OP Nayyar's 95th Birth Anniversary: एक जिद्दी, स्वाभिमानी संगीतकार, जिनकी फैन मधुबाला भी थीं! 
ओपी नय्यर (Photo Credits: Instagram)

OP Nayyar's 95th Birth Anniversary: 50-60 के दशक में हिंदी फिल्म संगीत इंडस्ट्री में यह बात मशहूर थी कि जिस संगीतकार के लिए लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) गाना नहीं गाती थीं, उसका इंडस्ट्री में टिकना आसान नहीं होता था, लेकिन ओपी नैय्यर (OP Nayyar) एकमात्र संगीतकार थे, जिसने लता से एक भी गाना गवाए बगैर न केवल चोटी के संगीत बनें, बल्कि अपने समय के सबसे महंगे संगीतकार भी थे. फिल्म इंडस्ट्री में वे ओपी नैय्यर अथवा ओपी के नाम से मशहूर थे.

हमेशा दो टूक बातें करने वाले ओपी नैय्यर फिल्म इंडस्ट्री में अक्खड़, बदमिजाज, जिद्दी, घमंडी, दबंग और निरंकुश जैसे तमाम उपनामों से भी पुकारे जाते थे. जानकार बताते हैं कि ओपी उन्हीं के साथ काम करते थे, जिन्हें वे पसंद करते थे. इसके बावजूद उनकी फिल्मों के गाने सुपर हिट होते थे. इस महान संगीतकार की 95वीं वर्षगांठ (16 जनवरी) पर आइये जानें उनके संगीत करियर के कुछ रोचक पहलू...

निजी जीवन

ओपी नैय्यर का जन्म 16 जनवरी 1926 को लाहौर (पाकिस्तान) में हुआ था. बचपन से ही संगीत में दिलचस्पी होने के कारण उनका मन स्कूल की पढ़ाई में नहीं लगता था. कहा जाता है कि वह जब मात्र 8 साल के थे, 1934 में उन्हें लाहौर रेडियो में एक गाना गाने का अवसर मिला. उनकी हिम्मत बढ़ी, और महज 10 साल की उम्र में उन्हें बतौर संगीतकार पंजाबी फिल्म 'धुलिया भट्टी' के लिए गाना रिकॉर्ड करने का भी मौका मिल गया, लेकिन इसी बीच बटवारे के कारण ओपी सपरिवार लाहौर से अमृतसर आ गये. अमृतसर में उन्हें अहसास हुआ कि अगर उन्हें संगीत के क्षेत्र में कुछ अर्जित करना है तो उन्हें बंबई कूच करना होगा.

 

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अमृतसर से बंबई आना

साल 1949 में ओपी बंबई (मुंबई) आ गये. थोड़ी मशक्कत के बाद उन्हें निर्माता निर्देशक कृष्ण की फिल्म 'कनीज' के लिए बैकग्राउंड म्युजिक बनाने का अवसर मिला. 'कनीज' फ्लॉप हो गयी. उनके एक मित्र ने उन्हें दिल्ली में दलसुख पंचोली से मिलने की सलाह दी, जो उन दिनों फिल्म 'नगीना' बना रहे थे. लेकिन गीता दत्त के सुझाव पर वे गुरुदत्त के पास पहुंचे. गुरुदत्त अपना खुद के प्रोडक्शन में पहली फिल्म 'आरपार' बना रहे थे. गुरुदत्त ने उन्हें अपनी फिल्म 'आरपार' के लिए बतौर संगीत निर्देशक साइन कर लिया. 1954 में प्रदर्शित फिल्म 'आर पार' के कई गाने, 'ये लो मैं हारी पिया..', 'मोहब्बत कर लो जी.., 'बाबू जी धीरे चलना.. ', 'कभी आर कभी पार लागा...' सुपर हिट हुए. इसके बाद गुरुदत्त की ही फ़िल्म 'मिस्टर एंड मिसेज 55' के लिए भी ओ.पी. ने ही संगीत दिया. इस फिल्म के भी सारे गाने मसलन  'जाने कहां मेरा जिगर गया जी' और 'ठंडी हवा काली घटा' आदि खूब हिट हुए.

इसलिए लता मंगेशकर का बायकॉट किया! 

साल 1952 में ओपी नैयर फिल्म 'आर पार' के लिए गाने रिकॉर्ड करवा रहे थे. उन्होंने गीता दत्त और सीएच आत्मा की आवाज में 8 गाने रिकॉर्ड करवा लिया था. अंतिम गाना जो फिल्म की सहनायिका पर फिल्माना था, के लिए ओपी ने लता को बुलवाया. उन दिनों लता सबसे पॉपुलर गायिका हुआ करती थीं. उन्होंने अमुक गाना गाने से मना करते हुए कहा कि वे सहनायिका के लिए गाना नहीं गायेंगी. ओपी को लता का इस तरह से इंकार करना पसंद नहीं आया. वे भड़क गये. हांलाकि यह उनकी पहली फिल्म थी, इतना रिस्क कोई नया संगीतकार नहीं ले सकता था, मगर ओपी ने उसी समय प्रतिज्ञा कर ली कि वे घर वापस चले जायेंगे मगर लता के साथ ताउम्र काम नहीं करेंगे. और पहली फिल्म से अंतिम फिल्म तक उन्होंने लता से गाना नहीं गवाया. लता से उनकी नाराजगी इस कदर थी कि मप्र सरकार द्वारा दिया जानेवाला पुरस्कार केवल इसलिए लेने से मना कर दिया क्योंकि उस पुरस्कार के साथ लता मंगेशकर का नाम जुड़ा था. हालांकि उन दिनों वे आर्थिक तंगी से गुजर रहे थे.

मधुबाला भी उन्हें पसंद करती थीं! 

अपनी जिद और सनक के बावजूद ओपी फिल्म इंडस्ट्री में अपने काम के कारण हमेशा सुर्खियों में रहे. वे पहले संगीतकार थे, जिसे प्रति फिल्म एक लाख रुपये का पारिश्रमिक मिलता था, वे पहले संगीतकार थे, जिनका नाम स्क्रीन पर हीरो और हीरोइन से पहले आता था. अभिनेत्री मधुबाला ओपी की इस कदर फैन थीं कि उन्होंने स्पष्ट कह दिया था कि उनकी जिस फिल्म में ओपी नैय्यर संगीतकार होंगे, वे अपना पारिश्रमिक आधा कर देंगी. शायद यही वजह थी कि मधुबाला की छह फिल्मों का संगीत ओपी ने दिया.

अंतिम दिनों में ओपी नैय्यर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. इसके बावजूद उन्होंने अपने काम के साथ समझौता नहीं किया. अंततः  28 जनवरी 2007 को ओपी नैय्यर ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनके यादगार गीत उन्हें हमेशा जीवित रखेंगे.