Mumbai: मुंबई में टैक्सी ड्राइवर को खुद की बेगुनाही साबित करने के लिए लगे 18 साल, कानूनी लड़ाई के बाद अब बरी
घटना 24 अप्रैल, 2007 को चर्चगेट रेलवे स्टेशन के बाहर हुई थी, जब एक यात्री और टैक्सी ड्राइवर के बीच विवाद हुआ. राजेश यादव ने बीच-बचाव करने की कोशिश की, लेकिन असली आरोपी राजेंद्र यादव मौके से फरार हो गया। यात्री ने गलती से राजेश को हमलावर समझ लिया और मरीन ड्राइव पुलिस ने बिना ठोस जांच के उन्हें गिरफ्तार कर लिया.
मुंबई के एक टैक्सी ड्राइवर राजेश यादव को खुद की बेगुनाही साबित करने में 18 साल लग गए। 2007 में चर्चगेट रेलवे स्टेशन के बाहर हुए एक झगड़े के मामले में गलत पहचान के चलते गिरफ्तार किए गए राजेश को आखिरकार इस्प्लानेड मजिस्ट्रेट कोर्ट ने बरी कर दिया है. लेकिन इतने सालों की मानसिक, आर्थिक और सामाजिक पीड़ा झेलने के बाद राजेश दुखी और आहत हैं. उनका सवाल है"अगर मैं बेगुनाह था, तो मुझे 18 साल क्यों भुगतने पड़े? क्या पुलिस की गलती की कोई जवाबदेही नहीं?"
24 अप्रैल 2007 का मामला
घटना 24 अप्रैल, 2007 को चर्चगेट रेलवे स्टेशन के बाहर हुई थी, जब एक यात्री और टैक्सी ड्राइवर के बीच विवाद हुआ. राजेश यादव ने बीच-बचाव करने की कोशिश की, लेकिन असली आरोपी राजेंद्र यादव मौके से फरार हो गया। यात्री ने गलती से राजेश को हमलावर समझ लिया और मरीन ड्राइव पुलिस ने बिना ठोस जांच के उन्हें गिरफ्तार कर लिया. यह भी पढ़े: UP: 35 साल की कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद किसान को मिला इंसाफ, कहा- मेरे कंधे से बहुत बड़ा बोझ उतर गया
जेल की हवा भी खानी पड़ी
राजेश अपने बारे में बताते हैं, “मैंने पुलिस को कई बार अपना सही नाम बताया, लेकिन फिर भी उन्होंने मेरी नहीं सुनी।” उन्हें एक रात पुलिस हिरासत और दो रातें आर्थर रोड जेल में बितानी पड़ीं। केस लड़ने के लिए उन्हें अपनी टैक्सी बेचनी पड़ी और 18 वर्षों में 80 से अधिक बार अदालत में पेश होना पड़ा। उनका कुल खर्च लगभग ₹3 लाख तक पहुंच गया.
FIR ने छीन ली रोजी-रोटी
FIR के कारण कोई भी उन्हें ड्राइवर की नौकरी देने को तैयार नहीं था। बार-बार अदालत जाने की वजह से कई नौकरियां भी चली गईं. एक बार सुनवाई छूटने पर गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ और वह फिर से जेल चले गए. आर्थिक संकट इतना गहरा गया कि उन्होंने अपनी पत्नी और तीन बच्चों को गांव भेजना पड़ा.
जांच में लापरवाही
राजेश के वकील सुनील पांडे ने बताया कि पुलिस जांच में गंभीर खामियां थीं, जैसे आरोपी का गलत नाम दर्ज होना (राजेश यादव के बजाय राजेंद्र यादव), कोई प्रत्यक्ष गवाह नहीं होना, CCTV फुटेज का अभाव और सबूतों का गलत प्रबंधन. शिकायतकर्ता जो कि एक स्थानीय राजनेता था, सही आरोपी की पहचान नहीं कर पाया.
(The above story first appeared on LatestLY on Jun 24, 2025 01:55 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

