देश की खबरें | हुबली दंगों की प्राथमिकी समेत 43 आपराधिक मामले वापस लेने के सरकारी आदेश को अदालत ने रद्द किया

बेंगलुरु, 29 मई कर्नाटक उच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को राज्य सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें लोक अभियोजकों को 2022 के हुबली दंगों से जुड़े मामलों समेत 43 आपराधिक मामले वापस लेने का निर्देश दिया गया था।

अदालत का यह फैसला अधिवक्ता गिरीश भारद्वाज की एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर आया, जिसमें उन्होंने राज्य सरकार के आदेश को चुनौती दी है।

मुख्य न्यायाधीश एन वी अंजारिया और न्यायमूर्ति के वी अरविंद की पीठ ने जनहित याचिका स्वीकार करते हुए सरकार के निर्देश को शुरू से ही अमान्य घोषित कर दिया।

अदालत ने अपने फैसले में कहा, ‘‘सरकारी आदेश को रद्द किया जाता है। इसे शुरू से ही अमान्य माना जाएगा। इसके कानूनी परिणाम सामने आएंगे।’’

कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर अपना अंतिम फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति अंजारिया ने कानूनी बिरादरी के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्हें उच्चतम न्यायालय में पदोन्नत किया गया है।

उन्होंने आदेश सुनाने से पहले भावुक होकर कहा, ‘‘यह इस अदालत में मेरा आखिरी दिन है। मैं सभी वकीलों, उच्च न्यायालय के कर्मचारियों और मेरा समर्थन करने वाले सभी लोगों का धन्यवाद करता हूं। यह मेरी अंतिम बैठक, अंतिम घोषणा और अंतिम आदेश है।’’

याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ता वेंकटेश दलवई ने दलील दी कि राज्य सरकार ने अभियोजन पक्ष को दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 321 के तहत मामले वापस लेने के लिए आवेदन दायर करने का निर्देश देकर अपने अधिकार का अतिक्रमण किया है।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मुकदमा वापस लेने का निर्णय पूरी तरह से सरकारी अभियोजक के पास है, जिसे स्वतंत्र रूप से कार्य करना चाहिए, न कि कार्यपालिका के इशारे पर।

शीर्ष अदालत के फैसलों का हवाला देते हुए दलवई ने दलील दी कि अभियोजक सरकारी फैसलों के लिए महज मध्यस्थ नहीं होते हैं, बल्कि उन्हें प्रत्येक मामले का गुण-दोष के आधार पर मूल्यांकन करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि विधि विभाग और अभियोजन एवं सरकारी वाद विभाग, दोनों ने 43 मामलों को वापस न लेने की सलाह दी थी, लेकिन इसे गृह विभाग ने नजरअंदाज कर दिया। गृह विभाग ने 15 अक्टूबर, 2024 को मुकदमे वापस लेने का आदेश जारी किया।

इन मुकदमों में दंगा, हत्या का प्रयास, पुलिसकर्मियों पर हमला और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे गंभीर अपराध शामिल थे। इनमें हुबली दंगों से जुड़े मामले भी शामिल थे, जो एक सोशल मीडिया पोस्ट के कारण शुरू हुए थे।

प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर आंदोलन के दौरान एक पुलिस स्टेशन में तोड़फोड़ की और पुलिसकर्मियों पर जूते फेंके।

याचिकाकर्ता ने राज्य के इस कदम के पीछे की मंशा पर भी सवाल उठाया, जिसमें बताया गया कि वापस लिये जाने के लिए चिह्नित मामलों में राजनीतिक रूप से प्रभावशाली व्यक्तियों से जुड़े मुकदमे शामिल हैं, जिनमें पूर्व मंत्री, विधायक और शक्तिशाली संगठनों के पदाधिकारी शामिल हैं।

जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि सूची को राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए चुनिंदा रूप से तैयार किया गया था।

याचिका में कहा गया है, ‘‘कर्नाटक में 2008 से 2023 के बीच दर्ज आपराधिक मामलों की समीक्षा की गई और 43 मामलों को वापस लेने के लिए चयनित किया गया। इनमें से कई मामलों में प्रमुख राजनीतिक हस्तियां और प्रभावशाली कार्यकर्ता शामिल थे, जिससे इस प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर संदेह पैदा होता है।’’

(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)