासिल की. यह उनके खौफ और रसूख का सबूत था.

UAPA और AK-47 कांड (2019): 2019 में अनंत सिंह का पतन शुरू हुआ. 16 अगस्त 2019 को बाढ़ में उनके पैतृक घर (लदमा) पर पुलिस ने छापेमारी की. इस बार जो बरामद हुआ, उसने सबके होश उड़ा दिए. अनंत सिंह के घर से एक AK-47 राइफल, दो हैंड ग्रेनेड और 26 जिंदा कारतूस बरामद हुए.

यह बरामदगी इतनी बड़ी थी कि यह मामला सिर्फ बिहार पुलिस तक सीमित नहीं रहा. उनके खिलाफ गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत मामला दर्ज किया गया. यह एक आतंकी गतिविधियों में इस्तेमाल होने वाला कानून है. इस मामले ने उन्हें लंबे समय के लिए जेल भेज दिया. लगा कि 'छोटे सरकार' का अध्याय अब समाप्त हो गया है.

2025: वापसी और पहला खून लेकिन बिहार की राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता. 2025 के चुनाव आते-आते अनंत सिंह फिर से जेडीयू के पाले में आ गए. जिस नीतीश कुमार की सरकार ने उन पर UAPA लगवाया, उसी जेडीयू ने उन्हें मोकामा से अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया.

और अब, 30 अक्टूबर 2025 को, दुलार चंद यादव की हत्या हो गई है. यह हत्या अनंत सिंह की मोकामा में 'वापसी' का ऐलान है. यह उनके विरोधियों के लिए एक संदेश है कि 'इलाका' अभी भी उन्हीं का है और जो भी उनके रास्ते में आएगा, उसका हश्र दुलार चंद यादव जैसा ही होगा.

दुलार चंद यादव की हत्या सिर्फ एक चुनावी हिंसा नहीं है. यह बिहार के 'सुशासन' के चेहरे पर एक बदनुमा दाग है.  अनंत सिंह का साधु बनने से लेकर, भाई का बदला लेने, 'सुशासन' का विधायक बनने, पत्रकारों को पिटवाने, AK-47 रखने और अब एक राजनीतिक विरोधी को कुचलकर मार डालने का आरोपी बनने तक का सफर, बिहार की राजनीति का एक डरावना एक्स-रे है.

मोकामा की धरती पर दुलार चंद यादव का जो खून बहा है, वह कई सवाल खड़े कर रहा है. क्या प्रशांत किशोर का 'जनसुराज' इस बाहुबली तंत्र को भेद पाएगा?