दिल्ली हाई कोर्ट: पत्नी सहायक नहीं, उसकी अलग पहचान
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि पत्नी पति की सहायक नहीं होती, उसकी व्यक्तिगत पहचान और आकांक्षाएं होती हैं.
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि पत्नी पति की सहायक नहीं होती, उसकी व्यक्तिगत पहचान और आकांक्षाएं होती हैं. कोर्ट ने कहा पत्नी अपने सपने को पूरा करने का अधिकार रखती है.हाई कोर्ट ने एक मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि पत्नी की पहचान अलग होती है, पत्नी अपने पति की सहायक नहीं होती. उसकी पहचान पति की पहचान के साथ समाहित नहीं है. हाई कोर्ट ने कहा पत्नी को आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने या सार्थक सामाजिक कार्य करने के अपने सपने पूरे करने का स्वाभाविक अधिकार है.
हाई कोर्ट की यह टिप्पणी एक मामले में सुनवाई के दौरान आई जिसमें कोर्ट ने एक किराएदार को दुकान खाली करने का आदेश दिया. इस दुकान का इस्तेमाल संपत्ति मालिक की बेटियां करना चाहती थीं.
संपत्ति मालिक की बेटियां शादीशुदा हैं और वे दिल्ली में इस दुकान का इस्तेमाल कारोबार शुरू करने के लिए करना चाहती थीं.
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पत्नी की पति से अलग पहचान
दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस नजमी वजीरी ने कहा, "कानून में एक पत्नी व्यक्तिगत इकाई को बरकरार रखती है, जिसमें उसके सपनों, आकांक्षाओं, इच्छा और आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने या कुछ और सामाजिक कार्य करने की जरूरत को पूरा करने का प्राकृतिक अधिकार भी शामिल है."
संपत्ति मालिक ने जून 2018 में निचली अदालत की ओर से उनकी किराएदार को बेदखल करने की मांग वाली अपनी याचिका को खारिज करने को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी.
हाई कोर्ट ने कहा, "तमाम ऐसी महिलाएं होंगी, जिनके जीवन का मकसद बिना कुछ शोहरत पाना या किसी अमीर शख्स की पत्नी के रूप में पहचान बनाना न हो. शादीशुदा बेटियां अपने माता-पिता की वाणिज्यिक संपत्ति या आवासीय जगह के लिए आश्रितों में शामिल हैं."
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि कानून आश्रितों की जरूरत पर किराएदार को बेदखल करने की इजाजत देता है.
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बेटियों के हक में फैसला
संपत्ति मालिक के वकील ने तर्क दिया कि शादीशुदा बेटियों के पास कोई उपयुक्त वैकल्पिक आवास नहीं था, वे बेरोजगार थीं लेकिन अच्छी तरह से शिक्षित होने के कारण उनकी व्यावसायिक आकांक्षाएं थीं. बेदखली याचिका इस आधार पर खारिज कर दी गई कि वास्तविक जरूरत स्थापित नहीं की गई.
मकान मालिक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए जस्टिस वजीरी ने कहा कि संपत्ति मालिक, उसकी पत्नी की आर्थिक भलाई और बेटियों के पतियों के व्यवसाय के जांच में दिए गए फैसले ने "गलत दिशा" दी या यह निष्कर्ष निकालते हुए कि बेटियों को अपना व्यवसाय शुरू करने या अपने पिता से व्यवसाय के लिए आवास उपलब्ध कराने के लिए कहने की कोई आवश्यकता नहीं थी, केवल इसलिए क्योंकि वे विवाहित थीं और उनके पतियों के पास वैकल्पिक आवास उपलब्ध था.
हाई कोर्ट ने कहा कि एक बेटी के लिए, चाहे उसकी वैवाहिक स्थिति कुछ भी हो, उसका पैतृक घर या मायका हमेशा एक "मनोवैज्ञानिक, शारीरिक और भावनात्मक शरण" होता है और एक ऐसी जगह होती है, जहां से वह जुड़ सकती है और स्वतंत्र रूप से वापस लौट सकती है, भले ही वह भौगोलिक रूप से कितनी भी दूर क्यों न हो.
हाई कोर्ट ने कहा कि कारोबार शुरू करने के लिए बेटियों की शिक्षा और योग्यता की जांच गैर जरूरी थी. हाई कोर्ट ने कहा कि बेटियां अपना कारोबार शुरू करने के लिए जगह के लिए पिता पर निर्भर थीं.
(The above story first appeared on LatestLY on Jul 11, 2023 01:10 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

