कलकत्ता हाई कोर्ट (Calcutta High Court) ने हाल ही में एक अहम फैसला सुनाया जिसमें पत्नी द्वारा अपने पति और ससुराल वालों पर दर्ज कराए गए धारा 498A (क्रूरता), SC/ST एक्ट और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के अंतर्गत मामले रद्द कर दिए गए. पत्नी का आरोप था कि ससुराल पक्ष ने उसके साथ क्रूरता की है.
जस्टिस अजय कुमार गुप्ता (Justice Ajay Kumar Gupta) की बेंच ने कहा कि पत्नी शिक्षित और कमाऊ महिला है. ऐसे में उससे घर के खर्च में योगदान की उम्मीद करना, कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन सामान खरीदने को कहना या सास द्वारा बच्चे को खिलाने की जिम्मेदारी देना. इनमें से कोई भी बात कानून की नजर में क्रूरता (Cruelty) नहीं मानी जा सकती.
क्यों खास है यह फैसला?
498A का दायरा स्पष्ट- कोर्ट ने साफ किया कि हर घरेलू विवाद या जिम्मेदारी को क्रूरता मान लेना सही नहीं है.
समान जिम्मेदारी का संकेत- पति-पत्नी दोनों शिक्षित और कमाने वाले हों तो घरेलू खर्च में योगदान अपेक्षित है.
झूठे केसों पर रोक- यह फैसला ऐसे मामलों में नजीर बन सकता है जहाँ मामूली मतभेदों को आधार बनाकर गंभीर धाराएं लगाई जाती हैं.
खर्च में दोनों का योगदान जरूरी- कलकत्ता हाई कोर्ट
The Calcutta High Court has quashed cases filed by a wife against her husband and in-laws, accusing them of cruelty under Section #498A the Indian Penal Code, and under various sections of the SC/ST Act and Juvenile Justice Act.
Justice Ajay Kumar Gupta held: "The opposite party… pic.twitter.com/wfq7MjhqaC
— Live Law (@LiveLawIndia) September 4, 2025
यह निर्णय समाज को यह संदेश देता है कि वैवाहिक जीवन साझेदारी है, न कि केवल एकतरफा जिम्मेदारी. पति और पत्नी दोनों से सहयोग की अपेक्षा की जाती है. साथ ही, यह फैसला यह भी दर्शाता है कि कानून का गलत इस्तेमाल करने पर न्यायालय सख्ती से हस्तक्षेप कर सकता है.













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