देश की खबरें | न्यायालय ने एक मामले के जवाब में अप्रचलित मामलों को शामिल करने पर उप्र सरकार की आलोचना की

नयी दिल्ली, छह फरवरी उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को उत्तर प्रदेश सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि राज्य के गैंगस्टर विरोधी कानून के तहत दर्ज एक मामले में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ अपने जवाब में अप्रचलित मामलों को शामिल करने के कारण वह ‘‘अभियोजक नहीं बल्कि एक उत्पीड़क’’ है।

न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने एक आरोपी की याचिका पर राज्य के हलफनामे का हवाला दिया और सवाल किया कि उसके खिलाफ ऐसे मामले क्यों हैं जिन्हें या तो रद्द कर दिया गया या जिनमें उसे बरी कर दिया गया है।

पीठ ने कहा, ‘‘आप अपने जवाब में उन मामलों को भी शामिल कर रहे हैं जिन्हें खारिज कर दिया गया है और जिनमें याचिकाकर्ता को बरी कर दिया गया है। यदि यह आपकी कार्यप्रणाली है, तो आप ‘अभियोजक’ नहीं हैं, बल्कि आप ‘उत्पीड़क’ हैं।’’

अदालत ने उत्तर प्रदेश गुंडागर्दी और असामाजिक क्रियाकलाप (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के तहत आरोपों का सामना कर रहे चार व्यक्तियों को जमानत दे दी।

पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार से पूछा, ‘‘यदि वह (याचिकाकर्ता) पहले से ही कुछ मामलों में जमानत पर रिहा है, यदि कुछ कार्यवाही रद्द कर दी गई है, यदि कुछ कार्यवाही में उसे बरी कर दिया गया है... तो क्या आपके लिए इस अदालत के समक्ष तथ्यात्मक स्थिति रखना आवश्यक नहीं था?’’

यह आदेश आरोपियों द्वारा दायर चार अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए पारित किया गया। आरोपियों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा उनकी जमानत याचिकाओं को खारिज करने के नवंबर 2024 के आदेश को चुनौती दी थी।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि याचिकाकर्ता भाई हैं और 2017 के बाद दर्ज मामलों में उन्हें फंसाया गया है, क्योंकि उनके पिता एक राजनीतिक दल से संबंधित एमएलसी थे।

उन्होंने कहा कि राज्य की कार्यप्रणाली ऐसी है कि जब याचिकाकर्ताओं को एक मामले में जमानत मिल जाती है तो उनके खिलाफ दूसरी प्राथमिकी दर्ज कर दी जाती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उन्हें कभी राहत न मिले।

लूथरा ने राज्य के हलफनामे का हवाला देते हुए कहा कि एक याचिकाकर्ता के खिलाफ 28 प्राथमिकी जबकि अन्य के खिलाफ 15 प्राथमिकी दर्ज हैं।

उन्होंने कहा कि ज्यादातर मामलों में राज्य ने आपराधिक पृष्ठभूमि के आधार पर जमानत का विरोध किया, याचिकाकर्ताओं को या तो बरी कर दिया गया या जमानत पर रिहा कर दिया गया और कुछ मामलों में उच्चतम न्यायालय ने उनमें से कुछ के खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी।

राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील ने जमानत याचिकाओं का विरोध किया और कहा कि दर्ज मामलों में से एक कथित सामूहिक बलात्कार का मामला है।

कथित सामूहिक बलात्कार मामले में अदालत ने कहा कि सहारनपुर की एक निचली अदालत ने जुलाई 2022 में जमानत दे दी थी, लेकिन राज्य ने ढाई साल बाद भी इसे रद्द करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।

राज्य सरकार के वकील ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के पिता देश छोड़कर भाग गए हैं और वे भी भाग सकते हैं।

लूथरा ने हालांकि कहा कि उनके पासपोर्ट पहले ही जब्त कर लिए गए हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘हम मामले की सुनवाई करने वाले न्यायाधीश के पास पासपोर्ट जमा करने का निर्देश देते हैं ताकि राज्य की आशंका को ध्यान में रखा जा सके।’’

इसने याचिकाकर्ताओं को मुकदमे की सुनवाई में नियमित रूप से उपस्थित रहने और इसके शीघ्र निपटारे में सहयोग करने का भी निर्देश दिया।

याचिकाकर्ताओं के खिलाफ अप्रैल, 2022 में सहारनपुर जिले में दर्ज किया गया मामला अवैध खनन और सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जे से जुड़ा है।

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