देश की खबरें | उच्चतम न्यायालय ने स्नातकोत्तर दंत चिकित्सा पाठ्यक्रमों में दाखिले को खारिज किया

नयी दिल्ली, 21 अक्टूबर उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को छत्तीसगढ़ के दंत चिकित्सा कॉलेजों में 2018 में दंत चिकित्सा विज्ञान में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में सात छात्रों के दाखिले को ‘अवैध’ करार देते हुए कहा कि अनुचित सहानुभूति अवैध प्रक्रिया को बढ़ावा देगी।

न्यायमूर्ति एम आर शाह और न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश की पीठ ने भारतीय दंत परिषद की अपील को स्वीकार कर लिया और छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें छात्रों को अपने स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों को जारी रखने की अनुमति दी गई थी।

न्यायमूर्ति शाह द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया है, ‘‘उच्च न्यायालय द्वारा पारित अंतरिम आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है। स्थापित कानून के अनुसार किसी को भी अदालतों द्वारा पारित आदेश का लाभ लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।’’

विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए फैसले में कहा गया, ‘‘अनुचित सहानुभूति अवैध प्रक्रिया को बनाए रखने और गैर कानूनी रूप से दाखिला पाने वाले छात्रों को लाभ देने की ओर ले जाएगी।’’

दंत चिकित्सक शैलेंद्र शर्मा और छह अन्य को अंतिम चरण में भी स्नातकोत्तर सीट आवंटित नहीं की गई थीं लेकिन उन्हें समय सीमा समाप्त होने के बाद 2018 में राज्य में पीजी पाठ्यक्रमों में प्रवेश दिया गया।

प्राधिकारों ने एक आधिकारिक पत्र के साथ दाखिले को रद्द कर दिया और इसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। उच्च न्यायालय ने छह जून, 2018 को राज्य सरकार द्वारा उम्मीदवारों के प्रवेश रद्द करने के पत्र को निरस्त कर दिया। उच्च न्यायालय के आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई।

फैसले में कहा गया, ‘‘उच्च न्यायालय ने अंतरिम आदेश के माध्यम से 6 जून, 2018 के पत्र पर रोक लगा दी और मूल रिट याचिकाकर्ताओं के दाखिले को जारी रखने का निर्देश दिया। उसके बाद, संबंधित निर्णय और आदेश के द्वारा उच्च न्यायालय ने पत्र को रद्द करके रिट याचिकाएं मंजूर की...और निर्देश दिया कि संबंधित रिट याचिकाकर्ताओं को अपना पाठ्यक्रम पूरा करने की अनुमति दी जाएगी।’’

फैसले में कहा गया कि इस न्यायालय द्वारा निर्धारित कानून को लागू करते हुए अंतिम तिथि पर सीट खाली रहने पर भी कॉलेज एकतरफा प्रवेश नहीं दे सकते। छात्रों को अपनी पढ़ाई जारी रखने की अनुमति देने के लिए दलीलों को खारिज करते हुए फैसले में कहा गया, ‘‘उच्च न्यायालय को प्रवेश देने या प्रवेश/पाठ्यक्रम जारी रखने का निर्देश देने वाला ऐसा अंतरिम आदेश पारित नहीं करना चाहिए था। उच्च न्यायालय द्वारा पारित अंतरिम आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है।’’

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