नयी दिल्ली, 15 अप्रैल उच्चतम न्यायालय ने कॉपीराइट अधिनियम के तहत संरक्षित कार्यों और डिजाइन अधिनियम के तहत संरक्षण के लिए पात्र डिजाइनों के बीच अंतर करने के लिए मंगलवार को एक रूपरेखा निर्धारित की।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने औद्योगिक डिजाइनों में बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित एक मामले का फैसला करते हुए यह रूपरेखा निर्धारित की।
शीर्ष अदालत ने क्रायोगैस इक्विपमेंट प्राइवेट लिमिटेड और एलएनजी एक्सप्रेस इंडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा आईनॉक्स इंडिया लिमिटेड के खिलाफ दायर अपीलों को खारिज कर दिया तथा गुजरात उच्च न्यायालय के आईनॉक्स के कॉपीराइट उल्लंघन के मुकदमे को बहाल करने के आदेश की पुष्टि की तथा अधीनस्थ अदालत को मामले को गुण-दोष के आधार पर आगे बढ़ाने का निर्देश दिया।
इस मामले में निर्धारण योग्य एक महत्वपूर्ण मुद्दा था कि कोई कार्य या वस्तु कॉपीराइट अधिनियम की धारा 15(2) में निर्धारित सीमा के अंतर्गत आता है या नहीं, ताकि इसे डिजाइन अधिनियम की धारा 2(डी) के तहत ‘डिजाइन’ के रूप में वर्गीकृत किया जा सके।
इस मुद्दे में यह सवाल शामिल था कि औद्योगिक पैमाने पर इसके इस्तेमाल के कारण किसी कलात्मक कार्य को कॉपीराइट संरक्षण मिलना कब बंद हो जाता है और इसलिए यह डिज़ाइन अधिनियम के तहत परिभाषित ‘डिज़ाइन’ में बदल जाता है।
न्यायालय ने कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के तहत संरक्षित कार्यों और डिजाइन अधिनियम, 2000 के तहत संरक्षण के लिए पात्र डिजाइन के बीच अंतर करने के लिए एक निश्चित रूपरेखा निर्धारित करते हुए विशेष रूप से कॉपीराइट अधिनियम की धारा 15(2) के संदर्भ में कलात्मक कार्यों और डिजाइन के बीच अक्सर विवादित ‘ओवरलैप’ के मसले का निस्तारण किया गया।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने पीठ की ओर से 56-पृष्ठ का फैसला लिखा।
इसमें कहा गया है कि प्रमुख वाणिज्यिक उपयोगिता वाले कार्य डिजाइन अधिनियम के दायरे में आएंगे और पंजीकृत न होने पर कॉपीराइट का संरक्षण खो देंगे।
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